<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888</id><updated>2012-01-19T11:20:23.845+05:30</updated><category term='करीम अब्दुल जब्बार-इस्लाम'/><category term='क्रिकेटर यूसुफ योहान्ना - इस्लाम कबूल'/><category term='इब्राहिम खलील अहमद / एक इसाई पादरी मुसलमान'/><category term='ईसाई पादरी इस्लाम की शरण में'/><category term='मशहूर हस्तियों ने अपनाया इस्लाम'/><category term='पीटर सैंडर्स-मुस्लिम'/><category term='सिंथिया से आमिना'/><category term='पादरी जिसने इस्लाम कबूल किया'/><category term='अब्दुर्रहीम ग्रीन- ब्रिटेन'/><category term='अमेरिकन सैनिक इस्लाम की शरण में'/><category term='आमिना थॉमस- इस्लाम क़बूल'/><category term='क्रिकेटर ब्रायन लारा मुसलमान'/><category term='संगीतकार ए आर रहमान-इस्लाम कबूल'/><category term='एक पत्रकार का इस्लाम कबूल'/><category term='माइकल जैक्शन के बड़े भाई जेरीमन जैक्शन मुस्लिम'/><category term='अमीना जनां मुसलमान'/><category term='ईसाई पादरी-इस्लाम कबूल कर'/><category term='डॉ. अमीना कॉक्सन-इंग्लैण्ड-इस्लाम ग्रहण'/><category term='मरयम जमीला-मुसलमान'/><category term='कमला सुरेया ने आखिर इसलाम क्यों कबूला'/><category term='संजय द्विवेदी ने इस्लाम कुबूल किया.'/><category term='मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल-इस्लाम'/><category term='टोनी ब्लेयर की साली ने इस्लाम कबूल किया'/><category term='खदीजा स्यू वेस्टन'/><title type='text'>इस्लामिक वेबदुनिया</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>27</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-5116039226254202943</id><published>2011-02-07T09:55:00.000+05:30</published><updated>2011-02-07T09:55:02.139+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इब्राहिम खलील अहमद / एक इसाई पादरी मुसलमान'/><title type='text'>पादरी जो मुसलमान हो गया</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TU9wtiZ09vI/AAAAAAAAAf0/BHLrjuu-fZM/s1600/why+islam.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" h5="true" height="140" src="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TU9wtiZ09vI/AAAAAAAAAf0/BHLrjuu-fZM/s200/why+islam.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;इब्राहिम खलील अहमद जिनका पुराना नाम खलील फिलोबस था, पहले इजिप्ट के कॉप्टिक पादरी थे। फिलोबस ने धर्मशास्त्र में प्रिंसटोन यूनिवर्सिटी से एम ए किया। इस्लाम को गलत रूप में पेश करने के मकसद से फिलोबस ने इसका अध्ययन किया। वे इस्लाम में कमियां ढूढना चाहते थे लेकिन हुआ इसका उलटा। वे इस्लाम से बेहद प्रभावित हुए और उन्होने अपने चार बच्चों के साथ इस्लाम कबूल कर लिया।&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;strong&gt;जानिए खलील इब्राहिम आखिर कैसे आए इस्लाम की गोद में?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; मैं १३जनवरी १९१९को अलेक्जेन्डेरिया में पैदा हुआ था। मैंने सैकण्डरी तक की शिाक्षा अमेरिकन मिशन स्कूल से हासिल की। १९४२ में डिप्लोमा हासिल करने के बाद मैंने धर्मशास्र में स्पेशलाइजेशन के लिए यूनिवर्सिटी में एडमिशान लिया। धर्मशास्र में प्रवेश लेना आसान नहीं था। चर्च की खास सिफारिश पर ही इस विभाग में एडमिशन लिया जा सकता था और इसके लिए एक मुशिकल परीक्षा से भी गुजरना पडता था। मेरे लिए अलेक्जेन्डेरिया अलअटारिन चर्च ने सिफारिश की और लॉअर इजिप्ट की चर्च असेम्बली ने भी मेरा इम्तिहान लिया। असेम्बली ने धर्म के क्षेत्र में मेरी योग्यता का अंकन किया। नोडस चर्च असेम्बली ने भी मेरी सिफारिश की। इस असेम्बली में सूडान और इजिप्ट के पादरी थे। कुल मिलाकर मुझे धर्मशास्र विभाग में एडमिशान के लिए कडे इम्तिहानों से गुजरना पडा।१९४४ में बोर्डिंग स्टूडेंट के रूप में धर्मशास्र विभाग में एडमिशान के बाद मैंने १९४८ तक ग्रेजुएशन के दौरान अमेरिकन और इजिप्टियन टीचर्स से अध्ययन किया।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; शिक्षा पूरी होने पर मुझे यरूशलम में नियुक्त किया जाना था लेकिन इस्राइल और फिलीस्तीन के बीच युध्द छिड़ जाने के कारण में वहां नहीं गया और मुझे उसी साल इजिप्ट के आसना में भेज दिया गया। इसी साल मैंने अमेरिकन यूनिवर्सिटी से थिसिस के लिए अपना पंजीयन कराया। मेरे थिसिस का सब्जेक्ट था-‘मुसलमानों के बीच ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां।’ इस्लाम से मेरा परिचय तब हुआ था जब मैंने धर्मशस्र का अध्ययन शुरू किया था। वहां मैंने इस्लाम और मुसलमानों के विशवास और विचारधारा को डगमगाने और भ्रमित करने व उनके धर्म से संबंधित उनके बीच गलतफहमियां पैदा करने के तरीकों का अध्ययन किया।मैंने अमेरिका की प्रिंसटोन यूनिवर्सिटी से १९५२ में एम ए किया। फिर मैं एसूट में धर्मशास्र विभाग में टीचर नियुक्त हुआ। &lt;span style="color: red;"&gt;मैं स्टूडेंट को इस्लाम से जुड़ी वे बातें ही पढ़ाता था जो ईसाई मिशनरी मुसलमानों के खिलाफ आम लोगों के बीच बताती थींं। इस्लाम विरोधी ताकतों की ओर से फैलाई जाने वाली झूठी भा्रंतियों को बताकर इस्लाम का गलत रुप स्टूडेंट के सामने पेश करता था।&lt;/span&gt; इस्लाम संबंधी अपनी इस क्लास के दौरान मुझे महसूस होने लगा कि मुझे इस्लाम संबंधी अपनी जानकारी को बढाना चाहिए।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मैंने तय किया कि मुझे ईसाई मिशनरियों की इस्लाम के खिलाफ लिखी किताबों के अलावा मुस्लिम लेखकों की किताबें भी पढनी चाहिए। मैंने कुरआन को समझकर पढने का भी निर्णय किया। &lt;span style="color: red;"&gt;ज्यादा से ज्यादा इस्लाम की जानकारी हासिल करने के पीछे मेरा मकसद इस्लाम में और खामियां निकालना था। इस अध्ययन का नतीजा मेरी सोच के बिल्कुल उलट निकला। मैं अजीब कशमकश में फंस गया। मेरे मन में अंतरव्ंदव्द चलने लगा क्योंकि अब तक जो कुछ मैं इस्लाम की कमियां लोगों को बताता था ऐसा मैंने कुरआन के अध्ययन में नहीं पाया। मेरे आरोप मुझे निराधार लगने लगे। मैं इस सच्चाई का सामना करने से कतराता रहा और मैंने इस्लाम का नेगेटिव अध्ययन कराना जारी रखा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; १९५४ में मैं जर्मन स्विस मिशन के महासचिव के रूप में आसवान गया। वहां भी मुझे इस्लाम संबंधी भ्रांतियां पैदा करनी थी जो मेरे मिशन का हिस्सा थी। एक होटल में मिशनरी की ओर से कॉन्फ्रेस का आयोजन किया गया। इस मौके पर मैंने इस्लाम को लेकर कई भा्रंतियां पैदा की। अपने लेक्चर के अंत में मेरे मन में अंतव्र्दव्द शुरू हो गया। मैं अपनी इस भूमिका के बारे में सोचने लगा। मैं अपने आपसे सवाल करने लगा कि सच्चाई जानने के बावजूद मैं आखिर झूठ क्यों बोल रहा हूं? आखिर मैं सच्चाई से मुंह क्यों मोड़ रहा हूं? इसी कशमकश के बीच मैं कॉन्फ्रेस खत्म होने से पहले ही वहां से अपने घर के लिए रवाना हो गया। मैं मंथन करने लगा। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;इस बीच जब मैं एक पार्क की तरफ जा रहा था तो मैंने रेडियो में कुरआन की यह आयत सुनी-&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;strong&gt;&lt;em&gt;कह दो-मेरी ओर ईवर ने ज्ञान भेजा है कि जिन्नों के एक गिरोह ने कुरआन सुना, फिर जिन्नों ने कहा कि हमने एक मनभाता कुरआन सुना जो भलाई और सूझबूझ का मार्ग दिखाता है; इसलिए हम उस पर ईमान ले आए और अब हम कभी किसी को अपने रब का साझी नहीं ठहराएंगे। &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कुरआन ७२ :१-२&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;और यह कि जब हमने हिदायत की बात सुनी तो उस पर ईमान ले आए। अब जो कोई अपने रब पर ईमान लाएगा,उसे न तो किसी हक के मारे जाने का भय होगा और न किसी जुल्म ज्यादती का।&amp;nbsp; &amp;nbsp;कुरआन ७२ :१३&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कुरआन की यह आयत सुनने के बाद उस रात मुझे सुकून का एहसास हुआ। घर पहुचने के बाद मै पूरी रात लाइब्रेरी में बेठकर कुरआन पढ़ता रहा। मेरी पत्नी ने मुझसे पूरी रात बैठे रहने का कारण पूछा लेकिन मैंने उससे मुझे अकेले छोड़ देने को कहा। मैं काफी देर तक कुरआन की इस आयत पर गौर व फिक्र करता रहा- &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;&lt;em&gt; यदि हमने इस कुरआन को किसी पर्वत पर भी उतार दिया होता तो तुम अवश्य देखते अल्लाह के भय से वह दबा हुआ और फटा जाता है। ये मिसालें हम लोगों के लिए इसलिए पेश करते हैं कि वे सोच विचार करें। कुरआन ५९:२१&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;मैंने इन आयतों पर भी चिंतन किया-&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;strong&gt;&lt;em&gt;तुम ईमान वालों का दुशमन सब लोगों से बढकर यहूदियों और मुशरिकों को पाओगे और ईमान वालों के लिए मित्रता में सबसे निकट उन लोगों को पाओगे जिन्होने कहा कि -हम ईसाई हैं। यह इस कारण कि ईसाईयों में बहुत से धर्मज्ञाता और संसार त्यागी संत पाए जाते हैं। और इस कारण कि वे अहंकार नहीं करते। जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आखें आंसुओं से छलकने लगती हंै । इसका कारण यह है कि उन्होने सच्चाई को पहचान लिया है । वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। इसलिए तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले। और हम अल्लाह पर और जो सत्य हमारे पास पहुंचा है उस पर ईमान क्यों नहीं लाएं,जबकि हमें उम्मीद है कि हमारा रब हमें अच्छे लोगों के साथ हमें जन्नत में दाखिल करेगा। &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कुरआन ५:८२-८४&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;मैंने इन आयात पर भी गौर किया- &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;&lt;em&gt; तो आज इस दयालुता के अधिकारी वे लोग हैं जो उस रसूल उम्मी का अनुसरण करते हैं,जिसके बारे में वे अपने यहां तौरात और इंजील में लिखा पाते हैं। और जो उन्हे भलाई का हुक्म देता है और बुराई से रोकता है। उनके लिए अच्छी स्वच्छ चीजों को हलाल और बुरी अस्वच्छ चीजों को हराम ठहराता है और उन पर से उनके वह बोझ उतारता है,जो अब तक उन पर लदे हुए थे। उन बन्धनों को खोलता है,जिनमें वे जकड़े हुए थे। अत जो लोग उस पर ईमान लाए, उसका सम्मान किया और उसकी सहायता की और उस हिदायत के मार्ग पर चले जो वो लेकर आए,तो ऐसे ही लोग सफलता प्राप्त करने वाले हैं।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;कहो-ऐ लोगो! मैं तुम सबकी ओर उस अल्लाह का रसूल हूं जो आकाशों और धरती के राज्य का स्वामी है, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं,वही जीवन देता है और वही मौत देता है। अत अल्लाह और उसके रसूल,उस उम्मी नबी पर ईमान लाओ जो खुद अल्लाह और उसके कलाम पर ईमान रखता है। उसका अनुसरण करो,ताकि तुम सही राह पा लो। कुरआन ७:१५७-१५८&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;span style="color: red;"&gt; उस रात मैंने सच्चाई जान ली और फिर इस्लाम कबूल करने का फैसला कर लिया। सुबह मैंने अपने इस फैसले के बारे में अपनी पत्नी को बताया। मेरे तीन बेटे और एक बेटी हैं। मेरी पत्नी को यह एहसास होने पर कि मैं जल्दी ही इस्लाम कबूल करने जा रहा हूं तो उसने बिना देरी किए ईसाई मिशनरी के मुखिया से मदद मांगी और मुझे रोकने को कहा। मिशनरी के मुखिया स्विटजरलेंड के मॉन्सियोर शोविटस बहुत चतुर व्यक्ति थे। मॉन्सियोर के पूछने पर मैंने उनको साफ साफ बता दिया कि मैं अब इस्लाम अपनाना चाहता हूं, यह जानकर उन्होने मुझसे कहा कि ऐसा करने पर तुम्हे नौकरी से निकाल दिया जाएगा और इसके लिए तुम खुद जिम्मेदार &lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;बनोगे। मैंने तुरंत अपना इस्तीफा उनको पकड़ा दिया। उन्होने मुझ पर अपना फैसला वापस लेने का दबाव बनाया और मेरी मानसिकता बदलने की काफी कोशिश की लेकिन मैं अपने फैसले पर अटल था।&lt;/span&gt; मुझे अपने फैसले पर अडिग देख मॉन्सियोर ने मेरे बारे में अफवाह उड़ा दी कि मैं पागल हो गया हूं। फिर तो मुझे बेहद मुशिकलों का सामना करना पड़ा। मुसीबतों से परेशान होकर मैं आसवान छोड़कर वापस केअरो आ गया। केअरो में मेरा परिचय एक सम्मानीय और अच्छे प्रोफेसर से हुआ। उन्होने मेरे बारे में बिना कुछ जाने मुसीबतों और परेशानियों के दौर में मेरा साथ दिया। मैंने उनके सामने अपना परिचय एक मुस्लिम के रूप में दिया था हालांकि तब तक मैंने आफिसियल रूप से इस्लाम कबूल नहीं किया था। डॉ मुहम्मद अब्दुल मोनेम अल जमाल नाम के यह व्यक्ति कोसागार में सचिव थे। उनकी इस्लामिक अध्ययन में जबरदस्त दिलचस्पी थी और वे कुरआन का अमेरिकी अंगे्रजी में अनुवाद कराने के इच्छुक थे। उन्होने कुरआन के अनुवाद के लिए मुझसे मदद चाही क्योंकि मेरी अंग्रेजी अच्छी थी और मैं अमेरिकन यूनिवर्सिटी से एम ए कर चुका था। वे यह भी जानते थे कि मैं कुरआन,तोरात और बाइबिल का तुलनात्मक अध्ययन कर रहा हूं। मैंने उनकी कुरआन के अनुवाद में मदद की।इस बीच जब डॉ जमाल को पता चला कि मैंने नौकरी छोड़ दी है और इन दिनों मैं बेरोजगार हूं तो उन्होने मुझे केअरो में ही नौकरी दिलाने में मेरी मदद की। और इस तरह मेरी गाड़ी फिर से पटरी पर आ गई। इस दौरान पत्नी से दूर रहने पर उसको लगा कि मैंने उसको भुला दिया है जबकि उससे दूरी इस बीच की उथल पुथल के कारण हुई थी। इस्लाम ग्रहण करने के ऐलान का इरादा मैंने कुछ वक्त के लिए टाल दिया क्योंकि मैं इससे उत्पन्न होने वाली स्थितियों से निपटने के लिए खुद को और मजबूत बनाना चाहता था। १९५५ में मैंने अपना इस्लामिक अध्ययन और विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन पूरा कर लिया। इस बीच मेरा जीवन सहज हो गया था। मैंने नौकरी छोड़कर स्टेशनरी निर्यात का बिजनेस शुरू कर दिया था। बिजनेस में मैंने अपनी जरूरत के मुताबिक अच्छा पैसा कमाया। इस तरह सैट होने के बाद मैंने इस्लाम कबूल करने और इसका ऐलान करने का निशचय किया। और फिर २५ दिसंबर १९५९ को मैंने इजिप्ट में अमेरिकन मिशान के मुखिया डॉ थॉमसन को टेलीग्राम के जरिए इस्लाम कबूल करने की जानकारी दी। मैंने डॉ जमाल को अपनी वास्तविक दास्तां बताई तो वे आशचर्यचकित हुए क्योंकि वे अब तक इससे अनजान थे। इस्लाम कबूल करने के ऐलान के साथ ही मेरे सामने नई तरह की परेशानियां आनी शाुरू हो गई। मिशानरी में मेरे साथ काम करने वाले मेरे पूर्व सात साथियों ने मुझ पर इस्लाम कबूल न करने का दबाव बनाया। मैं अपने इरादे पर अंिडग था। उन्होने मुझे मेरी पत्नी से अलग करने की धमकी दी। मैंने साफ कह दिया- वह अपना फैसला लेने के लिए आजाद है। मुझे मारने की धमकी दी गई।जब उनकी बातों का मुझ पर असर नहीं हुआ तो उन्होने मेरे पास मेरे एक पुराने खास दोस्त और मेरे साथ काम कर चुके सहकर्मी को भेजा। वह मेरे पास आकर रोने लगा। मैंने उसके सामने कुरआन की यह आयत पढ़ी- जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें छलकने लगती हंै । इसका कारण यह है कि उन्होने सत्य को पहचान लिया है । वे कहते हैं -हमारे रब हम ईमान लाए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले। और हम अल्लाह पर और जो सत्य हमारे पास पहुंचा है उस पर ईमान क्यों नहीं लाएं,जबकि हमें उम्मीद है कि हमारा रब हमें अच्छे लोगों के साथ जन्नत में दाखिल करेगा। कुरआन ५:८३-८४ मैंने उससे कहा- कुरआन सुनने के बाद तुम्हे विनम्र होकर ई’वर के सामने झुक जाना चाहिए और सच्चे धर्म को तुम्हे भी अपना लेना चाहिए। अपनी बातों का असर न होता देख वह मुझे अकेला छोड़ चला गया। और फिर मैंने जनवरी १९६० में आधिकारिक रूप से इस्लाम कबूल करने का ऐलान कर कर दिया।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;span style="color: blue;"&gt; इस्लाम कबूल करने के ऐलान के करते ही मेरी पत्नी मुझे छोड़ गई और अपने साथ घर का सारा फर्नीचर ले गई। मेरे तीन बेटे और एक बेटी मेरे साथ रहे और उन्होने भी इस्लाम कबूल कर लिया। इस्लाम कबूल करने में सबसे ज्यादा उत्साहित मेरा बड़ा बेटा इसाक था जिसने अपना इस्लामिक नाम ओसामा रख लिया। ओसामा ने फिलोसोफी में डॉक्टरेट की और वह पेरिस की यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गया&lt;/span&gt;। घर छोड़ने के छह साल बाद मेरी पत्नी वापस लौट आई इस शार्त पर कि वह अपना धर्म नहीं छोड़ेगी। मैंने उसे अपना लिया क्योंकि इस्लाम में इसकी इजाजत थी। मैंने उससे कहा कि मैं तुम्हे दबाव डालकर मुस्लिम नहीं बनाना चाहता, बल्कि चाहता हूं कि इस्लाम को समझने के बाद तुम ही इस मामले मेंं फैसला लो। कुछ वक्त बाद वह भी इस्लाम के मूल्यों में भरोसा करने लगी लेकिन अपने घर वालों के डर से इस्लाम अपनाने का ऐलान नहीं कर पाई। लेकिन हमारा व्यवहार उसके साथ मुस्लिम औरत की तरह है। वह रमजान के महीने के रोजे रखती है। मेरे सभी बच्चे भी रोजे रखते हैं और नमाज पढते हैं। मेरी बेटी नाजवा कWामर्स की स्टूडेंट है,बेटा जोसेफ डॉक्टर और जमाल इंजिनियर है। १९६१ से अब तक मैं इस्लाम पर और ईसाई मिशानरियों की इस्लाम के खिलाफ मुहिम पर कई किताबें लिख चुका हूं। &lt;span style="color: red;"&gt;१९७३ में मैंने हज किया। मैं इस्लाम पर तकरीर करता हूं। मैंने कई यूनिवर्सिटी और समाजसेवी संस्थाओं में सेमिनार का आयोजन किया। मैं अपना पूरा वक्त इस्लाम के लिए खर्च कर रहा हूं। कुरआन और पैगम्बर मुहम्मद सल्ललाहो अलेहेवस्सलम की जीवनी का अध्ययन करने पर इस्लाम के प्रति मेरा यकीन पुख्ता बनता गया। इस्लाम से जुड़ी सारी गलतफहमियां दूर हो गईंं। इस्लाम में एक ईश्वर की अवधारणा से मैं बेहद प्रभावित हुआ और मुझे इस्लाम की यह सबसे बड़ी खूबी लगी। अल्लाह एक है। उसका कोई साझी नहीं है। इस्लाम की इस अवधारणा से मैं उस एक ईश्वर का बन्दा बन गया जिसका कोई हमसर नहीं। एक ईश्वर में भरोसा व्यक्ति को खुद्दार बनाता है और समस्त मानव जाति को हर तरह की दासता से मुक्ति देता है और यही सही मायनों में आजादी है। मैं इस्लाम में माफी देने के नियम और ई’वर और बन्दे के बीच सीधे संबंध से बेहद प्रभावित हुआ।&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;अल्लाह कहता है -&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;कह दो - ऐ मेरे बन्दो जिन्होने अपने आप पर ज्यादती की है अल्लाह की दयालुता से निराशा न हो। निसंदेह अल्लाह सारे ही गुनाहों को माफ कर देता है। निशचय ही वह बड़ा क्षमाशील,अत्यन्त दयावान है। ३९: ५३ &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-5116039226254202943?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/5116039226254202943/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=5116039226254202943' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/5116039226254202943'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/5116039226254202943'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2011/02/blog-post.html' title='पादरी जो मुसलमान हो गया'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TU9wtiZ09vI/AAAAAAAAAf0/BHLrjuu-fZM/s72-c/why+islam.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-4509886025034938750</id><published>2011-01-09T13:40:00.000+05:30</published><updated>2011-01-09T13:40:35.104+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खदीजा स्यू वेस्टन'/><title type='text'>अब मैं मुस्लिम के रूप में ही जीना चाहती हूं</title><content type='html'>&lt;span style="color: red;"&gt;वे कट्टर ईसाई थीं। लेकिन जब इस्लाम का अध्ययन किया और इस्लाम के रूप में सच्चाई सामने आई तो इसे अपना लिया।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;पूर्व पादरी, मिशनरी, प्रोफेसर और धर्मशास्त्र में मास्टर डिग्री धारक खदीजा स्यू वेस्टन की जुबानी कि आखिर वे किस तरह इस्लाम की आगोश में आईं।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; यह तुम्हें क्या हो गया है? यह पहली प्रतिक्रिया होती थी जब इस्लाम अपनाने के बाद पहली बार&amp;nbsp;मेरे क्लास के साथी, दोस्त और साथी पादरी मुझसे मिलते थे। &lt;br /&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;मुझे लगता मैं उनको दोष नहीं दे सकती थी। धर्म बदलने की वजह से मैं उनके लिए सबसे ज्यादा नापसंदीदा बन गई थी। पहले मैं प्रोफेसर, पादरी, चर्च प्लांटर और मिशनरी थी। धर्म के मामले में मैं बेहद कट्टर थी। &lt;/div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बात तब की है जब &lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;मैंने पादरियों की एक विशेष शिक्षण संस्था से ग्रेजुएशन के बाद धर्मशास्त्र में मास्टर डिग्री ली ही थी। इसके छह महीने बाद ही मेरी मुलाकात एक महिला से हुई जो सऊदी अरब में काम करती थी और वह इस्लाम अपना चुकी थी। मैंने उस महिला से जाना कि इस्लाम में महिलाओं को किस तरह की हैसियत और अधिकार दिए गए हैं? उसका जवाब जानकर मुझो बेहद हैरत हुई। दरअसल मैं नहीं जानती थी कि इस्लाम में महिलाओं को इतना ऊंचा मुकाम दिया गया है।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; मैंने उससे अगला सवाल अल्लाह और मुहम्मद सल्ल. से संबंधित पूछा। उसने मुझो बताया कि वह मुझे इस्लामिक सेन्टर ले जाएगी ताकि वे मेरे सवाल का बेहतर जवाब दे सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रार्थना के दौरान हम जीसस से बुरी ताकतों और शैतान से हिफाजत करने की प्रार्थना करते थे। हमें यही बताया गया था कि इस्लाम शैतान का धर्म है। मुसलमानों को लेकर मेरा ऐसा ही नजरिया था। लेकिन इस्लामी केंद्र में उनसे मिलकर&amp;nbsp;&amp;nbsp;मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। उनका अंदाज और व्यवहार सीधा व सरल था। कोई बनावटीपन नहीं। ना किसी तरह का भय और परेशानी का दिखावा, ना कोई मनोवैज्ञानिक चालाकी और ना ही किसी तरह का अचेतन प्रभाव डालने की कोशिश। उन लोगों में ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला बल्कि उन्होंने कहा- आप घर पर बाइबल के अध्ययन के साथ-साथ कुरआन का अध्ययन भी करें। मुझे तो इनके इस तरह के व्यवहार पर बेहद आश्चर्य हुआ। उन्होंने मुझे कुछ किताबें दी और कहा कि अगर इनको पढऩे के बाद उनके दिमाग में किसी तरह के सवाल उठते हैं तो उनसे जवाब जाना जा सकता है। मैंने पहली बार इस्लाम पर किसी मुस्लिम की लिखी किताब पढ़ी थी। इससे पहले मैंने इस्लाम पर ईसाइयों द्वारा लिखित किताबें ही पढ़ी थी। अगले दिन मैं फिर से इस्लामी केंद्र गई और वहां मैंने कई सवाल पूछते हुए करीब तीन घण्टे गुजारे। और फिर मैं हफ्ते में एक बार इस्लामी केंद्र जाने लगी। इस तरह &lt;span style="color: red;"&gt;मैंने इस्लाम से जुड़ी तकरीबन बारह किताबें पढ़ डाली। यह पढऩे पर&amp;nbsp;&amp;nbsp;मुझे समझ में आया कि मुसलमानों को ईसाईयत की तरफ लाने के मामले में ही सबसे ज्यादा मेहनत क्यों करनी पड़ती है। आखिर मुसलमान धर्म बदलने के मामले में इतने कठोर क्यों हैं?&lt;/span&gt; क्या आप जानना चाहते हैं वे ऐसे क्यों हैं? क्योंकि उनको ऑफर करने के लिए कुछ होता ही नहीं? क्योंकि मुसलमान सीधे अल्लाह से जुड़ाव रखते हैं, जो गुनाहों को माफ करने वाला है। जिसका वादा है परलोक का अनंत सुख और कामयाबी देने का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; इस्लाम को समझने के दौरान स्वाभाविक रूप से मेरा पहला सवाल यही था कि अल्लाह का अस्तित्व किस रूप में है जिसकी मुसलमान इबादत करते हैं? दरअसल ईसाई के रूप में हमें पढ़ाया जाता है कि यह एक अलग गॉड है, जो झूठा है। जबकि सच्चाई यह है कि मुसलमान जिस ईश्वर की इबादत करते हैं वह सर्वज्ञ-सब कुछ जानने वाला, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी-सब जगह उपस्थित है। यह सिर्फ एक है और उसकी शक्तियों में उसका कोई साझी नहीं है। और ना ही कोई उसके बराबर है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;span style="color: red;"&gt;यह बड़ी दिलचस्प बात है कि चर्च के शुरूआती तीन सौ सालों में बिशप ईसा मसीह के बारे में ऐसा ही बताते थे जैसा कि आज मुस्लिम यकीन रखते हैं कि ईसा अलै. ईश्वर के पैगंबर और उपदेशक थे। सम्राट कॉन्स्टेन्टीन नेे ट्रिनिटी (ईश्वर को तीन रूपों में मानने की ईसाइयों की अवधारणा) ईजाद की। उसे ईसाई धर्म की कोई जानकारी नहीं थी। उसी ने ईसाईयत को मूर्तिपूजक अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया। वक्त की कमी के कारण मैं इस विषय की गहराई में नहीं जा पाई हूं, लेकिन &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;इंशा अल्लाह मैं यह साबित करूंगी कि ट्रिनिटी बाइबल के कई अनुवादों में नहीं है और ना ही मूल ग्रीक और हिब्रू भाषा की बाइबल में यह अवधारणा पाई जाती है।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; मेरी दूसरी जिज्ञासा मुहम्मद सल्ल. को लेकर थी। मुहम्मद सल्ल.कौन हैं? मैने जाना कि मुसलमान मुहम्मद सल्ल. की इबादत नहीं करते जिस तरह कि ईसाई ईसा मसीह की करते हैं। वे ईश्वर और बंदों के बीच मध्यस्थ नहीं है बल्कि मुसलमानों को मुहम्मद सल्ल. से प्रार्थना करने के लिए मना किया गया है। मुसलमान तो अपनी इबादत में मुहम्मद सल्ल. पर रहम और करम करने की अल्लाह से दुआ करते हैं, उसी तरह जिस तरह मुसलमान इब्राहीम अलै. के लिए अल्लाह से दुआ करते हैं। मुहम्मद सल्ल. तो अल्लाह के आखरी पैगबंर और संदेशवाहक हैं। वे अंतिम पैगंबर है। यही वजह है कि पिछले चौदह सौ अट्ठारह सालों में कोई पैगबंर नहीं आया। इनका मैसेज पूरी इंसानियत के लिए है जबकि मूसा और ईसा अल्ल. सिर्फ यहूदियों की तरफ भेजे गए पैगबंर थे। लेकिन इन सबका एक ही मैसेज था-&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;तुम्हारा रब सिर्फ एक ही है और सिवाय उसके कोई कोई ईश्वर नहीं है।&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;(मार्क 12: 29)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; क्योंकि एक ईसाई के रूप में मेरी जिंदगी में प्रार्थना की काफी अहमियत थी, इसलिए मेरी दिलचस्पी और उत्सुकता इस बात में थी कि मुसलमानों का प्रार्थना का तरीका क्या है। दरअसल एक ईसाई के रूप में हम मुसलमानों के अन्य पहलुओं की तरह उनके इस पहलू को भी नजरअंदाज ही करते थे। हम सोचते थे जैसा कि हमें सिखाया भी गया था कि मुसलमान मक्का स्थित काबा की इबादत करते हैं, उसी के सामने झुकते हैं और यही उनके झूठे ईश्वर का केंद्र बिंदु है। लेकिन मुझे सच्चाई जानकर हैरत हुई कि मुसलमान तो उस तरीके से इबादत करते हैं जो तरीका खुद ईश्वर की तरफ से बताया गया है। उनकी प्रार्थना के शब्दों में उसी एक ईश्वर की महिमा और उसी का गुणगान है। इबादत करने के लिए किस तरह की पवित्रता होना जरूरी है, यह भी उसी ईश्वर ने गाइड किया है। वह ईश्वर बहुत पवित्र है और यह उचित नहीं है कि लोग अपने-अपने हिसाब से मनमाने तरीके से उसकी इबादत करे बल्कि ज्यादा उचित यह है कि ईश्वर हमें गाइड करे कि उसकी प्रार्थना किस तरह की जानी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;span style="color: red;"&gt; आठ साल तक धार्मिक अध्ययन के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंच गई थी कि इस्लाम सच्चा धर्म है। लेकिन मैंने अभी तक इस्लाम कबूल नहीं किया था क्योंकि अभी तक इस्लाम दिल की गहराइयों में नहीं उतरा था।&lt;/span&gt; मैं लगातार प्रार्थना करती, बाइबल का अध्ययन करती और इस्लामी केंद्र में भी लेक्चर में शामिल होती। मैं पूरी गंभीरता से ईश्वर की हिदायत को तलाश रही थी। मैं जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करना चाहती थी। और यह भी सच है कि अपना धर्म बदल लेना कोई आसान काम भी नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&lt;span style="color: red;"&gt;मुझे लगातार बेहद हैरत होती रही कि इस्लाम के बारे में हमें क्या बताया जाता है जबकि इस्लाम सही मायने में कितना अच्छा मजहब है। मेरे मास्टर लेवल कोर्स के दौरान एक प्रोफेसर जो इस्लाम विषय के ऑथोरिटी माने जाते थे, मैं उनका सम्मान करती थी, लेकिन वे और उन जैसे कई ईसाई इस्लाम को लेकर गलतफहमियों के शिकार रहते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; एक बार फिर ईश्वर से हिदायत की दुआ के दो माह बाद एक दिन मुझे महसूस हुआ मानों मेरे अंदर कोई एक खास बूंद टपकी हो। मैं उठ खड़ी हुई और यह पहला मौका था जब मैंने अल्लाह शब्द बोला। मैंने दुआ की-ऐ अल्लाह मेरा यकीन है कि तू सिर्फ एक है और तू ही सच्चा गॉड है। उस दिन मैंने एक खास सुकून का एहसास किया और उस दिन इस्लाम अपनाने के बाद पिछले चार सालों में मैंने इस्लाम अपनाने के अपने फैसले पर कभी खेद महसूस नहीं किया। &lt;span style="color: red;"&gt;इस्लाम अपनाने के बाद मुझे कई तरह के इम्तिहानों से गुजरना पड़ा। मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। उस वक्त मैं दो बाइबल कॉलेजों में पढ़ाती थी। मेरे पूर्व के क्लास के साथियों, प्रोफेसरों और मेरे साथी पादरियों ने मेरा बहिष्कार कर दिया। मेरे शौहर ने मुझे छोड़ दिया और मेरे अपने ही युवा बच्चे मुझे शक की नजरों से देखने लगे। गवर्नमेंट ने मुझ पर संदेह किया।&lt;/span&gt; बिना मजबूत ईमान के किसी की वश की बात नहीं कि वह इस तरह की शैतानी ताकतों का मुकाबला कर सके। अल्लाह ही ने मुझे यह सब सहन करने की ताकत दी वरना मेरे बूते की बात ना थी। अल्लाह का मुझ पर बहुत बड़ा एहसान है कि उसने मुझे मुस्लिम बनाया। अब मुस्लिम के रूप में ही जीना चाहती हूं और मुस्लिम के रूप में मरना।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;span style="color: red;"&gt; कहो-मेरी नमाज और मेरी कुर्बानी और मेरा जीना और मेरा मरना सब अल्लाह के लिए है, जो सारे संसार का रब है। उसका कोई साझी नहीं है। &lt;/span&gt;&lt;strong&gt; (कुरआन-6: 162-163) &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;मुझे तो इसी का आदेश मिला है और सबसे पहला मुस्लिम (आज्ञाकारी) मैं हूं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;(&lt;em&gt;सिस्टर खदीजा वेस्टन अभी जेद्दा स्थित एक दावत सेंटर में महिलाओं को पढ़ाने का काम कर रही हैं।&lt;/em&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-4509886025034938750?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/4509886025034938750/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=4509886025034938750' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/4509886025034938750'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/4509886025034938750'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2011/01/blog-post.html' title='अब मैं मुस्लिम के रूप में ही जीना चाहती हूं'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-2358261907253925104</id><published>2010-12-24T22:00:00.004+05:30</published><updated>2010-12-24T22:15:20.546+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टोनी ब्लेयर की साली ने इस्लाम कबूल किया'/><title type='text'>टोनी ब्लेयर की साली मुसलमान  बनी</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TRTE25R-Z-I/AAAAAAAAAfU/JseGEHIQ8Ls/s1600/Lauren-Booth.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: right; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" n4="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TRTE25R-Z-I/AAAAAAAAAfU/JseGEHIQ8Ls/s200/Lauren-Booth.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की साली ने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल कर लिया है. चेरी ब्लेयर की बहन लौरेन बूथ ने पिछले दिनों&amp;nbsp;&amp;nbsp;इस्लाम कबूल करने की घोषणा की. बूथ पेशे से पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&amp;nbsp; मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 43 साल की बूथ ने इस्लाम कबूल करने की बात लंदन में पिछले दिनों&amp;nbsp;&amp;nbsp;सामाजिक संगठन ग्लोबल पीस एंड यूनिटी 2010 के बैनर तले हुए एक कार्यक्रम में उजागर की. कई इस्लामिक&amp;nbsp; नेताओं की मौजूदगी में बूथ ने बताया कि उन्होंने यह फैसला उन लोगों की धारणा बदलने के लिए किया है जो इस्लाम को आतंकवाद फैलाने वाला मानते हैं.&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.dw-world.de/dw/article/0,,6147468,00.html"&gt;http://www.dw-world.de/dw/article/0,,6147468,00.html&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TRTHgx-XZ2I/AAAAAAAAAfY/lLcpIWpN8uU/s1600/lauren-sahafat-urdu-news.jpg" imageanchor="1" style="cssfloat: right; margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" n4="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TRTHgx-XZ2I/AAAAAAAAAfY/lLcpIWpN8uU/s320/lauren-sahafat-urdu-news.jpg" width="311" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&amp;nbsp; बूथ का कहना है कि अब वह उन सभी गतिविधियों से दूर रहेंगी जिसकी इजाजत इस्लाम नहीं देता। वर्ष 2007 में प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद ब्लेयर रोमन कैथोलिक बन गए थे। अब बूथ ने अपनी आस्था बदली है। ईरान का दौरा करने के बाद बूथ का इस्लाम की ओर से झुकाव हुआ।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; स्थानीय समाचार पत्र "डेली मेल" के अनुसार&amp;nbsp; बूथ दो बच्चों की मां हैं। अब वह घर से बाहर निकलते समय हिजाब पहनती हैं। इसके साथ ही उन्होंने अब शराब पीना छो़ड दिया है और नियमित नमाज पढ़ने के साथ पवित्र कुरआन पढ़ती हैं। कभी ब्रिटेन में टेलीविजन कलाकार रही बूथ ने कहा, ""छह सप्ताह पहले मैं ईरान गई थी। इस दौरान मैंने ईरान के पवित्र शहर कोम में एक दरगाह का दौरा किया। वहां मैंने अपने को अध्यात्म के नजदीक पाया।""&lt;/div&gt;&amp;nbsp; बूथ ने कहा, ""मैं हमेशा से यही मानती रही हूं कि मुस्लिम समुदाय बहुत प्रेम करने वाला और अमनपसंद हैं। अब मैं इस समुदाय का हिस्सा बनकर बहुत खुश हूं।""&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.khaskhabar.com/blair-sister-in-law-converts-to-islam-1020102516635712217.html"&gt;http://www.khaskhabar.com/blair-sister-in-law-converts-to-islam-1020102516635712217.html&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-2358261907253925104?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/2358261907253925104/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=2358261907253925104' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/2358261907253925104'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/2358261907253925104'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2010/12/blog-post.html' title='टोनी ब्लेयर की साली मुसलमान  बनी'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TRTE25R-Z-I/AAAAAAAAAfU/JseGEHIQ8Ls/s72-c/Lauren-Booth.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-6115273075051383173</id><published>2010-09-05T17:02:00.001+05:30</published><updated>2010-10-16T21:54:33.251+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आमिना थॉमस- इस्लाम क़बूल'/><title type='text'>सोच-समझकर इस्लाम चुना</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TIN81cDQR8I/AAAAAAAAAd4/WXPyrvWUcos/s1600/muslim_convert_women_islam-1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" ox="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TIN81cDQR8I/AAAAAAAAAd4/WXPyrvWUcos/s320/muslim_convert_women_islam-1.jpg" width="236" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आमिना थॉमस&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(भूतपूर्व ‘अन्नम्मा थॉमस’)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;ईसाई पादरी की बेटी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;केरल, भारत&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;em&gt;क़ुरआन और बाइबल के तुलनात्मक अध्ययन और सच्चे दिल से अल्लाह के सामने दुआ ने इस्लाम की ओर झुके हुए मेरे दिल को ताक़त दी और मैं अन्दर ही अन्दर मुसलमान हो गई।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;मैं दक्षिणी भारत के एक प्रोटेस्टेंट ईसाई घराने में पैदा हुई और पली-बढ़ी। लेकिन अब मैं बहुत ख़ुश हूं कि मैं एक मुस्लिम औरत हूं। केवल संयोगवश मुसलमान नहीं बनी, बल्कि ख़ूब सोच-समझकर मैंने इस्लाम का चयन किया है। संसार के पालनहार, जिसने सही रास्ते अर्थात् इस्लाम की ओर मेरा मार्गदर्शन किया, उसका मैं जितना भी शुक्र अदा करूं, कम है। मेरा इस्लाम क़बूल करना विभिन्न धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन का परिणाम है।&lt;/span&gt; तुलनात्मक अध्ययन ने मेरे मन-मस्तिष्क को क़ायल किया कि इस्लाम ही एक सच्चा धर्म है और अल्लाह का अन्तिम धर्म है। इस्लाम के संबंध में मेरा अध्ययन जारी था कि बेहतर भविष्य के लिए मैं सऊदी अरब गई। यहां मैंने मुसलमानों और उनकी जीवनशैली का बहुत क़रीब से निरीक्षण किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; सऊदी अरब में मुझे धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन का सुनहरा मौक़ा मिला। लिट्रेचर, ऑडियो, वीडियो कैसिटों के अलावा चलते-फिरते ज़िन्दा प्रमाणों ने मेरी बड़ी सहायता की। ये जीवंत प्रमाण वे मनुष्य थे, जिन्होंने सच्चाई और सत्य धर्म का रास्ता पाने के लिए बड़ी खोज और मेहनत की थी। जब उन्हें सीधी राह मिल गई तो उन्होंने ईसाइयत को अलविदा कहकर इस्लाम क़बूल कर लिया। उन लोगों की खोज और अनुभव मेरे लिए बड़े लाभदायक और मार्गदीप सिद्ध हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;अमेरिकी नवमुस्लिम श्रीमती ख़दीजा वॉटसन के साथ, जो किसी अमेरिकी यूनीवर्सिटी में धर्मशास्त्र (Theology) की प्रोफ़ेसर रह चुकी हैं, साक्षात् वार्तालाप आध्यात्मिक शान्ति की तलाश में मेरे लिए बड़ी लाभप्रद रही। इसी बीच मैंने उच्च शिक्षा प्राप्त नवमुस्लिमों की जीवनियों का अध्ययन किया। इनमें प्रोफ़ेसर अब्दुल अहद दाऊद (पूर्व नाम रेवरेंड डेविड बेंजमीन कलदानी), एक बिशप और रोमन कैथोलिक पादरी, ‘मुहम्मद इन दी बाइबल’ का लेखक क़िसीस (पादरी) चार्ल्स विलियम पिकथॉल के बेटे ‘मुहम्मद मारमाड्युक पिकथॉल की कथाएं’ बड़ी महत्वपूर्ण थीं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं यह तो समझ गई थी कि एक ही ख़ुदा हर चीज़ का रचयिता है, लेकिन मुझे यह यक़ीन नहीं था कि सच्चा एक ख़ुदा ईसाइयत में है या इस्लाम में। यह हक़ीक़त है कि दोनों धर्म एक-दूसरे के बहुत क़रीब हैं, मगर इबादत का ढंग बिल्कुल अलग है। अब फिर मैं क्या करूं? यह सवाल मुझे लगातार परेशान कर रहा था। मैंने अपनी यह परेशानी अल्लाह के सामने पेश करने का फै़सला किया। ऐ मेरे अल्लाह! सही धर्म को चुनने में मेरा मार्गदर्शन कर। मैं केवल सच्चाई की तलाश में हूं, इसलिए मुझे गुमराह होने से बचा ले। अगर ईसाई धर्म सच्चा है तो फिर मुझे इस पर जमा दे और इसके बारे में मेरे मन में जो शंकाएं और भ्रम हैं, उन्हें दूर कर दे। अगर इस्लाम सच्चा है तो फिर इसकी सच्चाई की पुष्टि कर और मेरे दिल में इसको जमा दे। मेरी मदद कर और मेरे अन्दर इतनी हिम्मत पैदा कर दे कि मैं अपने भावी धर्म के रूप में उसको क़बूल कर लूं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;क़ुरआन और बाइबल के तुलनात्मक अध्ययन और सच्चे दिल से अल्लाह के सामने दुआ ने इस्लाम की ओर झुके हुए मेरे दिल को ताक़त दी और मैं अन्दर ही अन्दर मुसलमान हो गई। मैंने मुसलमानों की तरह नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी। पूरी नमाज़ के दौरान में मैंने महसूस किया कि इस्लाम की सबसे ज़्यादा आकर्षक चीज़ नमाज़ ही है।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-6115273075051383173?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/6115273075051383173/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=6115273075051383173' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/6115273075051383173'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/6115273075051383173'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2010/09/blog-post.html' title='सोच-समझकर इस्लाम चुना'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TIN81cDQR8I/AAAAAAAAAd4/WXPyrvWUcos/s72-c/muslim_convert_women_islam-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-5503654041022565105</id><published>2010-08-29T13:37:00.001+05:30</published><updated>2010-08-29T13:39:47.897+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अमेरिकन सैनिक इस्लाम की शरण में'/><title type='text'>तीन हजार अमेरिकी सैनिकों ने अपनाया इस्लाम</title><content type='html'>&lt;table align="center" cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/THoTPiN1FaI/AAAAAAAAAdg/zHis0VL3yaQ/s1600/muslim+american+soldiers.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="215" ox="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/THoTPiN1FaI/AAAAAAAAAdg/zHis0VL3yaQ/s320/muslim+american+soldiers.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;नमाज़ अदा करते अमेरिकी मुस्लिम सैनिक&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;table align="center" cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/THoTX_o_S-I/AAAAAAAAAdo/tuSVkuNwj2o/s1600/abu+ameena.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" ox="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/THoTX_o_S-I/AAAAAAAAAdo/tuSVkuNwj2o/s320/abu+ameena.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;डॉ. अबू अमीना बिलाल फीलिप्स।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;क्या आपने भी सुना था कि खाड़ी युद्ध के दौरान तीन हजार अमेरिकी सैनिकों ने इस्लाम अपना लिया था। यह सच है। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस बदलाव के पीछे कौन हैं? जिन लोगों ने इस्लाम की यह दावत इन अमेरिकी सैनिकों तक पहुंचाई उनमें से एक अहम शख्सियत हैं डॉ. अबू अमीना बिलाल फीलिप्स। अबू अमीना फीलिप्स जमैका में जन्मे और पढ़ाई कनाड़ा में की । फिलहाल वे दुबई अमेरिकन यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं। अबू अमीना पहले ईसाई थे लेकिन 1972 में इस्लाम अपनाकर वे मुस्लिम बन गए।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिलाल बताते हैं-'पहले खाड़ी युद्ध के दौरान मैंने नौसेना के धार्मिक विभाग में सऊदी रेगिस्तान में काम किया। &lt;span style="color: blue;"&gt;अमेरिकी सैनिक इस्लाम के बारे में बहुत सी गलतफहमियां रखते थे। अमेरिका में उन्हें आदेश दिए गए थे कि वे मस्जिदों के करीब ना जाएं। हम उन्हें मस्जिदों में ले गए। मस्जिदों के अंदर की सादगी और माहौल को देखकर वे बेहद प्रभावित हुए। दरअसल जब उन्होंने पहली बार सऊदिया की जमीन पर कदम रखा था तो उन्हें यह एक अजीब जगह लगी थी जहां महिलाएं काला हिजाब पहने नजर आती थीं। लेकिन सऊदी अरब में रहने पर उन सैनिकों को एक खास अनुभव हुआ और ये उनके लिए आंखें खोल देने वाला अनेपक्षित अनुभव था। अमेरिकी सैनिक वहां के लोगों की मेहमाननवाजी देखकर आश्चर्यचकित रह गए। लोग उनके लिए ताजा खजूर और दूध लाते थे और उनका बेहद सम्मान किया जाता था। अमेरिकी सैनिकों ने ऐसी मेहमाननवाजी और आत्मीय व्यवहार कोरिया और जापान में नहीं देखा था जहां उनका बरसों तक पड़ाव रहा था।'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिलाल बताते हैं-मैं वापस अमेरिका लौट आया और मैंने अमेरिकी डिफेंस डिपार्टमेंट में इस्लामिक चैप्टर्स की स्थापना की। मेरे सऊदी में रहने के दौरान तकरीबन तीन हजार अमेरिकी सैनिकों ने इस्लाम अपनाया। शायद &lt;span style="color: red;"&gt;आप मेरी इस बात पर भरोसा ना करें कि दुनिया में सिर्फ सऊदी अरब ही ऐसा देश है जहां अमेरिकी सैनिक अपने पीछे वार बेबीज(युद्ध के कारण अनाथ हुए बालक) नहीं छोड़ के आए। ये अमेरिकी सैनिक अपने तंबुओं में इस्लामिक सिद्धांतों और व्यवहार पर खुलकर चर्चा करते थे। ये मुस्लिम सैनिक अमेरिकी सेना में इस्लाम के दूत हैं। सऊदी अरब ने पश्चिमी देशों पर इस्लामी की अच्छी छाप छोड़ी है। मैंने देखा कि सऊदी अरब अपने नागरिकों की देखभाल अमेरिकी नागरिकों से बेहद अच्छे ढ़ंग से करता है। जहां बीस लाख अमेरिकी नागरिक आज भी गलियों और फुटपाथ पर सोते हैं, वहीं सऊदी अरब का एक भी नागरिक फुटपाथ पर नहीं सोता।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;यू आए इस्लाम की आगोश में&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अबू अमीना पहले ईसाई थे। उनका जन्म 1947 में जमैका में हुआ। वे अच्छे पढ़े लिखे परिवार से हैं। इनके माता-पिता दोनों टीचर थे। उनके दादा जी के भाइयों में से एक चर्च के मिनिस्टर और बाइबिल के विद्वान थे। इनका परिवार खुले विचारों वाला था। वे हर सण्डे अपनी मां के साथ चर्च जाते थे। जब वे ग्यारह साल के थे तो इनका परिवार कनाड़ा पलायन कर गया। पहले इनका नाम इनाके था। जब वे बायो केमेस्ट्री से ग्रेजुएशन कर रहे थे,उसी दौरान वे साम्यवादी विचारधारा के लोगों के सम्पर्क में आए। साम्यवाद का आकषर्ण उन्हें चीन भी ले गया। चीन से लौटकर वे कनाड़ा की साम्यवादी पार्टी में शामिल हो गए। साम्यवादी पार्टी में रहकर उन्होंने इसमें कई तरह की कमियां और दोष देखे। उन्हें उस पार्टी के नेताओं में अनुशासन की कमी नजर आती थी। उसका जवाब उन्हें यह मिलता था कि क्रांति के बाद सब ठीक हो जाएगा। पार्टी के फंड में से गबन का मामला भी उनके सामने आया। वे शहरी गुरिल्ला लड़ाई सीखने के लिए चीन जाना चाहते थे। लेकिन जो आदमी इनक ा इसके लिए चयन करने आया था वह नशेड़ी था। इन सब बातों ने अबू अमीना का साम्यवाद के प्रति मोह कम कर दिया।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; अमीना बिलाल कैलीफोर्निया भी गए और वहां वे काले लोगों को इंसाफ दिलाने के मकसद से ब्लैक पेंथर्स गुट में शामिल हो गए। लेकिन उन्होंने वहां देखा कि उनमें से ज्यादातर लोग ड्रग्स लेते थे। सुरक्षा कमेटियों के नाम पर वे चंदा इकट करते थे और फिर उन पैसों को ड्रग्स और पार्टियों पर खर्च कर देते थे। अबू अमीना ने अमेरिका में मैल्कल एक्स, अलीजा मुहम्मद और उनके बेटे वरीथ दीन मुहम्मद क ो इस्लाम की ओर बढ़ते देखा। उन्होंने मुस्लिम बने मैल्कल एक्स की जीवनी पढ़ी। उन्होंने एलीजा मुहम्मद का कुछ साहित्य पढ़ा,पर उसका उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि एलीजा मुहम्मद के साहित्य में गोरे लोगों से जातीय घृणा जबरदस्त थी और एलीजा मुहम्मद का नेशन ऑफ इस्लाम भी इस्लाम की विचारधारा के अनुरूप नहीं था। उनका कहना है-&lt;span style="color: red;"&gt;मैं सब गोरे लोगों को शैतान के रूप में नहीं देखना चाहता था। अमीना फिलिप्स को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली किताब सैयद कुतुब की 'इस्लाम: द मिस अंडरस्टूड रिलीजन' थी। इस पुस्तक में इस्लाम समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद, अर्थव्यवस्था और आध्यात्मिक पहलुओं को अच्छे अंदाज में पेश किया गया था। उन्हें यकीन हो गया था कि इस्लाम पश्चिमी समाज के आर्थिक और सामाजिक जीवन में बेहतर भूमिका अदा कर सकता है। मौलाना अबुल आला मौदूदी की किताब 'टुवार्ड्स अंडरस्टेडिंग इस्लाम' ने उन्हें इस्लाम के बारे में विस्तृत नजरिया दिया। बिलाल ने इटली जैसे साम्राज्यवादी देशों से मोरक्को,लीबिया जैसे अफीक्री देशों द्वारा इस्लामिक नजरिए के साथ युद्ध जीतने का भी अध्ययन किया। वे कहते हैं- 'मुझो जानने को मिला कि इस्लाम थप्पड़ के लिए दूसरा गाल पेश करने की तालीम नहीं देता यानी इसमें जुल्म बर्दाश्त करते रहने की तालीम नहीं है। इस तरह इस्लाम का अच्छी तरह अध्ययन के बाद मैं इस्लाम का हिमायती बन गया और फिर 1972 में सोच समझाकर मैंने इस्लाम धर्म अपना लिया।'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; बिलाल ने मिस्र के शख्स से अरबी और इस्लामी शरीअत सीखी। बिलाल ने विभिन्न स्रोतों से इस्लाम की जानकारी हासिल की। अबू अमीना ने इस्लामिक यूनिवर्सिटी मदीना से ग्रेजुएशन किया। बिलाल ने 1985 में रियाद यूनिवर्सिटी से इस्लाम धर्म में एमए और 1994 में इस्लाम पर ही पीएचडी की। बाद में वे इंग्लिश मीडियम के बच्चों को इस्लाम पढ़ाने लगे। उन्होंने बच्चों के लिए पांच इस्लामिक पाठ्यपुस्तकें भी लिखीं। बिलाल ने साल 2000 में ऑनलाइन इस्लामिक यूनिवर्सिटी भी गठित की। यह यूनिवर्सिटी इस्लाम में बीए और अन्य छोटे कोर्सेज कराती हैं। दुनियाभर के 160 देशों के करीब 20000 से ज्यादा स्टूडेंट इस यूनिवर्सिटी में पंजीकृत हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;भारत दौरा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अपनी पीएचडी के दौरान बिलाल भारत भी आए। उन्होंने उत्तर भारत के मुसलमानों की दयनीय दशा &lt;br /&gt;देखी। उन्होंने देखा कि उत्तर भारतीय मुसलमान अंधविश्वास में लिप्त हैं। वे केरल भी गए। यहां उनको अच्छी उम्मीद दिखाई दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;बिलाल का मानना है कि पश्चिमी देशों में इस्लाम के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। वे गरमी के मौसम में अमेरिका और कनाड़ा में इस्लाम और अरबी पढ़ाते हैं। उनका मानना है कि गैर मुस्लिम देशों के मुसलमानों को चाहिए कि वे इस्लामी समुदाय में इस्लामिक स्कूल चलाएं वरना इस्लाम को जिंदगी में लागू करने वालों की तादाद दस फीसदी से भी कम रह जाएगी। वे कहते हैं कि मुसलमान अपनी जिंदगी इस्लामिक उसूलों के मुताबिक गुजारें। अबू अमीना बिलाल की जिंदगी का मकसद है कि समाज में इंकलाब आ जाए लेकिन यह इंकलाब तभी आएगा जब हर शख्स अपने जीवन के आचरण को इस्लामिक मूल्यों के मुताबिक संवारेगा। और बिलाल ने अपनी कोशिश इसी के लिए लगा रखी है।&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;अबू अमीना भारत के इस्लामिक चैनल पीसी टीवी से भी जुड़े हैं और यहां आप इनको इस्लाम पर बोलते हुए देख सकते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्रोत:&lt;br /&gt;सऊदी गजट्स बायोग्राफी&lt;br /&gt;http://www.4newmuslim.org/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.islamfortoday.com/"&gt;http://www.islamfortoday.com/&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-5503654041022565105?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/5503654041022565105/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=5503654041022565105' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/5503654041022565105'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/5503654041022565105'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2010/08/blog-post.html' title='तीन हजार अमेरिकी सैनिकों ने अपनाया इस्लाम'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/THoTPiN1FaI/AAAAAAAAAdg/zHis0VL3yaQ/s72-c/muslim+american+soldiers.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-3257136680116441069</id><published>2010-07-23T09:37:00.001+05:30</published><updated>2010-07-23T09:45:58.358+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ईसाई पादरी इस्लाम की शरण में'/><title type='text'>एक साथ तीन पादरी मुसलमान</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TEkRyfKhmsI/AAAAAAAAAbo/IUNeyCqHvVE/s1600/yusuf+estes-final.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="372" hw="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TEkRyfKhmsI/AAAAAAAAAbo/IUNeyCqHvVE/s640/yusuf+estes-final.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;अमेरिका के तीन ईसाई पादरी इस्लाम की शरण में आ गए। उन्हीं तीन पादरियों में से एक पूर्व ईसाई पादरी यूसुफ एस्टीज की जुबानी कि कैसे वे जुटे थे एक मिस्री मुसलमान को ईसाई बनाने में, मगर जब सत्य सामने आया तो खुद ने अपना लिया इस्लाम।&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;span style="background-color: lime;"&gt;&lt;strong&gt; बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि आखिर मैं एक ईसाई पादरी से मुसलमान कैसे बन गया? यह भी उस दौर में जब इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ हम नेगेटिव माहौल पाते हैं। मैं उन सभी का शुक्रिया अदा करता हूं जो मेरे इस्लाम अपनाने की दास्तां में दिलचस्पी ले रहे हैं। लीजिए आपके सामने पेश है मेरी इस्लाम अपनाने की दास्तां-&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मैं मध्यम पश्चिम के एक कट्टर इसाई घराने में पैदा हुआ था। सच्चाई यह है कि मेरे परिवार वालों और पूर्वजों ने अमेरिका में कई चर्च और स्कूल कायम किए। 1949 में जब मैं प्राइमेरी स्कूल में था तभी हमारा परिवार टेक्सास के हाउस्टन शहर में बस गया। हम नियमित चर्च जाते थे। बारह साल की उम्र में मुझे ईसाई धार्मिक विधि बेपटिस्ट कराई गई। किशोर अवस्था में मैं अन्य ईसाई समुदायों के चर्च,मान्यताओं,आस्था आदि के बारे में जानने को उत्सुक रहता था। मुझे गोस्पेल को जानने की तीव्र लालसा थी। धर्म के मामले में मेरी खोज और दिलचस्पी सिर्फ ईसाई धर्म तक ही सीमित नहीं थी हिंदू,यहूदी,बोद्ध धर्म ही नहीं बल्कि दर्शनशास्त्र और अमेरिकी मूल निवासियों की आस्था और विश्वास भी मेरे अध्ययन में शामिल रहे। सिर्फ इस्लाम ही ऐसा धर्म था जिसको मैंने गंभीरता से नहीं लिया था।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; इस दौरान मेरी दिलचस्पी संगीत में बढ़ गई। खासतौर से गोस्पल और क्लासिकल संगीत में। चूकि मेरा पूरा परिवार धर्म और संगीत के क्षेत्र से जुड़ा हुआ था इसलिए मैं भी इन दोनों के अध्ययन में जुट गया। और इस तरह मैं कई गिरिजाघरों से संगीत पादरी के रूप में जुड़ गया। मैंने 1960 में लोगों को की बोर्ड के जरिए संगीत की शिक्षा दी और फिर 1963 में लॉरेल,मेरीलेण्ड में अपना ‘एस्टीज म्यूजिक स्टूडियो’ खोल लिया। इसके बाद मैंने करीब तीस साल तक अपने पिता के साथ मिलकर कई बिजनेस प्रोजेक्ट तैयार किए। हमने बहुत सारे मनोरंजन प्रोग्राम बनाए और कई शो किए। हमने टेक्सास और ऑकलाहोम से फ्लोरिडा के बीच कई पियानो और ऑरगन स्टोर खोले। इन सालों में मैंने करोड़ों डॉलर कमाए। करोड़ों डॉलर कमाने के बावजूद दिल को सुकून नहीं था। सुकून तो सच्चाई की राह पाकर ही हासिल हो सकता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span style="color: blue;"&gt;मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि आपके मन में भी यह सवाल उठते होंगे-आखिर ईश्वर ने मुझे किस मकसद के लिए पैदा किया है? ईश्वर को मुझसे किस तरह की अपेक्षा है? आखिर ईश्वर कौन है? हम मूल पाप में यकीन क्यों रखते हैं? इंसान को अपने पाप स्वीकारने के लिए क्यों मजबूर किया जाता है और इसके परिणामस्वरूप उसे सदा के लिए सजा क्यों दी जाती है?&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अगर आप किसी से यह सवाल पूछते हैं तो आपसे कहा जाता है कि आपको ऐसे सवाल पूछे बिना अपने धर्म पर यकीन करना चाहिए या यह तो रहस्य है,ऐसे सवाल नहीं किए जाने चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक इसी तरह ट्रीनिटी(तसलीस) का सिद्धान्त भी है। अगर मैं किसी धर्मप्रचारक या किसी ईसाई पादरी से पूछता कि-‘एक’ अपने आप में तीन में कैसे बदल सकता है? ईश्वर तो कुछ भी करने की ताकत रखता है तो फिर लोगों के पाप कैसे माफ नहीं कर सकता? उसे जमीन पर एक इंसान के रूप में आकर सभी लोगों के पाप अपने ऊपर लेने की आखिर कहां जरूरत पड़ी? हमें याद रखना चाहिए की वह तो सारे ब्रह्माण्ड का पालक है,वह तो चाहे जैसा कर सकता है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 1991 में एक दिन मुझे यह जानकारी मिली कि मुसलमान बाइबिल पर यकीन रखते हैं। मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। आखिर ऐसे कैसे हो सकता है? इतना ही नहीं मुसलमान तो ईसा पर ईमान रखते हैं कि वे ईश्वर के सच्चे पैगम्बर थे और उनकी पैदाइश बिना पिता के अल्लाह के चमत्कार के रूप में हुई। ईसा अब ईश्वर के पास हैं, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अंतिम दिनों में फिर से इस जमीन पर आएंगे और एंटीक्राइस्ट(दज्जाल)के खिलाफ ईमान वालों का नेतृत्व करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे यह सब जानकर बड़ी हैरत हुई। दरअसल मैं जिन ईसाई पंथ वालों के साथ सफर किया करता था वे इस्लाम और मुसलमानों से सख्त नफरत किया करते थे। वे लोगों के बीच इस्लाम के बारे में झूठी बातें करके लोगों को भ्रमित करते थे। ऐसे में मुझे लगता था कि मुझे इस धर्म के लोगों से आखिर क्या लेना-देना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे पिता चर्च से जुड़े कामों में जुटे हुए थे, खासतौर पर चर्च के स्कूल प्रोगाम्स में। 1970 में मेरे पिता अधिकृत रूप से पादरी बन गए। मेरे पिता और उनकी पत्नी(मेरी सौतेली मां)बहुत से ईसाई धर्म प्रचारकों को जानते थे। वे अमेरिका में इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन पेट रॉबर्टसन के नजदीकियों में से थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1991 में मेरे पिता ने मिस्र के एक मुसलमान शख्स के साथ बिजनेस शुरू किया। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उस शख्स से मिलूं। मैं बड़ा खुश हुआ कि चलो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामकाज होगा। लेकिन &lt;span style="background-color: lime;"&gt;जब मेरे पिता ने मुझे बताया कि वह शख्स मुसलमान है तो पहले तो मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। मैंने कहा-एक मुसलमान से मुलाकात करूं? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं नहीं मिलना चाहता किसी मुस्लिम से। हमने इनके बारे में बहुत सी बातें सुनी हैं। ये लोग आतंकवादी होते हैं, हवाई जहाज अगवा करते हैं, बम विस्फोट करते हैं,अपहरण करते हैं और ना जाने क्या-क्या करते हैं। वे ईश्वर में भरोसा नहीं करते। दिन में पांच बार जमीन को चूमते हैं और रेगिस्तान में किसी काले पत्थर की पूजा करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने इनसे कह दिया मैं किसी मुसलमान शख्स से नहीं मिल सकता। मेरे पिता ने मुझ से कहा कि वह बहुत अच्छा इंसान है और मुझ पर जोर डाला कि मैं उससे मिलूं। आखिर में मैं उस मुसलमान शख्स से मिलने को तैयार हो गया और शर्त रखी कि मैं सण्डे के दिन चर्च में प्रार्थना करने के बाद ही उससे मिलूंगा। मैंने हमेशा की तरह बाइबिल अपने साथ ली,चमकता क्रॉस गले में लटकाकर उससे मिलने पहुंचा। मेरी टोपी पर ठीक सामने लिखा था-जीसस ही रब है। मेरी पत्नी और दो छोटी बेटियां भी मेरे साथ थीं। अपने पिता के ऑफिस पहुंचकर मैंने उनसे पूछा-कहां है वह मुसलमान? पिता ने सामने बैठे शख्स की ओर इशारा किया। उसे देख मैं परेशानी में पड़ गया। मुसलमान तो ऐसा नहीं हो सकता। मैं तो सोचता था कि लंबे चौगे,दाढ़ी और सिर पर साफे के साथ लंबे कद और बड़ी आंखों वाले शख्स से मुलाकात होगी। इस शख्स के तो दाढ़ी भी नहीं थी। सच बात तो यह है कि उसके सिर पर भी बाल नहीं थे। उसने बड़ी गर्मजोशी और खुशी के साथ मेरा स्वागत किया और मेरे से हाथ मिलाया। मैं तो कुछ समझ नहीं पाया। मैं तो सोचता था कि ये लोग तो आतंकवादी और बम विस्फोट करने वाले होते हैं। मैं तो चक्कर में फंस गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने सोचा चलो कोई बात नहीं,मैं इस शख्स पर अभी से काम शुरू कर देता हूं। शायद ईश्वर मेरे जरिए ही इसे नरक की आग से बचाना चाह रहा है। एक दूसरे से परिचय के बाद मैंने उससे पूछा- क्या आप ईश्वर में यकीन रखते हैं? उसने कहा-‘हां’। बहुत अच्छा, फिर मैंने पूछा-आप आदम और हव्वा में विश्वास रखते हैं? उसने कहा-‘हां’। मैंने आगे पूछा-और इब्राहीम के बारे में आपका क्या मानना है? क्या आप उनको मानते हैं? और यह भी कि उन्होंने अपने बेटे को कुरबान करने की कोशिश की? उसने फिर हां में जवाब दिया। इसके बाद मैंने उससे जाना-मूसा को भी मानते हो? उसने फिर हामी भरी। मेरा अगला सवाल था-अन्य पैगम्बरों-दाऊद, सुलेमान,जॉहन आदि को भी मानते हो? उसका जवाब फिर हां में था। मैंने जाना कि क्या तुम बाइबिल पर यकीन रखते हो? उसने हां कहा। अब मैं एक बड़े सवाल पर आया-क्या तुम ईसा को मानते हो? उसने कहा-हां।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;span style="color: blue;"&gt;यह सब जानकर मुझे उस शख्स को ईसाई बनाने का काम आसान लग रहा था। मुझे लग रहा था,उसे तो अब सिर्फ बपतीशा की विधि की ही जरूरत है और यह काम मेरे जरिए होने वाला है। मैं इसे बड़ी उपलब्धि मान रहा था। एक मुसलमान हाथ में आना और इसे ईसाई धर्म स्वीकार करवाना बड़ा काम था। उसने मेरे साथ चाय पीने की हां भरी तो हम एक चाय की दुकान पर चाय पीने गए।&lt;/span&gt; हम वहां बैठकर अपने पसंद के विषय आस्था, विश्वास आदि पर बैठकर घंटों बातें करते रहे। ज्यादा बातें मैंने ही की। उससे बातचीत करने पर मुझे एहसास हुआ कि वह तो बहुत अच्छा आदमी है। वह कम ही बोलता था और शर्मीला भी था। उसने मेरी बात बड़ी तसल्ली से सुनी और बीच में एक बार भी नहीं बोला। मुझे उस शख्स का व्यवहार पसंद आया। मैंने मन ही मन सोचा-यह व्यक्ति तो बहुत अच्छा ईसाई बनने की काबिलियत रखता है। लेकिन भविष्य में क्या होने वाला है, इसकी मुझे थोड़ी सी भनक भी नहीं थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अपने पिता से सहमति जताई और उसके साथ बिजनेस करने के लिए राजी हो गया। मेरे पिता ने मुझे प्रोत्साहित किया और मेरे से कहा कि मैं उस मुस्लिम शख्स को अपने साथ बिजनेस ट्यूर पर उत्तरी टेक्सास ले जाऊं। लगातार कई दिनों तक हमने कार में सफर के दौरान अलग-अलग धर्म और आस्थाओं पर चर्चा की। मैंने उसे रेडियो पर आने वाले इबादत से जुड़े अपने पसंदीदा प्रोग्राम्स के बारे में बताया। मैंने बताया कि इन धार्मिक प्रोग्राम्स में सृष्टि की रचना का उद्देश्य,पैगम्बर और उनके मिशन और ईश्वर अपने मैसेज इंसानों तक कैसे पहुंचाता है, इसकी जानकारी दी जाती है। इन रेडियो प्रोग्राम्स के जरिए कमजोर और आम लोगों तक यह धार्मिक संदेश पहुंच जाते हैं। इस दौरान हम दोनों ने अपने धार्मिक विचार और अनुभवों को एक दूसरे के साथ बांटा।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; एक दिन मुझे पता चला कि मेरा यह मुस्लिम दोस्त मुहम्मद अपने मित्र के साथ जहां रह रहा था उस जगह को छोड़ चुका है और अब कुछ दिनों के लिए उसे मस्जिद में रहना पड़ेगा। मैं अपने पिता के पास गया और उनसे कहा कि क्यों न हम मुहम्मद को अपने बड़े घर में अपने साथ रख लें। वह अपने काम में भी हाथ बंटाएगा और अपने हिस्से का खर्चा भी अदा कर देगा। और जब कभी बिजनेस के सिलसिले में बाहर जाएंगे तो हमें हरदम तैयार मिलेगा। मेरे पिता को यह बात जम गई और फिर मुहम्मद हमारे साथ ही रहने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं टेक्सास में अपने साथी धर्मप्रचारकों से मिलने जाया करता था। उनमें से एक टेक्सास मैक्सिको सरहद तथा दूसरा ओकलहोमा सरहद पर रहता था। एक धर्मप्रचारक को तो बहुत बड़ा क्रॉस पसंद था जो उसकी कार से भी बड़ा था। वह उसे कंधे पर रखता और उसका सिरा जमीन पर घसीटते हुए चलता। जब वह उस क्रॉस को लेकर सड़क पर चलता तो कई लोग अपनी गाड़ी रोककर उससे पूछते-क्या चल रहा है? तो वह उन्हें ईसाई धर्म से जुड़ी किताबें और पम्फलेट देता। एक दिन मेरे इस क्रॉस वाले दोस्त को दिल का दौरा पड़ा और उसे हॉस्पिटल में लम्बे समय तक भर्ती रहना पड़ा। मैं हफ्ते में कई बार उस दोस्त से मिलने जाता। साथ में मैं अपने दोस्त मुहम्मद को भी ले जाता और इस बहाने हम अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताओं का आदान-प्रदान कर लेते। मेरे उस बीमार दोस्त पर इस्लाम का कोई असर नहीं पड़ा, इससे साफ जाहिर था कि इस्लाम के बारे में जानने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। एक दिन उसी अस्पताल में भर्ती एक मरीज व्हील चैयर पर मेरे दोस्त के कमरे में आया। मैं उसके नजदीक गया और मैंने उसका नाम पूछा। वह बोला-नाम कोई महत्वपूर्ण चीज नहीं है। मैंने उससे जाना कि वह कहां का रहने वाला है, तो वह चिड़कर बोला-मैं तो जूपीटर ग्रह से आया हूं। दरअसल वह अकेला था और अवसाद से पीडि़त था। इस वजह से मैं उसके सामने मालिक की गवाही देने की कोशिश करने लगा। मैंने उसे तौरात में से पैगम्बर यूनुस के बारे में पढ़कर सुनाया। मैंने बताया कि पैगम्बर यूनुस को ईश्वर ने लोगों को सीधी राह दिखाने के लिए भेजा था। यूनुस अपने लोगों को ईश्वर की सीधी राह दिखाने में विफल होकर उस बस्ती से निकल गए। इन लोगों से बचते हुए वे एक कश्ती में जाकर सवार हो गए। तूफान आया कश्ती भी टूटने लगी तो लोगों ने यूनुस को समंदर में फैंक दिया। एक व्हेल मछली पैगम्बर यूनुस को निगल गई। यूनुस मछली के पेट में समंदर में तीन दिन और तीन रात रहे। फिर जब यूनुस ने अपने गुनाह की माफी मांगी तो ईश्वर के आदेश से उस मछली ने उन्हें तट पर उगल दिया और वे अपने शहर निनेवा लौट आए। इस घटना में सबक यह था कि अपनी परेशानियों और बिगड़े हालात से भागना नहीं चाहिए। हम जानते हैं कि हमने क्या किया है और हमसे भी ज्यादा ईश्वर जानता है कि हमने क्या किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस वाकिए को सुनने के बाद व्हील चैयर पर बैठे उस शख्स ने ऊपर मेरी ओर देखा और मुझसे अपने किए व्यवहार की माफी मांगी। उसने कहा कि वह अपने रूखे व्यवहार से दुखी है और इन्हीं दिनों वह गम्भीर परेशानियों से गुजरा है। उसने कहा वह मेरे सामने अपने पाप कबूल करना चाहता है। मैंने उससे कहा मैं कैथोलिक पादरी नहीं हूं और मैं लोगों के पाप कबूल नहीं करवाता। वह बोला- ‘मैं यह बात जानता हूं। मैं खुद एक रोमन कैथोलिक पादरी हूं।’ यह सुनकर मैं भौंचक्का रह गया। क्या मैं एक पादरी को ही ईसाई धर्म के उपदेश दे रहा था? मैं सोच में पड़ गया आखिर इस दुनिया में यह क्या हो रहा है। उस पादरी ने अपनी कहानी सुनाई। उसने बताया कि मैक्सिको और न्यूयॉर्क में वह बारह साल तक ईसाई प्रचारक के रूप में काम कर चुका है और यहां उसका अनुभव पीड़ादायक रहा। अस्पताल से छुट्टी के बाद उस ईसाई पादरी को ऐसी जगह की जरूरत थी जहां वह तंदुरुस्ती हासिल कर सके। मैंने अपने पिता से कहा कि उसे अपने यहां रहने के लिए कहना चाहिए कि वह भी हमारे साथ रहे। हम इस पर सहमत हो गए और वह भी हमारे साथ रहने लगा। मेरी उस ईसाई पादरी से भी इस्लाम की धारणाओं और मान्यताओं पर बातचीत हुई तो उसने इस पर अपनी सहमति जताई। उसकी सहमति पर मुझे ताज्जुब हुआ। उस पादरी से मुझे यह जानकर भी हैरत हुई कि कैथोलिक पादरी इस्लाम का अध्ययन करते हैं और कुछ ने तो इस्लाम में डॉक्टरेट की उपाधि भी ले रखी है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;span style="background-color: blue; color: cyan;"&gt; हम हर शाम खाने के बाद टेबल पर बैठकर धर्म की चर्चा करते। चर्चा के दौरान मेरे पिता के पास किंग जेम्स की अधिकृत बाइबिल होती,मेरे पास बाइबिल का संशोधित स्टैडण्र्ड वर्जन होता, मेरी पत्नी के पास बाइबिल का तीसरा रूप और कैथोलिक पादरी के पास कैथोलिक बाइबिल, जिसमें प्रोटेस्टेंट बाइबिल से सात पुस्तकें ज्यादा है। हमारा वक्त इसमें गुजरता कि किसकी बाइबिल ज्यादा सत्य और सही है और फिर हम मुहम्मद को बाइबिल का संदेश देकर उसे ईसाई बनाने की कोशिश करते।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: lime;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;एक बार मैंने मुहम्मद से कुरआन के बारे में जाना कि पिछले चौदह सौ सालों में कुरआन के कितने रूप बन चुके हैं? उसने मुझे बताया कि कुरआन सिर्फ एक ही रूप में है और उसमें कभी कोई फेरबदल नहीं हुआ। उसने मुझे यह भी बताया कि कुरआन को दुनियाभर में लाखों लोग कंठस्थ याद करते हैं और कुरआन को जबानी याद रखने वाले लाखों लोग दुनियाभर में फैले हुए हैं। मुझे यह असंभव बात लगी। ऐसे कैसे हो सकता है? बाइबिल को देखो सैकड़ों सालों से इसकी मौलिक भाषा ही मर गई। सैंकड़ों साल के काल में इसकी मूल प्रति ही खो गई। फिर भला ऐसे कैसे हो सकता है कि कुरआन असली रूप में अभी भी मौजूद हो।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; एक बार हमारे घर रह रहे कैथोलिक पादरी ने मुहम्मद से कहा कि वह उसके साथ मस्जिद जाना चाहता है और देखना चाहता है कि मस्जिद कैसी होती है। एक दिन वे दोनों मस्जिद गए। वापस आए तो वे मस्जिद के अपने अनुभव बांट रहे थे। हम भी पादरी से पूछे बगैर नहीं रह सके कि मस्जिद कैसी थी और वहां क्या-क्या विधियां कराई गईं? पादरी ने जवाब दिया-ऐसा कुछ नहीं किया गया जैसा तुम समझ रहे हो। मुस्लिम आए,नमाज पढ़ी और चले गए। ‘चले गए,ऐसे ही चले गए? बिना कोई भाषण और गाने के ही चले गए?’ उसने कहा-हां,ऐसा ही था उनकी इबादत का तरीका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; कुछ दिन और गुजरने के बाद एक दिन कैथोलिक पादरी ने मुहम्मद से कहा कि वह एक बार और उसके साथ मस्जिद जाना चाहता है। लेकिन इस बार तो कुछ अलग ही हुआ। वे काफी देर तक घर नहीं लौटे। अंधेरा हो गया तो हमें उनकी चिंता होने लगी। कहीं उनके साथ कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई है? &lt;span style="color: blue;"&gt;वे दोनों आए, दरवाजे में मैंने मुहम्मद को तो पहचान लिया लेकिन साथ आने वाले को एकदम से नहीं पहचान पाया। वह सफेद लंबा चौगा और सिर पर सफेद टोपी लगाए था। अरे,यह तो पादरी है? मैंने उससे पूछा-‘पेटे, क्या तुम मुसलमान बन गए हो?’ उसने कहा-हां, आज मैंने इस्लाम अपना लिया है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;क्या एक पादरी मुसलमान बन गया?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; इसके बाद मैं ऊपर के कमरे में गया और इस मुद्दे पर अपनी पत्नी से बात की। मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि वह भी जल्दी ही इस्लाम अपनाने जा रही है, क्योंकि वह इस नतीजे पर पहुंची है कि इस्लाम सच्चा धर्म है। यह जानकर मुझे तगड़ा झटका लगा। मैंने नीचे आकर मुहम्मद को जगाया और उसे बाहर आकर मेरे साथ चर्चा करने को कहा। हम दोनों रात भर टहलते रहे और इस्लाम पर चर्चा करते रहे। फज्र की नमाज का वक्त हो गया था। अब तक मैं जान चुका था कि इस्लाम सत्य है और अब मुझे इस मामले में अपनी भूमिका निभानी है। मैं पीछे की तरफ अपने पिता के घर गया। वहां एक पलाई का टुकड़ा पड़ा था। मैंने उसी पलाई के टुकड़े पर अपना माथा रख दिया। मेरा मुंह उस दिशा में था जिस तरफ मुंह करके मुसलमान नमाज पढ़ते हैं। मेरा बदन पलाई पर फैला था और मेरा ललाट जमीन पर टिका था। &lt;span style="background-color: blue; color: cyan;"&gt;मैंने उसी स्थिति में सच्चे ईश्वर से प्रार्थना की- ‘है ईश्वर अगर तुम यहां है तो मेरा मार्गदर्शन कर, मुझे सच्ची राह पर ले चल।’ थोड़ी देर बाद मैंने अपना सिर उठाया तो मैंने कुछ खास महसूस किया। नहीं,नहीं मैंने चिडिय़ा या फरिश्तों को आसमान से आते हुए नहीं देखा। ना मैंने किसी तरह की आवाज सुनी और ना कोई संगीत। ना ही मैंने कोई तेज रोशनी देखी या रोशनी की कोई झलक। जो कुछ मैंने महसूस किया वह था मेरे अंदर हुआ बदलाव। मैंने खुद के अंदर बदलाव महसूस किया। अब मैं ज्यादा जागरूक हो गया था कि अब समय आ गया है कि मैं झूठ बोलना, धोखा देना और झूठ पर आधारित बिजनेस बंद कर दूं। अब समय आ गया है कि मैं अपने आपको सीधा, नेक और ईमानदार इंसान बनाने के काम में लग जाऊं। अब मेरी समझ में आ गया था कि मुझे अब क्या करना है। मैं ऊपर गया और फंव्वारे के नीचे बैठ नहाने लगा, इस सोच के साथ कि अब मैं अपने पुराने सभी गुनाह धो रहा हूं। और अब एक नई जिंदगी में दाखिल हो रहा हूं। एक ऐसी जिंदगी जिसका आधार सच्चाई है और जिसे किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। सुबह ग्यारह बजे दो गवाहों एक पूर्व पादरी फादर पीटर जेकब (जो अब मुसलमान हो चुका था) और मुहम्मद अब्दुल रहमान की उपस्थिति में मैंने इस्लाम का कलमा ए शहादत पढ़ लिया। खुली गवाही दी कि अल्लाह एक ही है और मुहम्मद(स.अ.व.)अल्लाह के पैगम्बर हैं। कुछ देर बाद ही मेरी पत्नी ने भी इस्लाम का कलमा पढ़ लिया। उसने तीन गवाहों के सामने कलमा पढ़ा। तीसरा मैं था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; मेरे पिता थोड़े संकोची स्वभाव के थे, इस वजह से उन्होंने कुछ महीने बाद इस्लाम कबूल किया लेकिन उसके बाद उन्होंने अपनी सारी ताकत और सामथ्र्य इस्लाम के लिए लगा दी। फिर तो हम अन्य मुसलमानों के साथ स्थानीय मस्जिद में नमाज अदा करने लगे।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; मैंने बच्चों को भी ईसाई स्कूलों से हटाकर मुस्लिम स्कूलों में दाखिल करा दिया। इन दस सालों में बच्चे कुरआन और इस्लामी शिक्षा को याद करने में जुटे हैं।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;सबसे बाद में मेरे पिता की पत्नी (मेरी सौतेली मां) ने इस बात को स्वीकार किया कि ईसा ईश्वर का बेटा नहीं हो सकता। ईसा तो ईश्वर का पैगम्बर था, ईश्वर नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;span style="background-color: purple;"&gt; &lt;span style="color: cyan;"&gt;अब आप थोड़ा गौर करें और सोचें कि कैसे अलग-अलग पृष्ठभूमियों और पंथ वालों ने सत्य को अपनाया और यह जानने की कोशिश की कि किस तरह सृष्टि के रचयिता और अपने पालनहार को जाना जाए। आप जरा सोचिए तो सही। एक कैथोलिक पादरी। एक चर्च संगीतकार और पादरी। एक अधिकृत पादरी और ईसाई स्कूलों का संस्थापक। सब एक साथ मुसलमान हो गए। यह तो ईश्वर की मेहरबानी ही है कि हमारी आंखों से परदा हटा और इस्लाम रूपी सत्य को देखने के लिए ईश्वर ने हमारा मार्गदर्शन किया। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अगर मैं अपने जीवन की कहानी को यहीं पूरी कर दूं तो आपको लगेगा कि यह कहानी तो चकित करने वाली है। आश्चर्य वाली बात ही है कि तीन अलग-अलग पंथों के पादरियों ने अपने धर्म के एकदम खिलाफ माने जाने वाली मान्यताओं और विचारों को अपनाया। और उन्होंने ही नहीं बाद में उनके परिवार वालों ने भी इस्लाम अपनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; लेकिन बात अभी पूरी नहीं हुई। और भी है। उसी साल मैं टेक्सास के ग्रांड प्रेयरी स्थान पर था। वहां पर मेरी मुलाकात जोय नाम के बेपटिस्ट सेमीनारी के एक विद्यार्थी से हुई जिसने पादरियों को शिक्षा देने वाली संस्था सेमीनारी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कुरआन का अध्ययन किया और इस्लाम अपना लिया। और भी कई ऐसे लोग हैं। मुझे एक और कैथोलिक पादरी याद आ रहा है जो इस्लाम की अच्छाइयां इतनी ज्यादा बयान करता था कि एक दिन मैं उससे पूछ बैठा-आप इस्लाम में दाखिल क्यों नहीं हो जाते? उसका जवाब था-क्या? मैं अपनी नौकरी खो दूं? उसका नाम है-फादर जॉन और मुझे अब भी उससे उम्मीद है। इसी साल मेरी एक और पूर्व कैथोलिक पादरी से मुलाकात हुई जो पिछले आठ सालों से अफ्रीका में ईसाई धर्म प्रचारक था। उसने इस्लाम के बारे में वहीं सीखा और फिर इस्लाम कबूल कर लिया। उसने अपना नाम उमर रखा और अभी वह डलास टैक्सास में रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt; इस्लाम अपनाने के बाद जब मैं एक प्रचारक के रूप में दुनियाभर में घूमा तो मेरी कई राजनीतिज्ञ, प्रोफेसर,दूसरे धर्मों के विद्वान और वैज्ञानिकों से मुलाकात हुई जिन्होंने इस्लाम धर्म का अध्ययन किया और फिर मुसलमान हो गए। इन लोगों में यहूदी,हिंदू,कैथोलक,प्रोटेस्टेंट,जहोवाज,विटनेसेस,ग्रीक और रसियन रूढि़वादी चर्च,मिश्र के कॉप्टिक ईसाई और नास्तिक लोग शामिल हैं।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: lime; font-size: large;"&gt;जो शख्स सच की तलाश में है उसे इन नौ बातों पर गौर करना चाहिए-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: lime;"&gt;1&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; अपने दिल,दिमाग और आत्मा को वास्तविक भलाई के लिए पवित्र करो। साफ रखो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: lime;"&gt;2&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; हर तरह के पूर्वाग्रह और भेदभाव को अपने दिल और दिमाग से निकाल दो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: lime;"&gt;3&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; जो भाषा आप अच्छी तरह से जानते हैं उस भाषा में अनुवादक किया गया कुरआन पढ़ो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;span style="background-color: lime;"&gt;4&amp;nbsp; &lt;/span&gt;थोड़ा रुको,ठहरो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: lime;"&gt;&lt;strong&gt;5&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; गौर फिक्र-चिंतन करो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: lime;"&gt;6&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; सोचो और ईश्वर से प्रार्थना करो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: lime;"&gt;7&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जिस सर्वशक्तिमान ने आपको बनाया है, उससे दिल से प्रार्थना करो कि वह आपको सत्य तक पहुंचाने में आपका मार्गदर्शन करे। आपको सच्ची राह दिखाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: lime;"&gt;8&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; कुछ महीनों तक इस अभ्यास को जारी रखें और नियमानुसार इसे रोजाना करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: lime;"&gt;9&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; जब आपको लगे कि आपकी आत्मा एक नए रूप में करवट ले रही है। आपको लगे मानो आप एक नए रूप में जन्म ले रहे हैं तो ऐसे में ऐसे लोगों से बचें जिनकी सोच में जहर भरा हो जो आपको गुमराह कर सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;span style="color: magenta;"&gt;अब आपका मामला आपके और इस ब्रह्माण्ड के सर्वशक्तिमान मालिक के बीच है। अगर आप वाकई में सच्चे ईश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं तो वह इस बात से अंजान नहीं है क्योंकि वह तो दिलों तक की बात जानने वाला है। और वह उसी हिसाब से आपका मामला तय करेगा जो आपके दिल में है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;strong&gt;ईश्वर से दुआ है कि वह आपको सच्ची राह दिखाने में आपका मार्गदर्शन करे। वह इस जगत की सच्चाई और जिंदगी का मकसद जानने के लिए आपके दिल और दिमाग को खोले।&lt;/strong&gt; &lt;span style="background-color: lime;"&gt;आमीन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; आपका दोस्त &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; यूसुफ एस्टीज&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;यूसुफ एस्टीज की ऑफिसियल वेबसाइट-&lt;a href="http://www.islamtomorrow.com/"&gt;http://www.islamtomorrow.com/&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-3257136680116441069?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/3257136680116441069/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=3257136680116441069' title='13 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/3257136680116441069'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/3257136680116441069'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2010/07/blog-post.html' title='एक साथ तीन पादरी मुसलमान'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TEkRyfKhmsI/AAAAAAAAAbo/IUNeyCqHvVE/s72-c/yusuf+estes-final.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-5449273192099695831</id><published>2010-04-04T12:47:00.001+05:30</published><updated>2010-04-04T12:50:56.660+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पादरी जिसने इस्लाम कबूल किया'/><title type='text'>एक अमेरिकी पादरी जिसने इस्लाम कबूल किया</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/S7g6uJw4RWI/AAAAAAAAAVg/UGtyqBlhRX8/s1600/islam+is+peace.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" nt="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/S7g6uJw4RWI/AAAAAAAAAVg/UGtyqBlhRX8/s200/islam+is+peace.jpg" width="139" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;जेसॉन क्रुज,पूर्व ईसाई पादरी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;अल्लाह का शुक्र है कि मुझे अल्लाह ने&amp;nbsp;2006 में इस्लाम रूपी बेशकीमती ईनाम से नवाजा। जब भी कोई मुझसे यह पूछता है कि मैं कैसे इस सच्चे धर्म की तरफ आया तो मैं झिझक जाता हूं। क्योंकि यह मेरी काबलियत नहीं बल्कि यह अल्लाह ही की हिदायत और रहमत है कि उसने मुझे सच्ची राह दिखाई। बिना अल्लाह की मर्जी और रहमत के कोई इस सच्चे मार्ग की तरफ नहीं आ सकता।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं न्यूयॉर्क के एक कैथोलिक परिवार में पैदा हुआ। मेरे माता और पिता रोमन कैथोलिक थे। हम इतवार को चर्च जाते थे। पहले मैंने ईसाई धर्म की शिक्षा ली,ईसा मसीह के स्मरणार्थ पहले भोज में शामिल हुआ और फिर मैंने रोमन कैथोलिक चर्च की सदस्यता कबूल कर ली। जब मैं जवान हुआ तो मुझे परमेश्वर की ओर से मार्गदर्शन के संकेत का अहसास होने लगा। इसका अर्थ मैंने यह लगाया कि यह मेरे लिए रोमन कैथोलिक पादरी बनने का मैसेज है। मैंने यह बात अपनी मां को बताई तो वह बहुत खुश हुई और वह मुझे हमारे इलाके के पादरी के पास ले गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;इसे दुर्भाग्य मानें या सोभाग्य कि यह ईसाई पादरी अपने पेशे से खुश नहीं था और इसने मुझे पादरी बनने के विचार से ही दूर रहने की सलाह दी। इससे मैं विचलित हुआ। इस बीच परमेश्वर के शुरूआती मैसेज के अहसास को भूला देने,अपनी मूर्खता और किशोर अवस्था के चलते मैंने एक अलग ही रास्ता चुन लिया। बदकिस्मती से जब मैं सात साल का था तो मेरा परिवार बिखर गया। मेरे माता-पिता के बीच तलाक हो गया और मैं अपने पिता से दूर हो गया।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पन्द्रहवें साल में पहुंचने पर मैं पार्टियों और नाइट क्लबों में जाने में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगा। पहले मैंने वकील बनने का ख्वाब संजोया और फिर राजनेता बनने के सपने देखने लगा ताकि अच्छी लाइफ स्टाइल जी सकूं । हाई स्कूल पास करने के बाद मैं कॉलेज पहुंचा लेकिन मैं वहां पढ़ नहीं पाया और वहां से ऐरीजोना(जहां मैं अब तक लगातार रहा) आया और यहां डिग्री पूरी होने तक रहा। एरीजोना में एक दिन मेरी तबियत ज्यादा खराब हो गई। दरअसल मैं वहां घर से भी ज्यादा बुरे लोगों की संगत में फंस गया था। शिक्षा कम होने की वजह से मुझे छोटे-मोटे काम करने पड़े। मैं नशे,बदचलनी और नाइट क्लब में जाने की आदत का शिकार हो गया। इसी दौरान मैं पहली बार एक मुस्लिम शख्स से मिला। वह एक नेक इंसान था और विदेशी छात्र के रूप में शिक्षा हासिल कर रहा था। वह मेरे दोस्तों के साथ पार्टी वगैरह में आता था। मैंने उससे इस्लाम पर तो चर्चा नहीं की लेकिन उससे उसके कल्चर को लेकर सवाल किए जिसका जवाब उसने खुलकर दिया। मेरी जिंदगी का यह बुरा दौर कुछ सालों तक चला। &lt;span style="color: red;"&gt;मैं इस जिंदगी के बारे में ज्यादा नहीं बताना चाहता। मुझे बहुत से आघात लगे। मेरे जानकार लोग मारे गए। मुझे चाकुओं से गोदा गया और भी कई जख्म मुझे मिले। यह कोई ड्रग्स के खतरों की कहानी नहीं है। मैं अपनी इस बुरी जिंदगी का आपके सामने जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि मैं आपको यह बात जोर देकर बताना चाहता हूं कि अगर ईश्वर चाहे तो बुरे हालात में भी आपको राह दिखाकर नारकीय जिंदगी से बाहर निकाल सकता है। आपको सही राह पर ला सकता है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने सुपर पावर के साथ फिर से जुड़ाव महसूस किया और इसी दौरान नशीली चीजों का सेवन करना छोड़ दिया। ईश्वरीय कृपा के चलते ही मैं इन बुराइयों से बच पाया। दरअसल मैं परमेश्वर से जुड़ाव खो चुका था जो कभी पहले मेरा उससे रहा था। मैं फिर से सच्चे ईश्वर की तलाश में जुट गया। बदकिस्मती से &lt;span style="color: blue;"&gt;मैं पहली बार में सच्चाई को नहीं पा सका और मैंने हिन्दू धर्म अपना लिया। हिन्दू धर्म में मुझे इस बात ने प्रभावित किया था कि आखिर हमें कष्ट क्यों झेलने पड़ते हैं। मैंने पूरी तरह हिन्दू धर्म अपना लिया,यहां तक मैंने अपना नाम भी बदलकर हिन्दू नाम रख लिया। इस बदलाव से मैं नशीली चीजों के सेवन से दूर रहा और मेरी जिंदगी सकारात्मक दिशा की तरफ चलने लगी। लेकिन मैं फिर से ईश्वर की तरफ से एक चुभन महसूस करने लगा। मुझे यहां भी सुकून नहीं मिला। सच की तलाश को लेकर मेरे में बेचैनी अभी भी बनी थी। इसी के चलते मैंने हिन्दू धर्म छोड़ दिया और मैं फिर से ईसाई धर्म में आ गया।&lt;/span&gt; मुझे महसूस हुआ कि परमेश्वर मेरी सेवाएं एक पादरी के रूप में चाहता है। इसलिए मैंने पादरी के रूप में सेवाएं देने के लिए रोमन कैथोलिक चर्च में सम्पर्क किया। मुझे न्यू मेक्सिको में मोनेस्टरी में एक पोस्ट के साथ शिक्षा देने का प्रस्ताव रखा गया। उस वक्त मेरी मां,भाई और बहिन भी एरीजोना आ गए थे और यहां मेरी कई लोगों से अच्छी दोस्ती थी। &lt;span style="color: red;"&gt;मैं न्यू मैक्सिको जा नहीं पाया और एरीजोना के ही एक कैथोलिक चर्च से जुड़कर विभिन्न सेमीनार के जरिए मैंने घर रहते हुए ही ईसाइयत का अध्ययन किया। बाद में मैं एरीजोना में ही स्वतंत्र रोमन कैथोलिक चर्च में नियुक्त कर दिया गया। मैंने चर्च से जुड़ी कई सेमीनार अटेंड की और फिर&amp;nbsp;2005 में मुझे पादरी के रूप में नियुक्त कर दिया गया। मुझे विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच जाकर ईसाइयत का मैसेज देने की जिम्मेदारी दी गई। मेरा काम शहरी क्षेत्र में जाकर विभिन्न धर्मों के लोगों की आस्था,रीति-रिवाजों को समझना और उनको ईसाइयत का मैसेज देना था।&lt;/span&gt; मैं अधिकतर ईसाई रीति-रिवाजों का पहले ही अध्ययन कर चुका था और इनसे वाकिफ था। मैंने यहूदी और पूर्वी धर्मों का भी अध्ययन कर लिया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;जहां में काम करता था वहां नजदीक की गली में ही एक मस्जिद थी। मैंने सोचा कि मेरे लिए अच्छा मौका है कि मैं इस्लाम के बारे में भी सीखूं ताकि विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच संवाद के अपने काम को और मजबूत बना सकूं। मैं टेम्पे मस्जिद गया और वहां मुझे अच्छे लोग मिले। मैंने इस्लाम का अध्ययन करना शुरू कर दिया। जो कुछ मैंने पढ़ा उसने मेरे दिल को बेहद प्रभावित किया।&lt;/span&gt; मैं फिर मस्जिद गया और वहां पर मैं एक काबिल टीचर अहमद अल अलकयूम से मिला। ब्रदर अहमद अल अलकयूम अमेरिकन मुस्लिम सोसायटी के रीजनल डायरेक्टर थे। वे मस्जिद में सभी धर्मों के लोगों के लिए एक ऑपन क्लास लेते थे जिसमें वे इस्लाम का परिचय कराते थे। मैं भी उनकी क्लास में शामिल होने लगा। &lt;span style="color: red;"&gt;क्लास में शामिल होने के दौरान ही मुझे यकीन होने लगा कि इस्लाम ही सच्चा धर्म है। और कुछ दिनों बाद ही मैंने इस्लाम का कलमा पढ़कर मैं मुसलमान बन गया।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रदर अहमद अल अलकयूम और शेख अहमद शकीरात दोनों बहुत बड़ी हस्ती हैं और इन्हीं की वजह से मेरा इस्लाम में आना आसान हुआ। मैंने चर्च से इस्तीफा दे दिया और अल्लाह का शुक्र है कि मैं तभी से मुसलमान हूं। &lt;span style="color: blue;"&gt;इस्लाम कबूल करने के साथ ही मेरी जिंदगी में अच्छे बदलाव आए। पादरी का पद छोडऩे और इस्लाम अपनाने पर मेरे परिवारवालों को बेहद आश्चर्य हुआ। वे कुछ समझ नहीं पाए बल्कि वे तो इस्लाम से भयभीत थे। बाद में उन्हें महसूस हुआ कि कुरआन और सुन्नत के प्रति जबरदस्त भरोसे से मेरा जीवन ज्यादा खुशहाल हुआ है और मेरा घर वालों के साथ बेहतर ताल्लुकात हुए हैं तो फिर उन्हें लगा कि इस्लाम तो अच्छा धर्म है।&lt;/span&gt; ब्रदर अहमद जानते थे कि इस्लाम अपनाने के बाद का एक साल मुश्किलों भरा होता है,उन्होंने इस दबाव को झेलने के तरीके सुझााए। मैं कई नवमुस्लिम से भी मिला। &lt;span style="color: red;"&gt;मैं अब एक मुस्लिम के रूप में बेहतर तरीके से काम को अंजाम देने वाला बन गया। मैं एक प्रोग्राम का मेनेजर बना। इस प्रोग्राम का मकसद प्रभावित लोगों को अल्कोहल,एड्स और हेपेटाइटिस से बचाना था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं मुस्लिम अमेरिकन सोसायटी का ही स्वंयसेवी नहीं बना बल्कि एरीजोना के मुस्लिम यूथ सेन्टर और अन्य मुस्लिम समाजसेवी संस्थाओं से भी जुड़ गया। मुझो हाल ही टेम्पे मस्जिद के बोर्ड में भी शामिल किया गया है जहां मैंने इस्लाम कबूल किया था। अब मैं सच्चे मुस्लिम दोस्त ही रखता हूं। &lt;span style="color: blue;"&gt;अब मैं मौज-शौक से जुड़ी पार्टियों में हिस्सा नहीं लेता। अगर अल्लाह ने चाहा तो मैं इस्लाम की खिदमत के लिए मेरे पसंदीदा इस्लामी विद्वानों से इस्लाम का ज्यादा से ज्यादा इल्म हासिल करूंगा। आज मैं जो कुछ भी हूं अल्लाह के रहमो करम से हूं और जो कुछ मेरे में कमियां-खामियां रहीं वे मेरी वजह से&lt;/span&gt; रही।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-5449273192099695831?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/5449273192099695831/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=5449273192099695831' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/5449273192099695831'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/5449273192099695831'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2010/04/blog-post.html' title='एक अमेरिकी पादरी जिसने इस्लाम कबूल किया'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/S7g6uJw4RWI/AAAAAAAAAVg/UGtyqBlhRX8/s72-c/islam+is+peace.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-4252020534372433304</id><published>2010-02-22T12:05:00.002+05:30</published><updated>2010-02-22T12:05:01.651+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ईसाई पादरी-इस्लाम कबूल कर'/><title type='text'>इंग्लैण्ड का ईसाई पादरी बन गया मुसलमान</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/S4FTRW5wApI/AAAAAAAAAT8/Whh4HjYtjDQ/s1600-h/priest+idris+tawfiq.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" ct="true" height="240" src="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/S4FTRW5wApI/AAAAAAAAAT8/Whh4HjYtjDQ/s320/priest+idris+tawfiq.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;ब्रिटेन का एक पूर्व कैथोलिक ईसाई पादरी कुरआन से इतना प्रभावित हुआ कि इस्लाम कबूल कर लिया।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;ईमानवालों के साथ दुश्मनी करने में यहूदियों और बहुदेववादियों को तुम सब लोगों से बढ़कर सख्त पाओग। और ईमानवालों के साथ दोस्ती के मामले में सब लोगों में उनको नजदीक पाओगे जो कहते हैं कि हम नसारा (ईसाई) हैं। यह इस वजह से है कि उनमें बहुत से धर्मज्ञाता और संसार त्यागी संत पाए जाते हैं और इस वजह से कि वे घमण्ड नहीं करते।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें आंसुओं से छलकने लगती हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है। वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; (सूरा:अल माइदा ८२-८३)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: magenta;"&gt;कुरआन की ये वे आयतें है जिन्हें इंग्लैण्ड में अपने स्टूडेण्ट्स को पढ़ाते वक्त इदरीस तौफीक बहुत प्रभावित हुए और उन्हें इस्लाम की तरफ लाने में ये आयतें अहम साबित हुईं।&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काहिरा के ब्रिटिश परिषद में दिए अपने एक लेक्चर में तौफीक ने साफ कहा कि उसे अपनी पिछली जिंदगी और वेटिकन में पादरी के रूप में गुजारे पांच साल को लेकर किसी तरह का अफसोस नहीं है। मै एक पादरी के रूप में लोगों की मदद कर खुशी महसूस करता था लेकिन फिर भी दिल में सुकून नहीं था। मुझो अहसास होता था कि मेरे साथ सब कुछ ठीकठाक नहीं है। अल्लाह की मर्जी से मेरे साथ कुछ ऐसे संयोग हुए जिन्होंने मुझो इस्लाम की तरफ बढ़ाया। ब्रिटिश परिषद के खचाखच भरे हॉल में तौफीक ने यह बात कही।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; तौफीक के लिए दूसरा अच्छा संयोग यह हुआ कि उन्होंने वेटिकन को छोड़कर इजिप्ट का सफर करने का मन बनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इजिप्ट को लेकर अकसर सोचता था-एक ऐसा देश जिसकी पहचान पिरामिड,ऊंट,रेगिस्तान और खजूर के पेड़ों के रूप में है। मैं चार्टर उड़ान से हरगाडा पहुंचा। मैं यह देखकर हैरान रह गया कि यह तो यूरोपियन देशों के दिलचस्प समुद्री तटों की तरह ही खूबसूरत था। &lt;span style="color: #0c343d;"&gt;मैं पहली बस से ही काहिरा पहुंचा जहां मैंने एक सप्ताह गुजारा। यह सप्ताहभर का समय मेरी जिंदगी का अहम और दिलचस्प समय रहा। यहीं पर पहली बार मेरा इस्लाम और मुसलमानों से परिचय हुआ। मैंने देखा कि इजिप्टियन कितने अच्छे और व्यवहारकुशल होते हैं,साथ ही साहसी भी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;ब्रिटेन के अन्य लोगों की तरह पहले मुसलमानों को लेकर मेरा भी यही नजरिया था कि मुसलमान आत्मघाती हमलावर,आतंकवादी और लड़ाकू होते हैं। दरअसल ब्रिटिश मीडिया मुसलमानों की ऐसी ही इमेज पेश करता है। इस वजह से मेरी सोच बनी हुई थी कि इस्लाम तो उपद्रवी मजहब है। काहिरा में मुझो अहसास हुआ कि इस्लाम तो बहुत ही खूबसूरत धर्म है। इसको जिंदगी में अपनाने वाले मुस्लिम बहुत ही सीधे और सरल होते हैं। मस्जिद से नमाज की अजान सुनते ही वे अपना काम-धंधा छोड़कर अल्लाह की इबादत के लिए दौड़ पड़ते हैं।&lt;/span&gt; वे अल्लाह क ी इच्छा और इसकी रहमत पर जबरदस्त भरोसा रखते हैं। वे पंाच वक्त नमाज अदा करते हैं,रोजे रखते हैं,जरूरतमंद लोगों की मदद करते हैं और हज के लिए मक्का जाने की ख्वाहिश रखते हैं। वे यह सब इस उम्मीद में करते हैं कि अल्लाह उन्हें मौत के बाद दूसरी जिंदगी में जन्नत में दाखिल करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'काहिरा से लौटने के बाद मैं धार्मिक शिक्षा देने के अपने पुराने काम में फिर से जुट गया। ब्रिटेन में धार्मिक विषयों क ा अध्ययन अनिवार्य विषय के रूप में है। मैं ईसाइयत,इस्लाम,यहूदी,बोद्ध और अन्य धर्मों के बारे में स्टूडेण्ट्स को पढ़ाता था। इस वजह से मुझो इन धर्मों के बारे में अध्ययन करना पड़ता था कि मैं इन्हें इन धर्मों के बारे में बता सकूं । मेरी क्लास में कुछ अरब के मुस्लिम छात्र भी थे। यूं समझिाए की इस्लाम के बारे में पढ़ाने के लिए खुद अध्ययन करते वक्त मैंने इस्लाम के बारे में काफी कुछ जाना।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;'अरब के वे मुस्लिम छात्र बहुत ही नम्र,शालीन और व्यवहारकुशल थे। मेरी उनसे दोस्ती हो गई। उन्होंने मुझासे मेरे क्लासरूम में रमजान के महीने के दौरान नमाज पढऩे की इजाजत मांगी। दरअसल मेरे क्लासरूम में कारपेट बिछा होता था। वे नमाज अदा करते और मैं उनको पीछे बैठकर देखता रहता। उनसे प्रेरित होकर मैंने भी रोजे रखे हालांकि अभी मैं मुसलमान नहीं हुआ था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'एक बार कुरआन का अध्ययन करते वक्त मेरे सामने यह आयत आई- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें आंसुओं से छलकने लगती हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है। वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;यह आयत पढऩे के बाद मैं यह देखकर हैरान हो गया कि मेरी आंखों से आंसू निकल रहे हैं। मैंने मुश्किल से स्टूडेण्ट्स के सामने अपने आंसू छिपाए।' &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: lime; font-size: large;"&gt;और जिंदगी बदल गई&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिका पर ११ सितम्बर २००१ को आतंकी हमला होने के बाद तौफीक की जिंदगी में एक बहुत बड़ा बदलाव आया।&lt;br /&gt;'उन दिनों मैं भी बाहर नहीं निकला और मैंने देखा कि लोग काफी भयभीत थे। मैं भी काफी डरा हुआ था और आशंका थी कि इस तरह के आतंकी हमले ब्रिटेन में भी हो सकते हैं। उस वक्त पश्चिम के लोग इस्लाम से घबराने लगे और उन्होंने आतंकवाद के लिए इस्लाम को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;'हालांकि मेरा तो मुसलमानों के साथ अलग तरह का अनुभव था और मैं इसके लिए इस्लाम को कतई जिम्मेदार नहीं मानता था। मुझो हैरत हुई-इस्लाम इसके लिए जिम्मेदार कैसे हुआ? कुछ सिरफिरे मुस्लिमों द्वारा किए गए इस कुकृत्य के लिए आखिर इस्लाम को दोषी कैसे माना जा सकता है? जब ऐसी ही किसी घटना को कोई ईसाई अंजाम देते हैं तब तो इसके लिए ईसाइयत को जिम्मेदार नहीं माना जाता? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;एक दिन मैं इस्लाम के बारे में और भी जानने के लिए लंदन की सबसे बड़ी मस्जिद लन्दन सैन्ट्रल मस्जिद पहुंचा। वहां इस्लाम कबूल कर चुके पूर्व पॉप स्टार यूसुफ इस्लाम एक सर्किल में बैठकर लोगों से इस्लाम के बारे में चर्चा कर रहे थे। वहां पहुंचने के थोड़ी देर बाद मैंने उनसे पूछा- आखिर आपने इस्लाम क्यों कबूल किया?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने जवाब दिया-एक मुस्लिम एक ईश्वर में भरोसा करता है। पांच वक्त नमाज अदा करता है। रमजान के रोजे रखता है। मैंने बीच में ही उनको रोकते हुए कहा-मैं भी इन सब में भरोसा रखता हूं और रमजान के दौरान रोजे रखता हूं।,उन्होंने कहा-फिर तुम किस बात का इन्तजार कर रहे हो? कौनसी बात तुम्हें मुसलमान होने से रोके हुए है? मैंने कहा-नहीं, मेरा धर्म-परिवर्तन का कोई इरादा नहीं है।&lt;br /&gt;इसी पल नमाज के लिए अजान हुई और सभी वुजू बनाकर नमाज अदा करने के लिए लाइन में जाकर खड़े हो गए। मैं पीछे की तरफ बैठ गया। मैं मन ही मन चिल्लाया। मन ही मन सोचा आखिर मैं ऐसी बेवकूफी क्यों कर रहा हूं? जब वे नमाज पढ़ चुके तो मैं यूसुफ इस्लाम के पास गया और इस्लाम कबूल करने के लिए कलमा पढ़ाने के लिए उनसे कहा। यूसुफ इस्लाम ने पहले मुझो अंग्रेजी में अरबी कलमे के मायने बताए और फिर मैंने भी कलमा पढ़ लिया-&lt;span style="color: red;"&gt; 'अल्लाह के सिवाय कोई इबादत के लायक नहीं और मुहम्मद सल्ल. अल्लाह के पैगम्बर हैं।'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;यह कहते हुए तौफीक की आंखों में आंसू निकल पड़े।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस तरह तौफीक की जिंदगी ने एक नई दिशा ली। इजिप्ट में रहते हुए तौफीक ने इस्लाम के उसूलों पर एक किताब गार्डन ऑफ डिलाइट लिखी। अपनी इस किताब के बारे में तौफीक ने कहा-&lt;span style="color: blue;"&gt;हर कोई यह कहता है कि इस्लाम का आतंकवाद से कोई ताल्लुक नहीं है और इस्लाम नफरत पैदा करने वाला मजहब नहीं है लेकिन वे लोगों को नहीं बताते कि इस्लाम कितना खूबसूरत मजहब है और इसमें इंसानियत से जुड़े कितने अच्छे उसूल हैं। इस वजह से मैंने इस्लाम के आधारभूत उसूलों पर किताब लिखना तय किया। मैं लोगों को बताता हूंं कि इस्लाम तो इंसानियत को बढ़ावा देने वाला मजहब है जिसमें सबके साथ बेहतर सलूक करने पर जोर दिया गया है। पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. फरमाते हैं-अपने भाई को देखकर मुस्कराना भी नेकी है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तौफीक ने बताया कि वे पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. पर एक किताब लिख रहे हैं जो उन पर पहले से लिखी गई किताबों से अलग हटकर होगी। तौफीक का मानना है कि अपनी जिंदगी में इस्लाम के उसूलों को अपनाकर ही दुनिया के सामने इस्लाम को अच्छे अंदाज में रखा जा सकता है। यही अच्छा तरीका है दुनिया के सामने इस्लाम को सही तरीके से पेश करने का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;यह आर्टिकल इजिप्टियन गजट में २ जुलाई २००७ को अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-4252020534372433304?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://islamicwebduniya.blogspot.com/' title='इंग्लैण्ड का ईसाई पादरी बन गया मुसलमान'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/4252020534372433304/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=4252020534372433304' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/4252020534372433304'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/4252020534372433304'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2010/02/blog-post.html' title='इंग्लैण्ड का ईसाई पादरी बन गया मुसलमान'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/S4FTRW5wApI/AAAAAAAAAT8/Whh4HjYtjDQ/s72-c/priest+idris+tawfiq.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-4994691589563523606</id><published>2009-12-05T10:29:00.002+05:30</published><updated>2009-12-06T21:35:37.801+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्रिकेटर ब्रायन लारा मुसलमान'/><title type='text'>क्रिकेटर ब्रायन लारा मुसलमान हो गया?</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/Sxf84_HOSvI/AAAAAAAAATQ/oOfAybQj2ho/s1600-h/brian+lara.bmp" imageanchor="1" style="cssfloat: left; margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" er="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/Sxf84_HOSvI/AAAAAAAAATQ/oOfAybQj2ho/s320/brian+lara.bmp" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;पिछले कुछ माह से इंटरनेट पर यह मुद्दा जोर पकड़े हुए है। सवालों पर सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या वास्तव में वेस्टइंडीज के महान क्रि केटर ब्रायन लारा मुसलमान हो गए हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;खबर यह है कि पाकिस्तानी क्रिकेटर सईद अनवर और पाकिस्तान के पूर्व पॉप स्टार जूनेद जमशेद के हाथों ब्रायन लारा ने इस्लाम कबूल कर लिया है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;हालांकि इस खबर की पूरी तरह पुष्टि नहीं हुई है लेकिन इन दिनों ब्रायन लारा क्रिकेट को लेकर नहीं बल्कि इस्लाम अपनाने को लेकर चर्चा का विषय बने हुए हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां कुछ लिंक है उन वेबसाइट्स के जहां ब्रायन लारा के इस्लाम कबूलने संबंधी सवाल जवाब है। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://answers.yahoo.com/question/index?qid=20090505050652AA4VBFy"&gt;http://answers.yahoo.com/question/index?qid=20090505050652AA4VBFy&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;a href="http://wiki.answers.com/Q/Did_Brian_Lara_embrace_Islam_How_true_it_is"&gt;http://wiki.answers.com/Q/Did_Brian_Lara_embrace_Islam_How_true_it_is&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;http://www.ummah.net/forum/showthread.php?t=212836&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-4994691589563523606?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://www.islamicwebduniya.blogspot.com/' title='क्रिकेटर ब्रायन लारा मुसलमान हो गया?'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/4994691589563523606/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=4994691589563523606' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/4994691589563523606'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/4994691589563523606'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/12/blog-post.html' title='क्रिकेटर ब्रायन लारा मुसलमान हो गया?'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/Sxf84_HOSvI/AAAAAAAAATQ/oOfAybQj2ho/s72-c/brian+lara.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-3861941503241473887</id><published>2009-10-29T08:18:00.001+05:30</published><updated>2010-07-04T13:06:12.448+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिंथिया से आमिना'/><title type='text'>अमरीकी महिला पत्रकार जो मुसलमान हो गयी</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TDA5Ep5mReI/AAAAAAAAAZs/iy7-Ne9UXuw/s1600/Islam_Logo.gif" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" rw="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TDA5Ep5mReI/AAAAAAAAAZs/iy7-Ne9UXuw/s320/Islam_Logo.gif" width="298" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: #3366ff;"&gt;मेरी कोशिशों से तीन सौ व्यक्तियों ने मादक-द्रव्यों से तौबा की है और इक्कीस मर्दों और औरतों ने इस्लाम ग्रहण किया है। मैं एक अपाहिज औरत हूं। मगर मैं अपने आपको अपाहिज नहीं समझती, क्योंकि मेरा ईमान है कि जो व्यक्ति मुसलमान हो जाए, वह कभी अपाहिज नहीं हो सकता, क्योंकि खुदा उसका सहारा बन जाता है।&lt;/span&gt;सुश्री आमिना अश्वेत अमेरिकी महिला हैं, जो अपनी सामाजिक सेवाओं के कारण विश्व प्रसिद्ध हैं। १९८० ई० में इनके कार्यों पर एक पुस्तक प्रकाशित हुई। उसके अनुसार ३५० व्यक्तियों ने उनकी प्रेरणा से नशा-सेवन छोड़ा था और २१ औरत-मर्दों ने इस्लाम कबूल कर लिया था। &lt;br /&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;उल्लेखनीय बात यह है कि शिकागो न्यूज़ से संबंध रखने वाली विलक्षण प्रतिभा की धनी ये पत्रकार महिला शारीरिक रूप से अपंग हैं। वे शिकागो के हबशियों की झोपड़ पट्टी में पैदा हुई, जहां गन्दगियों, अपराधों, नशाख़ोरियों, निर्धनता और दरिद्रता का गढ़ था। उनका पैदाइशी नाम सिंथिया था और उनके पिता भी हबशियों की तरह आवारागर्द, नशाख़ोर और अपराधी प्रवृति के थे। उनकी मां ही श्वेत लोगों के घरों में मज़दूरी करके घर का खर्च चलाती थी। बाप की लापरवाही और क्रूरता के कारण वे बाल्यावस्था में ही पोलियो का शिकार हो गयीं।&lt;/span&gt; पांच साल की अवस्था में उनकी मां एक सस्ती-सी पहियों वाली कुर्सी खऱीद लायी और उन्हें एक स्कूल में छोड़ आयीं। सिंथिया ने जबसे बोलना शुरू किया था, वे बार-बार कहा करती थीं, मैं स्कूल जाऊंगी, मैं स्कूल जांऊगी। सिंथिया बड़ी समझदार और तीव्र बुद्धिवाली बच्ची थीं। वे अपनी कुर्सी को घसीटती हुई स्कूल चली जातीं। घर आ जातीं और पुस्तकें पढ़ती रहतीं। उनके शिक्षकगण उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। वे बड़ी संतोषी और धैर्यवान थीं। वे किसी हीन भावना से ग्रस्त नहीं हुईं। दूसरे बच्चों को भागते-दौड़ते देखकर वे अपनी विवशता और विकलांगता पर न कभी आंसू बहातीं, न परेशान होतीं और सिर झुकाये बड़ी निष्ठा और एकाग्रता से अध्ययन करती रहतीं। उन्होंने अपने स्कूल मे अपनी प्रतिभा की धाक बिठा दी थी। उन्हें हर वर्ष ईनाम मिला करता था। समय व्यतीत होता गया और सिंथिया १७ साल की हो गयीं। उन्होंने स्कूल की शिक्षा पूरी कर ली थी और अब यूनीवर्सिटी में दाख़िला लेना था। चूंकि उनकी श्रेष्ठ शैक्षिक योग्यता और प्रतिभा से सभी प्रभावित थे, इसलिए उन्हें छात्रवृत्ति मिल गयी और पांच साल तक वे यूनीवर्सिटी में शिक्षा ग्रहण करती रहीं तथा प्रतिष्ठा के साथ उसे पूर्ण किया। फिर एक &lt;span style="color: red;"&gt;स्थानीय समाचार-पत्र शिकागो न्यूज़ में उन्हें नौकरी भी मिल गयी। यही वह ज़माना था, जब सिंथिया अमेरिका के एक प्रसिद्ध अश्वेत नेता मेलकॉम एक्स के चरित्र से परिचित हुर्इं। वह कुख्यात और जाना-पहचाना अपराधकर्मी और नशीले-पदार्थों का हबशी विक्रेता था। वह अनगिनत गंभीर अपराधों में लिप्त था। और जीवन का बड़ा हिस्सा जेलों में व्यतीत कर चुका था। $खुदा का करना यह हुआ कि मेलकॉम मुसलमान हो गया और इससे न केवल उसकी अपनी जिन्दगी में ज़बरदस्त इन्िकलाब आ गया, वह एक नेक इन्सान बन गया, बल्कि उसके प्रचार और प्रेरणा से हजारों अश्वेत लोगों की जि़न्दगियां भी बदल गयीं।&lt;/span&gt; उन्होंने सैकड़ों ऐसे स्वयंसेवक तैयार किये जो विशेषत: अश्वेतों को सन्मार्ग पर लाने और उनको नशे से छुटकारा दिलाने के लिए दिन-रात प्रयत्नशील रहते थे। यह एक नया आन्दोलन था, यह एक नया इन्कलाब था, जो धीरे-धीरे अमेरिका के अश्वेतों में आ रहा था, जो उन्हें सम्मानपूर्वक जि़न्दा रहना सिखा रहा था। &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;सिंथिया मेलकॉम एक्स के दोनों पहलुओं से अवगत थीं, इसलिए उसके दिलो-दिमाग ने इस्लाम धर्म से भी गहरा प्रभाव ग्रहण किया था। चूंकि वे अध्ययनशील प्रवत्ति की थीं इसलिए उन्होंने इस्लाम के बारे में बहुत कुछ पढ़ डाला और उन्हें अपनी परिकल्पनाओं और मानव प्रवत्ति के सर्वथा अनुकूल पाया तो उसे स्वीकार कर लिया।&lt;/span&gt; एक दिन जबकि पहले की तरह उनका पिता शराब के नशे में धुत्त उनकी मां की पिटाई करने वाला था, उन्होंने अपने बाप को समझाना शुरू कर दिया और मां को धीरज बंधाने लगी और बातचीत की तेजी में बता दिया कि वे इस्लाम स्वीकार कर चुकी हैं। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;इस वंृत्तात को खुद सिंथिया, बल्कि आमिना की ज़बानी सुनिए: &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;मेरे&lt;/span&gt; माता-पिता के लिए मुसलमान शब्द अपरिचित न था। मैं नहीं जानती कि इस्लाम और इस्लाम के अनुयायियों के बारे में अमेरिकियों का रवैया बिना रंग-नस्ल क्यों शत्रुतापूर्ण और विरोधपूर्ण हैं। मेरी ज़बान से यह सुनने के बाद कि मैं मुसलमान हो चुकी हूं, मेरे मां-बाप को अत्यन्त आश्चर्य हुआ। ख़ासतौर पर मेरी मां को बहुत दुख हुआ। उनकी यह प्रतिक्रिया तब बहुत परेशान करने वाली थी। मैं उन्हें एक उत्पीडि़त औरत समझती थी। मेरा ख्य़ाल था कि मेरे मुसलमान होने पर वह ज्य़ादा शोर न मचाएगी, किन्तु हुआ इसके विपरीत। मेरे पिता के चेहरे पर घृणा, तिरस्कार, उपहास, लापरवाही की झलक दिखाई दे रही थी और मेरी मां लगातार बोलती जा रही थी। आज जब वह दृश्य याद आता है, तो मैं बेइख़्ितयार मुस्करा देती हूं, परन्तु उस समय मेरी प्रतिक्रिया भिन्न थी। मैं यह महसूस करने लगी थी कि मैनें इस्लाम स्वीकार करने का ऐलान कुछ जल्दी कर दिया। इसका कारण यह न था कि मेरे ईमान में कोई कमी थी, बल्कि यह कि मैने यह फैसला किया था कि जब तक मैं मुसलमानों के तौर-तरीकों को परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से अपना नहीं लेती, तब तक इस्लाम स्वीकार करने का ऐलान नहीं करूंगी। मैं उस क्षण बहुत भावुक हो गई थी। अपने मुसलमान होने का जि़क्र बड़े जोश और जज्बे से कर दिया। मेरे पिता बड़बड़ाते हुए बाहर चल गये। मेरी मां मुझे समझाने लगीं। मंैने कहा--मम्मी जो होना था हो चुका। मैं जो $कदम आगे बढ़ा चुकी हूं वह पीछे नहीं हटा सकती। मेरी मां ने और अधिक सख्ती से समझाना-ब़ुझाना शुरू किया। मंैने उनसे कहा कि वह अपना समय अकारण बर्बाद कर रही हैं। मैं मुसलमान हो चुकी हूं और अब कुछ नहीं हो सकता। मेरी मां ने सोचा शायद मैं जि़द कर रही या भावुक हो गयी हूं। उन्होंने अपना लम्बा भाषण अधूरा छोड़ा और मुझे अकेली छोड़कर चली गयी।&lt;span style="color: #3333ff;"&gt; मैं मुसलमान क्यों हुई? यह बात मुझसे कई लोगों ने पूछी है और मैं कई बार जवाब दे चुकी हूं। इसके बावजूद मैं समझती हूं कि मुझे इस सवाल का जवाब बड़े सुकून और इत्मीनान से देना चाहिए।--- मेरे घरेलू हालात अमेरिका में हबशियों की समग्र परिस्थिति से अधिक मेरी विवशता और अपंगता ने मुझे इस्लाम की ओर प्रेरित किया।&lt;/span&gt; इसका विवरण भी सुन लें। &lt;br /&gt;एक अखबार में काम करने के कारण मैं प्रतिदिन मेलकॉम एक्स और मुसलमान होने वाले अश्वेतों के सुधारवादी आन्दोलन के विषय में पढ़ती थी। चूंकि पोलियो के कारण मैं विवश और अपंग हो चुकी थी और सिवाय अध्ययन के और मेरा कोई कार्य नहीं था। इसलिए मुझमें सोचने-समझने की आदत बहुत बढ़ गयी थी। जब &lt;span style="color: red;"&gt;मैं पढ़ती कि मेलकॉम एक्स और उनके स्वयंसेवक अपने साथियों से नशा-सेवन की लत छुड़ाने में सफल हो रहे हैं, तो मुझे बड़ी हैरत होती। मैं समझती कि यह मात्र एक समाचार है, जिसमें सच्चाई नहीं है। लेकिन फिर भी मैं सोचती कि यह समाचार किस हद तक झूठा हो सकता है? मेरे पास मेरे अपने इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। मगर उस ज़माने में मैंने यह फैसला कर लिया कि मुझे इस्लाम के बारे मेें कुछ पढऩा चाहिए।&lt;/span&gt; मैंने कुछ पुस्तकें प्राप्त की और पढऩे लगी। इस्लाम के बारे में उन पुस्तकों ने मुझे अत्यन्त प्रभावित किया। जब मैंने यह पुस्तकें पढ़ लीं, तो &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;मेरे दिल में कुरआन पढऩे का ख्य़ाल पैदा हुआ और मैंने अंग्रेजी में अनुदित कुरआन की एक प्रति प्राप्त कर ली। पवित्र कुरआन के इस अनुवाद ने मुझे एक अनुपम आत्मिक आनन्द प्रदान किया, जिसे मैं बयान नहीं कर सकती।&lt;/span&gt; &lt;span style="color: red;"&gt;आज मैं समझती हूं कि अगर कोई भी व्यक्ति दिलचस्पी, एकाग्रता और लगन से पवित्र कुरआन का अध्ययन करे तो वह इस पवित्र पुस्तक की सत्यता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। पवित्र कुरआन के अध्ययन ने मुझे कई दिन बेचैन रखा, मेरे दिल में एक अजीब तरह का भावनात्मक उतार-चढ़ाव पैदा हो गया था।&lt;/span&gt; जी चाहता कि अब मेलकॉम एक्स से मिलूं, मगर वे इस शहर से बहूत दूर थे। मैंने समाचार-पत्र के द्वारा यह पता लगाया कि यहां हमारे शहर में कौन ऐसा व्यक्ति है जो मुसलमानों का मार्गदर्शन करता है। उसका पता मुझे जल्द ही मिल गया। मैंने उस व्यक्ति, मुहम्मद यूसुफ को फोन किया और उससे मुलाकात के लिए समय मांगा। दूसरी ओर से मुझे बड़ी हमदर्द और नर्म आवाज़ सुनायी दी। मुहम्मद यूसुफ ने मुझसे कहा कि मैं जिस समय चाहूं उससे मिल सकती हूं। मैंने उन्हें बताया कि मैं कल दोपहर बाद उनसे मिलूंगी। समय निश्चित हो जाने के बाद मैंने संतोष की सांस ली। जब मैं अगले दिन मुहम्मद यूसुफ से मिलने गयी, तो वह मुझे देखकर कुछ परेशान हो गये। मैंने उनकी परेशानी के कारण को भांप लिया। वे किसी स्वस्थ और हष्ट-पुष्ट लड़की से मिलने की आशा रखते थे। जब उन्हें व्हील चेयर में बैठी चलने-फिरने में विवश मुझ जैसी लड़की दिखायी दी, तो वे कुछ परेशान से हो गये, लेकिन मेरी खुशदिली ने उनकी परेशानी को जल्दी खत्म कर दिया। &lt;span style="color: #009900;"&gt;मुहम्मद यूसुफ मेरी तरह ही अश्वेत थे। कभी उनका नाम जॉन ब्लेगडन था। अब वे मुहम्मद यूसुफ जैसे खूबसूरत नाम के मालिक थे। वे इस शहर के मुसलमानों के इमाम थे। वही मस्जि़द में नमाज़ पढ़ाते और वही कुरआन की शिक्षाओं पर प्रवचन करते थे।&lt;/span&gt; वे हमदर्दी भरे लहजे में मुझसे मेरे बारे में बातचीत करते रहे। बातों-बातों में बड़े गैर महसूस अन्दाज़ में उन्होंने मुझसे मेरे परिवार के बारे में सारी जानकारियां प्राप्त कर लीं। मैंने उनसे पूछा कि वे मुसलमान क्यों हुए थे? मुहम्मद यूसुफ मुस्करा दिए। फिर &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;उन्होंने धीमे से बड़े मीठे लहजे में जवाब दिया- मैं इसलिए मुसलमान हुआ कि खुदा तआला कि यह मरजी थी कि वह मुझे सीधा रास्ता दिखाए। उनका वह जवाब मैं आज तक नहीं भूली हूं और जिन्दगी भर न भूल सकूंगी, क्योंकि मैं भी यही समझती हूं कि अल्लाह तआला जिस इन्सान को सीधे रास्ते पर लाना चाहता है, उसके दिल में इस्लाम के लिए मुहब्बत पैदा कर देता हैं।&lt;/span&gt; मुहम्मद यूसुफ ने मुझे बताया कि वे भी अश्वेतों के गरीब और पिछड़े इलाके में पैदा हुए थे। उन्होंने बचपन गरीबी और कंगाली में गुज़ारा। बड़े हुए तो एक ऐसे होटल में नौकर हो गये, जहां उन्हें बर्तन मांजने के लिए रखा गया था। मगर उनसे जरूरी काम और भी लिया जाता था। उन्हें कुछ पैकेट दे दिये जाते कि उन्हें अमुक जगह पहुंचा दें। इस काम के बदले उन्हें इनाम में एक-आधा डॉलर मिल जाता था। एक दिन उनके जी में आया कि एक पैकेट को खोलकर देखना चाहिए। जब उन्होंने खोलकर देखा तो उसमें उन्हें हशीश मिली। उन्होंने यह हशीश महंगे दामों में बेच दी और होटल वापस न गये। मगर होटल के प्रबंधकों ने उन्हें खोज निकाला, पैकेट मांगा और ज़ब पैकेट न मिला तो उनकी खूब पिटायी की। वे कई दिनों तक बिस्तर से न उठ सके। इस घटना के बाद वह गुनाहों की दुनिया में पहुंच गये। तीस वर्ष की उम्र तक उन्होंने ऐसा बुरा काम किया।...... हीरोइन और दूसरे नशीले पदार्थो का गुप्त धंधा करते-करते, $खुद भी इन नशीले पदार्थों के सेवन के आदी हो गये। उन्हें कई बार सज़ा हो चुकी थी। मगर वे सजा के भय से मुक्त हो चुके थे। एक बार जब वे जेल में थे तो कुछ लोग उनसे मिलने आये। ये स्वयंसेवक मुसलमान थे, जो कैदियों में इस्लाम का प्रचार कर रहे थे। उनके प्रचार से मुहम्मद यूसुफ अत्यन्त प्रभावित हुए और उनका जी चाहने लगा कि वह ससम्मान और निश्चिन्त जीवन व्यतीत करें। जब वे जेल से रिहा हुए तो बहुत बदल चुके थे। मगर उन्हें जि़न्दा रहने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही था। वे कुछ भी नहीं जानते थे। इसलिए उन्होंने यही सोचा कि अब फिर उन्हें आपराधिक जीवन व्यतीत करके ही पेट पालना पड़ेगा। वही स्वयंसेवक जिन्होंने जेल में उनके विचारों को बदलने की कोशिश की थी, उनसे मिले। उन्होंने उनके लिए रोज़गार का बन्दोबस्त किया। कुछ नकद रकम दी, ताकि जब तक उन्हें वेतन नहीं मिलता, वह इस रकम से अपना समय बिताएं। वे उन्हें अपने साथ रखते। इस तरह मुहम्मद यूसुफ जो कभी जॉन ब्लेगडन थे, मुसलमान हो गये। इस्लाम के साथ उनके लगाव का यह हाल था कि एक साल में उन्होंने कुरआन मजीद अरबी में पढ़ लिया। इस राह में उन्हें बहुत सी-दि़क्कतें और परेशानियां पेश आयीं। मगर वे किसी परेशानी से न घबराये। &lt;br /&gt;कुरआन मजीद की शिक्षा के बाद वे इस्लामी तौर-तरीकों और जीवन-शैली को अपनाने में कामयाब हो गये। चार साल बाद उन्हें उस इलाके में मुसलमानों का इमाम बना दिया गया। इमाम बनने के बाद उन्होंने अपनी कोशिशों से ज़मीन के लिए चन्दा जमा किया और वहां एक छोटी-सी मस्जि़द बनवा दी। उस मस्जि़द के निर्माण में खुद उन्होंने और दूसरे मुसलमानों ने हिस्सा लिया था। वे ख़ुद मज़दूरी करते और उसकी मज़दूरी न लेते थे। मैं &lt;span style="color: red;"&gt;मुहम्मद यूसुफ की जि़न्दगी और उनकी बातों से अत्यन्त प्रभावित हुई और उनसे कहा कि मैं मुसलमान होना चाहती हूं। मुहम्मद यूसुफ साहब ने पहली बार मुझे भरपूर नज़रों से देखा और बोले, खुदा मुबारक करे, मगर मुसलमान होना बहुत मुश्किल हैं। मैं हर मुश्किल पर क़ाबू पाऊंगी। अलहम्दुलिल्लाह, उन्होंने कहा, क्या तुम्हें कलिमा और नमाज़ आती है? मैंने न में सिर हिलाया, तो उन्होंने मुझे एक छोटी-सी किताब दी। उसमें रोमन लिपि में कलिमा और नमाज़ लिखी हुई थी। कहने लगे, इसे याद कर लो और अगर हो सके तो तीसरे पहर को मेरे पास थोड़ी देर के लिए आ जाया करो। मैंने कुछ दिनों में न केवल कलिमा और नमाज़ याद कर ली बल्कि उनके अर्थ भी समझ लिये। उस दौरान मैं मुहम्मद यूसुफ से भी मिलती रही और उनसे इस्लाम धर्म के बारे में जानकारियां हासिल करती रही। जुमा का दिन था। मस्जि़द में मैंने सभी मुसलमानों के सामने कलिमा पढ़ा और मुसलमान हो गयी। मेरा नाम आमिना रख दिया गया। मुसलमान होने के बाद मैंने पहला काम यह किया कि खाने के साथ थोड़ी-बहुत शराब पीने की जो आदत थी उसे छोड़ दिया। मैं सिगरेट भी पी लिया करती थी। यह भी छोड़ दी।&lt;/span&gt; और मुसलमान औरतों जैसा लिबास सिलने के लिए दे दिया। मैं समझती थी कि जब मैं मुसलमान औरतों की तरह लम्बे चोग़े मेें अपना शरीर छिपाऊंगी और सिर को भी ढांपूंगी तो व्हील चेयर में बैठी हुई हास्यास्पद दिखायी दूंगी। मैंने हर ताना और मज़ाक का सामना करने का फैसला कर लिया। जब मैं पहली बार मुसलमान औरतों का लिबास पहनकर घर से निकलने लगी तो मेरी मां ने मुझे हैरत से देखा और बोली, सिंथिया, क्या पहन रखा है तुमने उसके चेहरे पर तंज़ था। मेरे पिता ने भी, जो रात भर शराब पीने के बाद अब कुर्सी पर बैठे ऊंघ रहे थे, अपनी लाल-लाल आंखें खोलकर मुझे देखा और कहक़हा लगाया। मैंने कहा,मम्मी याद रखिए, मेरा नाम आमिना है, सिंथिया नहीं। आ-मिना-क्या नाम हुआ यह भला, मां ने कहा , लड़की तेरा दिमाग तो नहीं चल गया। मैंने अपनी मां को समझाने की कोशिश की कि मैं उन्हें बता चुकी हूं और अब मुसलमान की तरह विधिवत जिन्दगी की शुरुआत कर चुकी हूं। तुम्हारी जगह जहन्नम में है...... इससे पहले कि वह कुछ और कहतीं मैंने उसकी बात काटकर कहा, मम्मी आपको मेरे मामले में दखल देने की ज़रूरत नहीं। अगर कोई बात करनी है तो जब में दफ्तर से आऊंगी तो कर लेना। इस समय मुझे देर हो रही है। मैं व्हील चेयर को धकेलती हुई बाहर निकल गयी। हबशियों की उस गन्दी बस्ती में मुझे जिसने उस लिबास में देखा, वह पहले तो हैरान हुआ, फिर मज़ाक उड़ाने लगा। मगर मैंने किसीकी एक न सुनी और अपनी राह चलती रही। जब मैं अपने अखबार के दफ्तर पहुंची तो वहां भी अत्यन्त तीखी प्रतिक्रिया हुई। बहुत-से लोग मेरे चारों ओर जमा हो गये। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं मुसलमान हो गयी हूं और मुसलमान औरतें ऐसा ही लिबास पहनती हैं, तो कुछ लोग ख़ामोश हो गये और कुछ लोग बड़बड़ाते हुए चले गये। संयोग से उस दिन वेतन का दिन था। वेतन मिला तो मैंने उसका एक चौथाई हिस्सा अपने इलाके की मस्जि़द के में जमा करा दिया। &lt;br /&gt;जब मैं घर लौटी तो मेरी मां मेरा इन्तज़ार कर रही थी। मेरे पिता भी घर पर मौजूद थे। मैं वेतन का आधा हिस्सा अपनी मां को दे दिया करती थी। उस रकम से मेरे पिता अपने नशे के लिए कुछ पैसे ऐंठ लिया करते थे। मैंने जब अपने वेतन की कुछ रकम अपनी मां को दी तो उसने हैरत से मुझे देखा और पूछा, तुमने इस बार दस डॉलर कम दिए हैं। हा,अब हर महीने आपको इतनी रकम मिलेगी। मैंने अपने वेतन का एक चौथाई मस्जि़द को देने का फैसला कर लिया है। मेरी यह बात सुनते ही वे मुझे, मुसलमानों और मस्जि़द को कोसने लगी। मैंने कोई जवाब देना उचित नहीं समझा और अपने कमरे में चली गयी। बहुत देर तक अपनी मां को बकते-झकते सुनती रही। बीच-बीच में मेरे पिता की आवाज़ भी सुनायी देती थी। अब सिंथिया हमारे हाथ से निकल गयी। मुसलमानों ने इसका दिमाग खराब कर दिया हैं। हमने तो कभी गिरजे को चन्दा नहीं दिया। यह वेतन का एक चौथाई मस्जि़द को देने लगी हैं। मेरे मां-बाप के नज़दीक मुसलमान लुटेरों से कम न थे, जो उनकी बेटी की कमाई लूटकर ले गये थे। धीरे-धीरे मैंने अपनी जि़न्दगी इस्लाम के नियमों और तौर-तरीकों के मुताबिक ढाल ली थी। वे लोग जो पहले मुझ पर उंगलियां उठाते थे, मुझसे लापरवाह हो गये। और फिर &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;क्रिसमस का त्यौहार आ गया। हम चाहे कितने ही खराब और बदहाल क्यों न हों, क्रिसमस को ठाट-बाट से मनाने का इन्तिज़ाम ज़रूर करते हैं। क्रिसमस के दिन शराब पानी की तरह बहायी जाती है। जब मैंने मेहमानों के साथ शराब के प्याले को छूने से ही इन्कार कर दिया तो हमारे घर में $िकयामत बरपा हो गयी। पिता तो सुबह से नशे में धुत थे। मां भी दो-एक बार मेहमानों के साथ पी चुकी थी। नशे की हालत में वे मुझ पर बरसने लगे। मेहमान भी नशे में थे। वे भी, जो उनके मुंह में आया, बकने लगे।इन सबकी हालत दयनीय थी। मैंने सोचा कि मुझे इस कमरे से चले जाना चाहिए। मगर जब में अपनी व्हील चेयर को धकेल कर जा रही थी,तो एक मेहमान लडका और मेरे पिता मेरे पीछे लपके और व्हील चेयर के सामने खडे हो गये। मैंने कहा,रास्ता छोड़ दें,मुझे जाने दें। यह पी लो। फिर चली जाना, लड़के ने मेरे रास्ते से हटे बिना शराब का प्याला मेरे आगे किया। मैं लानत धिक्कार भेजती हंू इस पर। मेरे मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा लगा, जो मेरे पिता ने मारा था। मेरा सिर चकरा गया। आंखों में आंसू आ गये।&lt;/span&gt; मगर मेरे पिता और उस लड़के में तो जैसे शैतान की आत्मा घुस गयी थी। वे मुझे पीटने लगे। उन्होंने मुझे रूई की तरह धुन दिया। मैं चुपचाप यह अत्याचार सहती रही। वे गालियां बक रहे थे। नशे में उनके मुंह से झाग बह रहा था। जब वे थककर बैठ गये तो मैं किसी न किसी तरह अपने कमरे में पहुंच गयी। इस रात मैंने फैसला किया कि मुझे क्या करना है। मेरी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि मुझे अपनी मस्जि़द के इमाम मुहम्मद यूसुफ को अपनी सारी विपदा सुनानी चाहिए। और फिर यह घर छोड़ देना चाहिए। लेकिन ज्यों-ज्यों मेरा $गुस्सा और जोश ठंडा होता गया, मेरी सोच बदलती गयी। मैंने सोचा कि मुझे अपनी परेशानियां लेकर मुहम्मद युसूफ के पास नहीं जाना चाहिए। उनका हल जरूर तलाश करना चाहिए और अपने माता-पिता के साथ ही रहना चाहिए। उनका मुझ पर अधिकार है और मेरा भी यह कर्तव्य बनता है कि मैं उनकी जि़न्दगी बदलने की कोशिश करूं। अत: उस रोज मैंने एक महत्वपूर्ण फैसला किया और अगले दिन मैंने अपने इस फैसले से मस्जि़द के इमाम मुहम्मद यूसुफ को सूचित कर दिया। मैंने अखबार की नौकरी छोड़ दी और स्वयंसेविका बन गयी। मुझे साधारण-सा गुज़ारा भी मिलने लगा। जब मेरे मां-बाप को मेरे इस फैसले का ज्ञान हुआ, तो वे बहुत सटपटाए। वे यह सोच भी नहीं सकते थे कि मैं अच्छी-भली नौकरी छोड़ दूंगी। मैंने उनसे कहा कि वे चिन्ता न करें। उनको उनका हिस्सा मिलता रहेगा। मैं अखबारों के लिए लिखूंगी और जो पारिश्रमिक मुझे वहां से मिलेगा, वह में उनको दे दिया करूगीं। मेरे इस व्यावहारिक जीवन का आंरभ उस समय हुआ जब मैं मुसलमान स्वयंसेविका बन गयी। मुहम्मद युसूफ ने मुझे बहुत-से निर्देश दिये और जिस काम के लिए मुझे चुना गया, उस राह के ख़तरों से मुझे अवगत किया। मुझे खुद भी अन्दाज़ा था कि यह रास्ता कांटों से भरा है। मगर इस्लाम ने मुझे साहस दिया। इसके कारण मैं किसी खतरे पर ध्यान नहीं दे रही थी। &lt;span style="color: red;"&gt;मैं जेलों में जाने लगी। वहां मैं कैदियों से मिलती।उनके सामने इस्लाम की महिमा बयान करती। उनको उनकी जि़न्दगी के घिनौने पहलू दिखाकर उनको बेहतर जि़न्दगी गुज़ारने की सलाह देती। कुछ कैदी समय काटने के लिए मेरी बातों को ध्यान से सुनते। कुछ मेरा मज़ाक उड़ाते। उनमें ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने मेरी शारीरिक अपंगता पर भी कहकहे लगाये। मगर में तनिक भी भयभीत न हुई, न मेरी हिम्मत ने जवाब दिया।&lt;/span&gt; इन कैदियों में से एक हबशी कैदी अरबिन्तो भी था। उसने मेरी बातों का अच्छा प्रभाव ग्रहण किया और एक दिन कहने लगा, तुम बड़ी साहसी लड़की हो। अगर तुम वास्तव में चाहती हो कि बुराई का अन्त हो जाए तो बरनार्डो को खत्म कर दो। बरनार्डो कौन है? मैंने पूछा। बरनार्डो इस शहर के एक बड़े माफिया गिरोह का प्रमुख है। यही व्यक्ति है जो इस शहर में मादक द्रव्यों का एकाधिकारी है। अगर वह न हो तो इस शहर में लोगों को मादक-द्रव्य न मिले और लोग इसके आदी न हों। वह बड़ा खतरनाक आदमी है। आज मैं जिस हालत मैं पहुंचा हूं, उसका जिम्मेदार भी बरनार्डो है। मैं बरनार्डो से कैसे मिल सकती हूं। उसने मेरे कान में मुझे बरनार्डो का पता बता दिया। जब में जाने लगी, तो अरबिन्तो का लहजा बिल्कुल बदल गया था। वह अफसोस जताते हुए बोला, मुझसे गलती हुई कि मैंने तुमसे बरनार्डो का जि़क्र किया। तुम इन सारी बातों को भूल जाओ। तुम अन्दाज़ा नहीं कर सकती हो कि बरनार्डो कितना खतरनाक आदमी है। मगर मैं उससे मिलने का फैसला कर चुकी हूं, मैंने साहस के साथ कहा। तुम उससे मिलकर क्या करोगी? उसने पूछा। उसको सीधा रास्ता दिखाने की कोशिश करूंगी। वह हंसने लगा। उसके कहकहे दूर तक मेरा पीछा करते रहे। सुबह का समय था जब मैं वक्त तय किए बिना बरनार्डो के आलीशान घर के अन्दर दािखल हुई। उस घर को देखकर कोई व्यक्ति अनुमान नहीं कर सकता कि उस घर में रहने वाला व्यक्ति कोई बहुत बड़ा अपराधी है। तुम यहां क्या कर रही हो? एक नौकर ने मुझे रोककर पूछा। वह मेरे लिबास और मेरी व्हील चेयर को ध्यान से देख रहा था। मुझे मिस्टर बरनार्डो से मिलना है, मैंने कहा। तुम्हें? उसने कहकहे लगाकर कहा, मिस्टर बरनार्डो से मिलना इतना आसान नहीं। आखिर क्यों? मैंने कहा। वह भी इन्सान है और इन्सान इन्सान से मिला-जुला करते हैं। हम दोनों में तू-तू, मैं-मैं होने लगी। उसी समय एक अधेड़ उम्र का मज़बूत शरीर वाला आदमी एक कमरे से बाहर निकला और गुस्से से बोला, यह क्या हो रहा है और शोर क्यों मचा रखा है? नौकर ने उस आदमी के आगे सिर झुकाकर कहा, यह लड़की आपसे मिलने की जि़द कर रही थी। उसने पूछा-मुझसे क्या काम है? मैं आपसे एकान्त में बात करना चाहती हूं, मैंने कहा। &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;बरनार्डो ने कुछ विस्मय से मेरी और देखा। फिर नौकर को वहां से जाने का इशारा किया। जब नौकर वहां से चला गया तो बरनार्डो ने बड़े अभिमान से कहा, मैं इस तरह किसी से मुलाकात नहीं करता हूं। तुम विक लांग हो, इसलिए रुक गया हूं। कहो, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं? मैंने उसकी और देखा और उसकी आखों में आंखे डालकर कहा, मिस्टर बरनार्डो क्या सचमुच आप इस विकलांग लड़की के किसी काम आना चाहते हैं? उसने जवाब देने से पहले कुछ सोचा फिर मुस्कराकर कहा, हां, कहो मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं? मैंने फिर उसकी आंखों में आंखें डाल दीं। मैंने महसूस किया कि मिस्टर बरनार्डो कुछ बेचैनी महसूस कर रहा है। वह मेरी नज़रों से नजरे़ं चुरा था। मैंने कहा-मिस्टर बरनार्डो अल्लाह ने आपको सब कुछ दिया है। अब आपको हिदायत की जरूरत है, सच्ची हिदायत की। लड़की मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो, मेरा वक्त बहुत कीमती है। दो मिनट में अपनी बात खत्म करो। मैंने जब बात शुरू की तो बरनार्डो का चेहरा ग़्ाुस्से से लाल हो गया। उसने गुस्से को दबाकर कहा, तुम पागल हो। निकल जाओ यहां से।&lt;/span&gt; तुम्हें किसने बताया है कि मैं यह काम करता हूं। मैं तुम्हें और तुमको बताने वाले को जि़न्दा न छा़ेडूगा। मैंने बड़े इत्मीनान से कहा, आपके इस गुस्से और जोश से ही जाहिर हो जाता है कि मुझे आपके बारे में जो सूचना मिली है वह ठीक है। तुम बकती हो। चली जाओ यहां से। मुझे तुम्हारी विकलांगता का ख्याल आ रहा है, नहीं तो.....। मैं जानती हूं मिस्टर बरनार्डो आप बहुत ताकतवर हैं। सारा शहर आपके चंगुल में फंसा हुआ है। ''आखिर तुम चाहती क्या हो? बरनार्डो ने गरजकर कहा। &lt;span style="color: red;"&gt;''मैं चाहती हूं कि आप खुदा के बन्दों के फायदे के लिए अपना यह धंधा छोड़कर कोई और काम करें और अगर आपसे संभव नहीं तो फिर मुझ विकलांग लड़की पर दया करें। मुझे प्रतिदिन पांच मिनट मुलाकात का वक्त दे दिया करें।ÓÓ वह हैरत से मेरा मुंह ताकने लगा। फिर उसने कहकहा लगाया और बोला, ''तुम धुन की पक्की हो।...तुम कल फिर आ सकती हो इसी वक़्त।ÓÓ मैं वहां से निकली तो अत्यन्त संतुष्ट थी।&lt;/span&gt; बरनार्डो इटालवी मूल का था। दिल का खुला। उसको जिन्दगी में शायद ही मुझ जैसा कोई इन्सान मिला हो। वह मेरे व्यक्तित्व में रुचि लेने लगा। एक दिन के बाद दूसरा दिन...वह मुझे हर रोज बुलाता। मुझसे बातें करता। पांच मिनट की बातचीत की परिधि फैलकर घंटों तक पहुंच गयी। मैं उसके सामने इन्सानों का जिक्र करती। मादक द्रव्यों की विनाशकारिता बयान करती। इस्लाम की सत्यता का उल्लेख करती। धीरे-धीरे उसके विचारों में कुछ लचक पैदा होने लगी। &lt;span style="color: #33ff33;"&gt;''आमिना! एक दिन उसने मुझसे कहा, ''मैं नही जानता कि तुम कौन हो? मुसलमान क्या होते हैं? मगर मैं एक बात जान गया हूं कि तुम मानव मनोविज्ञान को खूब समझती हो। ''इस्लाम इन्सानों का धर्म है, पूर्ण धर्म।Ó मैंने जवाब दिया, ''इसलिए इस्लाम मुसलमानों को मानव-मनोविज्ञान पर गहरी नजर रखने की हिदायत करता है। मैंने महसूस किया कि अब जब मैं उससे मिलने जाती हूं वह कुछ बेचैनी महसूस करने लगता है। उसने एक दिन मुझसे कहा, ''आमिना! वास्तव में इन्सान की जिन्दगी नश्वर है और इन्सान को दुनिया में अच्छे काम करने चाहिए। दूसरों का भला सोचना चाहिए। ''अलहम्दुलिल्लाह, मैंने जवाब दिया,&lt;/span&gt; ''खुदा का लाख-लाख शुक्र है कि यह बात आपके मन में बैठ गयी। &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;कुछ&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt; दिनों के बाद बरनार्डो ने अपना धंधा छोड़ दिया। वह सीधे रास्ते पर आ गया। उसने बिना हिचकिचाहट स्वीकार कर लिया कि वह माफिया गिरोह का सदस्य है। उसने माफिया के छिपे भेदों को खोलकर रख दिया। आपको याद होगा कि राष्ट्रपति फोर्ड के कार्यकाल में बरनार्डो के इस काम से अमेरिका में कितना तहलका मचा था! बरनार्डो ने पत्रकारों से कहा था, ''एक अपाहिज और चलने-फिरने से विवश लड़की ने मुझे यह उडऩशक्ति प्रदान की है कि मैंने बुराइयों की जंजीरों को तोड़ दिया है और स्वतंत्र वातावरण में उडऩे का साहस अपने अन्दर महसूस कर रहा हूं।ÓÓ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;उस&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt; दिन मैं बहुत रोयी थी, जब मुझे खबर मिली कि बरनार्डो को जेल में गोली मार दी गयी है। उसको माफिया के आदमियों ने मार डाला था। उसका जिन्दा रहना उनके लिए खतरनाक साबित हो सकता था। वह एक ऐसा इन्सान था,जो सच्चाई की राह पर चल निकला था। वह जिन्दा रहता तो बड़ा सुधारक साबित हो सकता था।&lt;/span&gt; बरनार्डो के प्रायश्चित करने के कारण मुझे प्रेस ने बड़ी प्रसिद्धि दी थी। मेरे भाषण प्रकाशित होने लगे। पत्र-पत्रिकाओं में मेरे इंटरव्यू प्रकाशित हुए। टी.वी. और रेडियो पर मुझे बुलाया गया और मेरी सेवाओं की बड़ी प्रशंसा की गयी। विश्व हेवीवेट चैम्पियन मुहम्मद अली मुझसे मिलने आये। उन्होंने मेरी बड़ी प्रशंसा की। राष्ट्रपति फोर्ड ने मुझे ह्राइट हाउस में बुलाया और मेरी सराहना की। इस शोहरत और इज्जत के बावजूद मुझमें घमंड पैदा नहीं हुआ, क्योंकि घमंड अल्लाह को पसन्द नहीं है। &lt;span style="color: red;"&gt;इस्लाम ने मेरे जीवन में जो परिवर्तन पैदा किया,मैं सारी दुनिया में फैला देना चाहती हूं और अगर यह मेरे वश में नहीं तो मेरे दिल में यह इच्छा जरूर है कि इस्लाम की बरकतों से अमेरिका के अश्वेत लोग अवश्य लाभान्वित हों। मेरे पिता हर नशा छोड़ चुके हैं। मेरी मां मेरी इज्जत करती हैं, यद्यपि उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा। तथापि उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आ चुका है। पिछले कुछ वर्षों में मेरी कोशिशों से तीन सौ व्यक्तियों ने मादक-द्रव्यों से तौबा की है और इक्कीस मर्दों और औरतों ने इस्लाम ग्रहण किया है। मैं एक अपाहिज औरत हूं। मगर मैं अपने आपको अपाहिज नहीं समझती, क्योंकि मेरा ईमान है कि जो व्यक्ति मुसलमान हो जाए, वह कभी अपाहिज नहीं हो सकता, क्योंकि खुदा उसका सहारा बन जाता है। मेरी जिन्दगी इस्लाम को समर्पित हो चुकी है। मैं इस्लाम ही के लिए काम करूंगी और इस्लाम की रूह (आत्मा) इन्सानों में फूंक देना चाहती हूं जब भी कोई इन्सान बुराई का रास्ता छोड़ देता है, मैं तो समझती हूं कि इस्लाम की जीत हुई है।-तो यह है मेरी कहानी-सिंथिया से आमिना बनने की।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-3861941503241473887?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/3861941503241473887/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=3861941503241473887' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/3861941503241473887'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/3861941503241473887'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/10/blog-post_28.html' title='अमरीकी महिला पत्रकार जो मुसलमान हो गयी'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TDA5Ep5mReI/AAAAAAAAAZs/iy7-Ne9UXuw/s72-c/Islam_Logo.gif' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-3512900515802319269</id><published>2009-10-21T09:08:00.000+05:30</published><updated>2009-10-21T09:35:04.176+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल-इस्लाम'/><title type='text'>अमन और सुकून का केन्द्र केवल इस्लाम</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/St6EyKSrgMI/AAAAAAAAARk/qzDBuLaF2bw/s1600-h/pickthall.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5394895400927461570" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 93px; CURSOR: hand; HEIGHT: 130px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/St6EyKSrgMI/AAAAAAAAARk/qzDBuLaF2bw/s320/pickthall.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;मैं अध्ययन के बाद मुसलमान हुआ हूं। मेरे दिल में इस्लाम की बहुत कद्र है। मुसलमानों को इस्लाम विरासत में मिला है। इसलिए वे उसकी कद्र नहीं पहचानते। सच्चाई यह है कि मेरी जि़न्दगी में जितनी मुसीबतें आयीं, उनमें  , अमन व सुकून की जगह केवल इस्लाम में ही मिली।&lt;/span&gt; ।                          &lt;/div&gt;&lt;div&gt;   &lt;span style="color:#3333ff;"&gt; -मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल,इंग्लैण्ड&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;  मार्माडियूक पिकथॉल 17 अप्रैल 1875 ई० को इंग्लैण्ड के एक गांव में पैदा हुए। उनके पिता चाल्र्स पिकथॉल स्थानीय गिरजाघर में पादरी थे। चाल्र्स के पहली पत्नी से दस बच्चे थे। पत्नी की मृत्यु के बाद चाल्र्स ने दूसरी शादी की, जिससे मार्माडियूक पिकथॉल पैदा हुए। &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;मार्माडियूक ने हिब्रो के प्रसिद्ध पब्लिक स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। उनके सहपाठियों में, जिन लोगों ने आगे चलकर ब्रिटेन के राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया, उनमें सर विंस्टन चर्चिल भी शामिल थे। चर्चिल से उनकी मित्रता अंतिम समय तक क़ायम रही।&lt;/span&gt; स्कूल की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनके सामने दो रास्ते थे। एक यह कि उच्च शिक्षा के लिए ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दाख्िला ले लें या फिर अपने एक मित्र मिस्टर डोलिंग के साथ फि़लिस्तीन की सैर को जाए। फि़लिस्तीन पर उस जमाने में तुर्कों की हुकूमत थी। डोलिंग की वहां अंग्रेजी दूतावास में नौकरी लग गयी थी। मार्माडियूक ने दूसरा मार्ग चुना और ऑक्सफोर्ड में दाख़्िाला लेने के विचार को त्यागते हुए फि़लिस्तीन की ओर चल पड़े। यहीं से उनके जीवन में वह इन्कलाबी मोड़ आया, जिसने हमेशा के लिए उनके भविष्य का  फै़सला कर दिया। &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पिकथॉल साहब असाधारण प्रतिभा के मालिक थे। विभिन्न भाषाओं को सीखने का उन्हें बहुत शौक था। इसी के चलते उन्होंने मातृभाषा अंग्रेज़ी के अलावा फ्रांसीसी, जर्मन, इतावली और हस्पानवी भाषा में निपुणता प्राप्त कर ली। मध्य पूर्व में वे कई वर्षों तक रहे। सीरिया, मिस्त्र और इरा$क की सैर करते रहे। बैतूल मुकद्दस में उन्होंने अरबी सीखी और उसमें महारत हासिल की। उसी जमाने में वे इस्लाम से इस हद तक प्रभावित हो चुके थे कि मस्जिदे अक़्सा में शैख्ुल जामिया से अरबी पढ़ते-पढ़ते उन्होंने धर्म परिवर्तन की इच्छा जतायी&lt;/span&gt;। शैख् एक समझदार एवं दुनिया देखे हुए व्यक्ति थे। उन्होंने यह सोचकर कि कहीं यह इस नौजवान का भावुक फै़सला न हो, उन्हें अपने माता-पिता से सलाह लेने का सुझाव दिया। इस संबंध में पिकथॉल स्वयं लिखते है: इस सुझाव ने मेरे दिल मे अजीब तरह का प्रभाव डाला। इसलिए कि &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;मैं यह समझ बैठा था कि मुसलमान दूसरों को अपने धर्म में लाने के लिए बेताब रहते हैं, मगर इस बातचीत ने मेरे विचार बदल कर रख दिये। मैं यह समझने पर मजबूर हो गया कि मुसलमानों को अनावश्यक रूप से पक्षपाती कहा जाता है।&lt;/span&gt; इस्लाम के बारे में पिकथॉल का अध्ययन जारी रहा और इसका प्रभाव उन पर पड़ता रहा। &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;मिस्त्र और सीरिया के मुस्लिम समाज का भी उन्होंने गहरा अध्ययन किया और उन्हें करीब से देखा। इन सारी चीज़ों ने मिलकर उनके मन-मस्तिष्क पर इतना प्रभाव डाला कि उन्होंने अरबी पोशाक पहननी शुरू कर दी। इस्लाम की वास्तविकता उनकी रूह के अन्दर उतरती चली गयी।&lt;/span&gt; 1913 में पिकथॉल तुर्की गये, जहां उन्होंने तुर्कों के राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का अध्ययन किया। तुर्कों के सामाजिक एवं स्वाभाविक गुणों ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। अतएव वे गाज़ी तलत बक सहित कई तुर्क नौजवानों का उल्लेख करते हुए कहते हैं: एक दिन मैंने तलत बक से कहा कि आप यूं ही बिना किसी हथियार के टहलते फिरते हैं। आपको अपने साथ हथियारबन्द रक्षक रखने चाहिए। जवाब में उन्होंने कहा कि खुदा से बढ़कर मेरा कोई रक्षक नहीं। मुझे उसी पर भरोसा है। इस्लामी शिक्षा के अनुसार समय से पहले मौत कभी भी नहीं आ सकती। पिकथॉल साहब गाज़ी अनवर पाशा, शौकत पाशा, गाज़ी रऊफ़  बक, और दूसरे तुर्क रहनुमाओं का उल्लेख बड़े ही अपनेपन से करते थे। उनकी सोच थी- लोग व्यर्थ ही तुर्कों पर अधर्मी होने का आरोप लगाते हैं। मैंने उन्हें हमेशा खुदा से डरने वाला मुसलमान पाया।       तुर्की में ही उन्होंने इस्लाम क़बूल करने का पक्का इरादा कर लिया। उन्होंने गाज़ी तलत बक से कहा: मैं मुसलमान होना चाहता हूं। जिसका जवाब उन्होंने यह दिया कि कुसतुन्तुनिया में आप अपने इस्लाम कबूल करने की घोषणा मत कीजिए। अन्यथा हम लोग अन्तरराष्ट्रीय कठिनाइयों में फंस जाएंगे। अच्छा है कि इसकी घोषणा लन्दन से हो। यूरोप में दावत के दृष्टिकोण से इसके ज़बरदस्त नतीजे निकलेंगे। इसी सुझाव का नतीजा था कि &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;पिकथॉल साहब ने लन्दन जाकर दिसम्बर 1914 मे इस्लाम कबूल करने की घोषणा की। इस घोषणा से लन्दन की इल्मी व राजनीतिक दुनिया में हलचल सी मच गयी। ईसाई कहने लगे कि जिस धर्म को पिकथॉल जैसा व्यक्ति स्वीकार कर सकता है उसमें निश्चित रूप से दिल मोह लेने वाली अच्छाइयां होंगी।&lt;/span&gt;  इस्लाम कबूल करने पर पिकथॉल साहब के विचार ये थे-&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;मैं अपने अध्ययन के बाद मुसलमान हुआ हूं। मेरे दिल में उसकी बहुत कद्र है। मुसलमानों को इस्लाम विरासत में बाप-दादा की तरफ से मिला है। इसलिए वे उसकी कद्र नहीं पहचानते। सच्चाई यह है कि मेरी जि़न्दगी में जितनी मुसीबतें और परेशानियां आयीं, उनमें अमन व सुकून की जगह केवल इस्लाम में ही मिली। इस नेमत पर अल्लाह का जितना भी शुक्र अदा करूं, कम है।&lt;/span&gt;  विश्व युद्ध के दौरान मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल लन्दन में इस्लाम के प्रचार-प्रसार का काम करते रहे। वे जुमा का खुतबा   देते, इमामत, करते, ईदैन की नमाज़ पढ़ाते और रमजाऩुल मुबारक में तरावीह के इमाम होते। इस्लामिक रिव्यू नामक पत्रिका के संकलन एवं सम्पादन की जि़म्मेदारी भी इन्हीं के सुपुर्द थी। इस दौरान वे इदारा मालूमाते इस्लामी से भी जुड़े रहे। पिकथॉल साहब 1920 में उमर सुब्हानी की दावत पर मुम्बई आये, जहां उन्होंने बम्बई क्रॉनिकल के सम्पादन का काम शुरू किया और 1924 तक उसके सम्पादक रहे। इस दौरान उन्होंने तुर्कों और भारतीय मुसलमानों की समस्याओं का खुलकर समर्थन किया और राष्ट्रीय आन्दोलनों में सक्रिय रहे।  1924 में मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल को निजा़मे दकन ने हैदराबाद बुला लिया। वहां उन्हें चादर घाट स्कूल का प्रिंसिपल और रियासत के सिविल सर्विस का प्रशिक्षक नियुक्त किया। हैदराबाद ही से उन्होने इस्लामिक कल्चर के नाम से एक त्रैमासिक पत्रिका निकालनी शुरू की, जिसका उद्देश्य गैऱ-इस्लामी दुनिया को इस्लामी संस्कृति, ज्ञान व कला से अवगत कराना था। लगभग दस वर्षो तक वे इस संस्था से जुड़े  रहे और बड़े ही खुलूस, लगन एवं एकाग्रता के साथ इल्मी व दावती काम करते रहे।  &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;निज़ाम हैदराबाद की सरपरस्ती में ही पिकथॉल साहब ने कुरआन मजीद के अंगे्रजी अनुवाद का काम शुरू किया। निज़ाम ने उन्हें दो वर्ष के लिए मिस्त्र भेज दिया, जहां जाकर अज़हर विश्वविद्यालय के आलिमों से विचार-विमर्श करके उन्होंने कुरआन मज़ीद के अंग्रेज़ी अनुवाद का काम पूरा किया। यह पहला अंगे्रज़ी अनुवाद है जिसे किसी ने इस्लाम कबूल करने के बाद दुनिया के सामने पेश किया।&lt;/span&gt; इस अनुवाद में  माधुर्य पाया जाता है। इस अनुवाद में भाषा की सुघड़ता है, प्रांजल और प्रवाहता है। भाषा शैली की दृष्टि से उत्कृष्ट एवं लोकप्रिय है। इससे पहले पामर, रॉडवेल और सैल आदि के अनुवाद प्रचलित थे। परन्तु पिकथॉल मरहूम ने कुरआन के अनुवाद की भूमिका में स्पष्ट शब्दों में लिख दिया कि एक ऐसा व्यक्ति जो किसी ईश्वरीय ग्रन्थ के अल्लाह की ओर से होने का क़ायल न हो, वह कभी उसके साथ न्याय नहीं कर सकता। यही कारण है कि ईसाई दुनिया इस टिप्पणी पर बहुत तिलमिलायी।  बहरहाल यह बात सच है कि पिकथॉल का अनुवाद न केवल बेहतर एवं सटीक है, बल्कि पूरी दुनिया में लोकप्रिय भी है। &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;पिछले कुछ वर्षों में केवल अमेरिका में उसकी कम से कम पांच लाख प्रतियां बिक चुकी हैं।&lt;/span&gt; जनवरी 1935 में मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल हैदराबाद एजूकेशन सर्विस से त्याग-पत्र देकर लन्दन चले गये। निज़ाम ने उनको जीवन भर के लिए पेंशन मुकर्रर कर दी। इंग्लैण्ड में वे इस्लाम के प्रचार-प्रसार में लगे रहे। इस्लामिक कल्चर भी लन्दन से प्रकाशित होने लगा। इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होने एक संस्था की स्थापना भी की।      19 मई 1936 को ह्दय गति के रुक जाने के कारण उनका इन्तिकाल हो गया। वे लन्दन में दफ्ऩ हुए, हालांकि उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उनकी मृत्यु हस्पानिया,स्पेन में हो, जहां के इस्लामी दौर से उन्हें बहुत मुहब्बत थी। &lt;span style="color:#006600;"&gt;पिकथॉल इस्लामी  अख्लाक से मालामाल थे। पांचों वक्त नमाज़ पाबन्दी के साथ अदा करते। रमज़ान का रोज़ा कभी भी नागा़ नहीं किया। सच्चे मुसलमानों की भांति वे खुदा पर भरोसा करते और हर काम को उसकी रजा पर छोड़ देते। कदम-कदम पर अल्लाह और अल्लाह के रसूल सल्ल० का ज़िक्र करते।&lt;/span&gt; वे अत्यधिक शरीफ़ थे।     उनसे मिलकर ईमान में ताज़गी पैदा होती थी। उन्होंने इस्लाम के प्रचार-प्रसार में प्रशंसनीय सेवाएं की हैं। कुरआन मजीद के अनुवाद के अलावा उन्होंने कई अनेक उल्लेखनीय किताबों की रचना की। कल्चरल साइड ऑफ इस्लाम उनकी एक महत्वपूर्ण कृति है। यह उन धार्मिक अभिभाषणों का संकलन है जो उन्होंने 1927 में मद्रास में वार्षिक इस्लामी खुत्बों के सिलसिले में दिये थे। उन्होंने दस-बारह उपन्यास भी लिखे, जो साहित्य की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं।   &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-3512900515802319269?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/3512900515802319269/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=3512900515802319269' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/3512900515802319269'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/3512900515802319269'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/10/blog-post_20.html' title='अमन और सुकून का केन्द्र केवल इस्लाम'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/St6EyKSrgMI/AAAAAAAAARk/qzDBuLaF2bw/s72-c/pickthall.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-7965602184886773038</id><published>2009-10-16T21:08:00.001+05:30</published><updated>2010-07-04T13:15:19.528+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='करीम अब्दुल जब्बार-इस्लाम'/><title type='text'>इस्लाम ने मुझे नैतिक सम्बल दिया</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/StiU4OM9zVI/AAAAAAAAARY/0kPnzTohSpk/s1600-h/Kareem_Abdul_Jabbar_.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5393224247382232402" src="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/StiU4OM9zVI/AAAAAAAAARY/0kPnzTohSpk/s320/Kareem_Abdul_Jabbar_.jpg" style="cursor: hand; display: block; height: 240px; margin: 0px auto 10px; text-align: center; width: 221px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;अगर मैं इस्लाम ना अपनाता तो एक खिलाड़ी के रूप में इतना कामयाब ना होता। इस्लाम ने मुझे नैतिक सम्बल दिया।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;करीम अब्दुल जब्बार अमेरिका के मशहूर बास्केटबॉल खिलाड़ी&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;करीम अब्दुल जब्बार अमेरिकी नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन के छह बार बेशकीमती खिलाड़ी के रूप में चुने गए। उन्हें बास्केटबॉल का हर समय महान खिलाड़ी माना गया। वे अपन हरलेम के बाशिन्दे थे और फरडीनेन्ड लेविस एलसिण्डर के रूप में पैदा हुए। बास्केटबॉल में एक नया शॉट स्काई हुक ईजाद करने वाले करीम अब्दुल जब्बार ने इस शॉट के जरिए बास्केटबॉल खेल में अपनी खास पहचान बनाई।सबसे पहले करीम अब्दुल जब्बार ने इस्लाम हम्मास &lt;span style="color: red;"&gt;अब्दुल खालिस नामक एक मुस्लिम व्यक्ति से सीखा। खालिस ने उन्हें बताया कि हर एक को चाहे वह नन हो,संन्यासी,अध्यापक,खिलाड़ी अथवा टीचर,सभी को संजीदगी से ईश्वरीय आदेश पर गौर करना चाहिए। इस बात पर ध्यान देने के बाद वे खालिस क ी इस्लामिक बातों पर चिंतन करने लगे,साथ ही उन्होने कुरआन का अध्ययन करना शुरू कर दिया। कुरआन अच्छी तरह समझने के लिए उन्होने बेसिक अरबी सीखी। उन्होने इस्लाम को अच्छी तरह सीखने के मकसद से १९७३ में सऊदी अरब और लीबिया का सफर किया। वे सर्वशक्तिमान ईश्वर में अटूट भरोसा करते हैं और साथ ही उनका पुख्ता यकीन है कि कुरआन अल्लाह का आखरी आदेश है और मुहम्मद सल्ललाहो अलैहेवसल्लम अल्लाह के आखरी पैगम्बर हंै।&lt;/span&gt; करीम अब्दुल जब्बार स्वीकार करते हैं कि जितना उनसे मुमकिन होगा वे इस्लाम के मुताबिक जिंदगी गुजारने की कोशिश करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: #3366ff;"&gt;ये&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #3366ff;"&gt; अंश अब्दुल करीम की किताब &lt;span style="color: red;"&gt;करीम&lt;/span&gt; से लिए गए हैं जो १९९० में प्रकाशित हुई थी। इस किताब में उन्होने अपने इस्लाम कबूल करने के कारणों पर प्रकाश डाला है।&lt;/span&gt;।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;़अमेरिका में बड़ा होकर आखिरकार मैंने पाया कि जज्बाती और रूहानी तौर पर मैं जातिवादी विचारधारा की संकीर्णता में नहीं बंध सकता। जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ तो मुझे यही समझ आया कि काले लोग या तो बहुत अच्छे हैं या फिर बहुत खराब। मेरे इर्द गिर्द ऐसा ही कुछ था। वह काला आदमी जिसका मेरे जीवन पर गहरा असर पड़ा मैलकम एक्स था। मैं रोज काले मुस्लिमों का अखबार मुहम्मद स्पीक्स पढ़ता था। लेकिन साठ के शुरूआत में काले मुस्लिमों की जातिवाद की संकीर्ण सोच मुझे मंजूर नहीं थी। इस सोच में गौरे लोगों के प्रति उनकी उसी तरह की दुश्मनी दिखाई पड़ती थी,जैसी कि गौरों की कालों के प्रति थी। यही वजह है कि मैं इस विचाधारा के खिलाफ था। मेरा मानना था कि क्रोध और नफरत से आप किसी चीज को थोड़ा ही बदल सकते हैं।--- लेकिन &lt;span style="color: red;"&gt;मैलकम एक्स एक अलग ही व्यक्तित्व था। इस्लाम कबूल करने के बाद वह मक्का हज करने गया और उसने वहां जाना कि इस्लाम तो सभी रंगों के लोगों को सीने से लगाता है। बदकिस्मती से १९६५ में उसक ी हत्या कर दी गई।&lt;/span&gt; हालांकि तब मैं उसके बारे मे ज्यादा नहीं जानता था लेकिन मुझे बाद में मालूम हुआ कि वह कालोंकी उन्नति और खुद की मदद खुद करने की बात करता था। &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;मैं उसक ी सबके साथ समान व्यवहार करने की सोच को पसंद करता था।़१९६६ में मैलकम एक्स की जीवनी पर किताब छपकर आई जिसे मैंने पूरी पढ़ डाली।&lt;/span&gt; उस वक्त मै उन्नीस साल का हुआ ही था। इस किताब ने मेरे जीवन पर ऐसी छाप छोड़ी जो अब तक कोई किताब नहीं छोड़ पाई थी। इस किताब ने मेरी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। मैं सब चीजों को अलग ही नजरिए से देखने लगा। मैलकम ने गौरों और काले लोगों के बीच आपसी सहयोग का माहौल बनाया। वह सच्ची बात करता था। इस्लाम की बात करता था। मैं भी उसकी राह चल पड़ा और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;टाल्क एशिया से &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red; font-size: 130%;"&gt;साक्षात्कार&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;यह &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;साक्षात्कार २जुलाई २००५ को टाल्क एशिया के स्टेन ग्रान्ट ने लिया&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;&lt;span style="color: #3366ff;"&gt;था।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आप लेविस एलसिण्डर से करीम अब्दुल जब्बार हो गए। आप लेविस एलसिण्डर से करीम अब्दुल जब्बार होने के सफर के बारे में बताएं? क्या अब भी आपके अन्दर कुछ लेविस एलसिण्डर बाकी है?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैंने लेविस एलसिण्डर से बाहर निकलकर ही अपना जीवन शुरू किया है। मैं अब भी अपने माता-पिता का बच्चा हूं। मेरे लिए मेरे चचेरे भाई वैसे ही हैं लेकिन मैंने एक नया रास्ता चुना। मैं सोचता हूं कि &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;यह रास्ता मेरी बेहतरी के लिए है। मैं करीम अब्दुल जब्बार के रूप में बेहतर इंसान बना हूं। मुझे इसका अफसोस नहीं है कि मैं क्या था और क्या हो गया&lt;/span&gt;।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;इस्लाम&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt; के मुताबिक जिंदगी गुजारने पर आपको कैसा महसूस हुआ?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अगर मैं इस्लाम ना अपनाता तो एक खिलाड़ी के रूप में इतना कामयाब ना होता। इस्लाम ने मुझे नैतिक सम्बल दिया। &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;इस्लाम ने मुझे पूरी तरह भौतिकवादी बनने से बचाया और साथ ही मुझे दुनिया क ो देखने का एक खास नजरिया दिया। मेरे लिए यह आसान इसलिए भी हुआ कि मेरे नजदीकी लोगों ने मेरा साथ दिया। मेरे माता-पिता,मेरे कोच जॉन वूडन मेरे साथ थे।&lt;/span&gt; &lt;span style="color: red;"&gt;इस्लाम स्वीकार करने पर क्या लोगों ने आपसे दूरी बना ली या आपके साथ उनके व्यवहार में किसी तरह का बदलाव आया?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैं लोगों से नरमी के साथ पेश आया। मैंने अपने कंधे पर पहचान का कोई पट्टी नहीं बांध रखी थी। मैं तो लोगों को सिर्फ यह समझाता था कि मैं मुस्लिम हूं और जैसा कि मैंने महसूस किया मेरे हक में यह रास्ता सबसे बेहतर था।मेरी सोच यह नहीं रही कि दूसरे मुझे स्वीकार करे तो ही मैं उनको स्वीकार करूं। और ना ही ऐसा था कि अगर आप मेरे दोस्त हैं तो आपको भी मुस्लिम बनना पड़ेगा। मैंने लोगों की भावनाओं का सम्मान किया,जैसा कि मैं भी उम्मीद करता था कि लोग मेरी भावनाओं का भी सम्मान करें।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;उस&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt; व्यक्ति को कैसा महसूस होता होगा जब उसको पुराने नाम के बजाय एक नए नाम से पुकारा जाए? आप में कितना बदलाव आया?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस्लाम ने मुझे बहुत सहनशील बना दिया। मैंने कई बातों में अन्तर पाया। जैसा कि आप जानते हंै मैं अलग हूं लेकिन अक्सर लोग नहीं जानते कि मैं कहां से जुड़ा रहा हूं। यही वजह है कि अमेरिका में ११सितम्बर के हमले के बाद मुझे अपने बारे में लोगों क ो काफी समझाने की जरूरत पड़ी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;क्या इस्लाम कबूल करने वाले आप जैसे लोगों के लिए कोई बंदिश या इसमें रोड़ा बनने वाला कोई नियम या प्रावधान है? क्या आप ऐसा महसूस करते हंै?&lt;/span&gt; नहीं, मैं ऐसा महसूस नहीं करता,लेकिन हां,मुझे दुख हुआ कि बहुत से लोगों ने मेरी वफादारी पर सवाल उठाए। लेकिन मैं तो शुरू से ही एक देशभक्त अमेरिकन रहा हूं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;बहुत&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt; से काले अमेरिकी इस्लाम कबूल कर रहे हैं जो कि एक तरह से सियासत से जुड़ा मामला नजर आता है। क्या आपका मामला भी ऐसा ही कुछ रहा?&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;इस्लाम का चुनाव मेरा राजनैतिक फैसला नहीं था। यह आत्मा से लिया फैसला था। बाइबिल और कुरआन पढऩे के बाद मैं यह समझने काबिल हुआ कि कुरआन बाइबिल के बाद आया हुआ ईश्वरीय संदेश है। मैंने कुरआन की शिक्षा पर चिंतन किया और इसका अनुसरण किया।&lt;/span&gt; मैं नहीं मानता कि जिसको जो तालीम अच्छी लगती हो उस पर अमल करने से कोई उसे रोकता हो। कुरआन हमें बताता है कि सभी इंसानों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाना चाहिए और यहूदी,ईसाई और मुस्लिम एक से पैगम्बरों को मानते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आपके&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt; लेखन में भी इस तरह का प्रभाव देखने को मिलता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हां,इसमें है। जातीय बराबरी न होने का कड़वा अनुभव मुझे तब हुआ जब मैं अमेरिका में बच्चा ही था। मुझ पर सिविल राइट्स मूवमेंट का गहरा असर पड़ा। मैंने देखा लोग अपना जीवन खतरे में डाल रहे थे। वे पिटते थे। उन पर कुत्तों से हमला किया जा रहा था। उन पर गोलियां बरसाईं जा रही थी फिर भी वे अंहिसात्मक तरीके से मुकाबला कर रहे थे। इसने मेरे जीवन पर गहरा असर डाला। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-7965602184886773038?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/7965602184886773038/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=7965602184886773038' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/7965602184886773038'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/7965602184886773038'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/10/blog-post.html' title='इस्लाम ने मुझे नैतिक सम्बल दिया'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/StiU4OM9zVI/AAAAAAAAARY/0kPnzTohSpk/s72-c/Kareem_Abdul_Jabbar_.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-4165289846806471387</id><published>2009-09-15T07:17:00.000+05:30</published><updated>2009-09-15T07:59:20.117+05:30</updated><title type='text'>कुरआन में मिला,मेरे हर सवाल का जवाब</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/Sq70SUW3MEI/AAAAAAAAAPI/_aj3htV0sKg/s1600-h/cat_stevens-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5381507200293744706" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 299px; CURSOR: hand; HEIGHT: 297px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/Sq70SUW3MEI/AAAAAAAAAPI/_aj3htV0sKg/s320/cat_stevens-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;em&gt;मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि इस्लाम कबूल करने से पहले मैं किसी भी मुसलमान से नहीं मिला था। मैंने पहले कुरआन पढ़ा और जाना कि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है जबकि इस्लाम हर मामले में पूर्णता लिए हुए है।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;  &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;  केट स्टीवन्स अब-यूसुफ इस्लाम                इंग्लैण्ड के माने हुए पॉप स्टार&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;             मैं आधुनिक रहन सहन ,सुख-सुविधाओं और एशो आराम के साथ पला बढ़ा। मैं एक ईसाई परिवार में पैदा हुआ। हम जानते हैं कि हर बच्चाकु दरती रूप से एक खास फितरत और और स्वभाव के साथ पैदा होता , लेकिन उसके माता- पिता उसको इधर उधर के धर्मों की तरफ मोड़  देते हैं। ईसाई धर्म में मुझे पढ़ाया गया कि ईश्वर से सीधा ताल्लुक नहीं जोड़ा जा सकता। ईसा मसीह के जरिए ही उस ईश्वर से जुड़ा जा सकता है। यही सत्य है कि ईसा मसीह ईश्वर तक पहुंचन का दरवाजा है। मैंने इस बात को थोड़ा बहुत स्वीकार किया,लेकिन मैं इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं था। &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;जब मैं मसीह की मूर्तियां देखता तो सोचता यह तो पत्थर मात्र है। इनमें कोई प्राण नहीं। लेकिन जब मैं सुनता कि यही ईश्वर है तो मैं उलझन में फंस जाता और आगे कोई सवाल भी नहीं कर पाता।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; मैं कमोबेश रूप में ईसाई विचारधारा को मानता था क्योंकि यह मेरे माता-पिताा का धर्म था जिसका सम्मान मुझे करना था।     मैं धीरे-धीरे ईसाई मत से दूर होता गया और संगीत के क्षेत्र में आ गया। मैंने म्यूजिक बनाना शुरू कर दिया। मेरी ख्वाहिश एक बड़ा स्टार बनने की थी। फिल्मों और मीडिया के  इर्द-गिर्द जो दुनिया मैंने देखी उसे देख मुझे लगा कि मेरा ईश्वर तो यही सबकुछ है। अब मेरा मकसद  ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना था।    मेरे एक अंकल थे जिनके पास काफी पैसा था और एक शानदार गाड़ी थी। उनको देखकर भी मुझे लगा कि ये सारे ऐशो आराम ही जिन्दगी का मकसद है। अपने आसपास के लोगों को देखकर मुझे महसूस होता कि यह दुनिया ही उनके लिए ईश्वर है। फिर मैंने भी तय कर लिया कि मेरे जीवन का मकसद भी पैसा कमाना ही है ताकि मैं ऐशो आराम की जिंदगी जी सकंू । अब मेरे आदर्श पॉप स्टार्स बन गए थे। मैं म्यूजिक बनाने लगा लेकिन मेरे दिल के एक कोने में इन्सानी हमदर्दी का भाव छिपा था। सोचता था कि मेरे पास बहुत पैसा हुआ तो मैं जरूरतमंदों की मदद करूंगा। धीरे-धीरे मैं पॉप स्टार के रूप में मशहूर होने लगा। अभी मैं किशोर अवस्था ही में था कि फोटो सहित मेरा नाम मीडिया में छाने लगा। मीडिया ने मुझे उम्र से ज्यादा शोहरत दी। मैं जिन्दगी को भरपूर  तरीके  से जीना चाहता था। ऐशो आराम की जिन्दगी के चलते मैं नशे का आदी हो गया। शानदार कामयाबी और हाई-फाई रहन सहन का अभी लगभग एक साल ही गुजरा होगा कि मैं बहुत ज्यादा बीमार हो गया। मुझे टीबी हो गई और अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;अस्पताल में बीमारी के दौरान मैं फिर से चिंतन करने लगा-मेरे साथ यह क्या हुआ? क्या मैं सिर्फ शरीर मात्र हूं? इन्द्रीय वासनाओं के  वशीभूत होकर जिन्दगी गुजारना ही क्या मेरी जिन्दगी का मकसद है?      मैं अब महसूस करता हूं कि मेरा यह चिंतन अल्लाह की दी हुई हिदायत और रहमत थी जो मेरी आंखें खोलना चाहती थीं।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; अस्पताल में मैं खुद से सवाल करता-मैं यहां क्यों आया हूं? मैं बिस्तर पर क्यों पड़ा हूं? मैं इनके जवाब तलाशने लगा। इस समय पूर्वी देशों के  रहस्यवाद में कई लोगों की दिलचस्पी थी। मैं भी रुचि लेने लगा। पहली चीज जिसको लेकर मैं जागरूक हुआ,वह थी मौत। मैंने और गौर फिक्र करना शुरू कर दिया और मैं शाकाहारी बन गया। मैं सोचता- मैं शरीर मात्र नहीं हूं। यह सारा चिंतन मैंने अस्पताल में ही किया।      तबियत ठीक होने के बाद की बात है। एक दिन जब मैं टहल रहा था तो अचानक बारिश शुरू हो गई और मैं भीग गया। मै भागकर छत के नीचे खड़ा हो गया। उस वक्त मुझे एहसास हुआ मानो मेरा बदन मुझसे कह रहा है-मैं भीग रहा हूं। मुझे लगा मानो मेरा बदन गधे की तरह है जो मुझे जहां उसकी इच्छा हो रही है उधर खींच रहा है। मुझे महसूस हुआ जैसे यह विचार मेरे लिए ईश्वर का उपहार है,जिसने मुझे उसकी इच्छा का अनुसरण करने का एहसास कराया। इस बीच मेरा पूर्वी धर्मों की तरफ झुकाव हुआ। यहां मुझे धर्मों की नई परिभाषा देखने को मिली। दरअसल मैं ईसाईयत से ऊब चुका था। मैंने फिर से म्यूजिक बनाना शुरू कर दिया लेकिन इस बार मेरे संगीत में गहरा आध्यात्मिक पुट था। इस संगीत में रूहानियत थी और साथ में ईश्वर,स्वर्ग और नरक का जिक्र  भी। मैंने-द वे टू फाइंड आउट गॉड गीत भी लिखा। अब तो  मैं संगीत की दुनिया में और ज्यादा मशहूर हो गया। दरअसल उस वक्त मैं मुश्किल दौर में था,क्योंकि मुझे पैसा और नाम मिलता जा रहा था जबकि मैं उस वक्त सच्चे ईश्वरीय रास्ते की तलाश में जुटा था। इस बीच मैं इस फैसले पर पहुंचा कि बौध्द धर्म उच्च और सच्चा धर्म है। लेकिन मेरी परेशानी यह थी कि बोध्द धर्म से जुडऩे के लिए मैं दुनियावी ऐशो आराम छोडऩे के लिए तैयार न था। दुनिया को छोड़कर संन्यासी बनना मेरे लिए मुश्किल था। इस बीच &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;मैंने अंक विद्या,चिंग,टेरो कार्ड और ज्योतिष को खंगाालने की कोशिश की। मैंने फिर से बाइबल का अध्ययन किया लेकिन मेरी सच जानने की प्यास नहीं बुझी। इस वक्त तक मैं इस्लाम के बारे में कुछ भी नहीं जानता था।&lt;/span&gt; इस बीच एक अच्छी घटना घटी। मेरा भाई जब यरुशलम की मस्जिद में गया तो वहां मुसलमानों का खुदा के प्रति भरोसा,इबादत का तरीका और सुकूनभरे माहौल को देखकर वह बहुत प्रभावित हुआ। वह जब यरुशलम से लौटा तो मेरे लिए कु रआन का एक अंगे्रजी अनुवाद लेकर आया। हालांकि मेरा भाई मुसलमान नहीं हुआ था, लेकिन उसे इस्लाम में कुछ खास होने का एहसास हुआ और उसे लगा कि इससे मुझे कु छ अच्छा हासिल होगा। &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;मैंने कुरआन पढऩा शुरू किया तो मुझे एक नई राह मिली। ऐसी राह जिसमें मुझे मेरे सारे सवालों के जवाब मिल गए। मैं कौन हूं? मेरी जिन्दगी का मकसद क्या है? सच्चा मार्ग कौनसा है? मैं कहां से आया हूं और मुझे कहां जाना है? इन सारे सवालों के जवाब मैंने कुरआन में पाए।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; अब मुझे एहसास हो गया कि सच्चा धर्म तो इस्लाम है। यह ऐसा नहीं है जैसा पश्चिमी देशों में धर्म को लेकर अवधारणा है,जो सिर्फ बुढ़ापे के लिए माना जाता है।      पश्चिमी देशों में धर्म को जीवन में लागू करने वाले व्यक्ति को धर्मांध माना जाता है। मैं पहले शरीर और आत्मा क ो लेकर गलतफहमी में था। अब मैंने महसूस किया कि शरीर और आत्मा एक -दूसरे  से जुड़े हुए हैं। ईश्वर की इबादत के लिए पहाड़ों पर जाकर साधना करने की जरूरत नहीं है। हम रब की रजा हासिल करके फरिश्तों से भी ऊंचा मुकाम हासिल कर सकते हैं। यह सब कुछ जानने के बाद अब मेरी इच्छा जल्दी मुसलमान बनने की थी। मुझे महसूस हुआ कि हर एक चीज का जुड़ाव सर्वशक्तिमान ईश्वर से है और जो शख्स गाफिल है,वह ईश्वरीय राह नहीं पा सक ता। वही तो है सब चीजों का पैदा करने वाला।       अब मुझमें घमण्ड कम होने लगा क्योंकि पहले मैं इस गलतफहमी में था कि   मैं जो कुछ हूं अपनी मेहनत के बलबूते पर हूं। लेकिन अब मुझे एहसास हो गया था कि मैं खुद को बनाने वाला नहीं हूं और मेरी जिन्दगी का मकसद है कि मैं अपनी इच्छा सर्वशक्तिमान ईश्वर के सामने समर्पित कर दूं। ईश्वर के प्रति मेरा भरोसा मजबूत होता गया। मुझे लगा कि जिस तरह का मेरा यकीन है,उसके मुताबिक तो मैं मुस्लिम हूं। कुरआन पढ़कर मैंने जाना कि सभी पैगम्बर एक ही मैसेज और सच्चा मार्ग लेकर आए थे। फिर क्यों ईसाई और यहूदियों ने खुद क ो अलग-थलग कर लिया? मैं जान गया था कि यहूदी क्यों ईसा अलैहिस्सलाम क ो नहीं मानते और क्यों उन्होने उनके पैगाम को बदल डाला। &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;ईसाई भी खुदा के कलाम को गलत समझ बैठे और उन्होने ईसा को   खुदा बना डाला। यह कुरआन ही की खूबी है कि वह इंसान को गौर और फिक्र करने की दावत देता है और चाँद और सूरज को पूजने के  बजाय सबको पैदा करने वाले सर्वशक्तिमान ईश्वर की इबादत के  लिए उभारता है।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; कु रआन लोगों से सूरज,चाँद और खुदा की बनाई हुई हर चीज पर सोच-विचार करने पर जोर देता है। बहुत से अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी के पार जाकर और विशालकाय अंतरिक्ष को देखकर अधिक आस्थावान हो गए क्योंकि उन्होने अल्लाह की यह खाास निशानियां देखीं।       फिर जब मैंने कुरआन में आगे नमाज,जकात और अल्लाह के रहमो करम के बारे में पढ़ा तो मैं समझ चुका था कि कुरआन में मेरे हर एक सवाल का जवाब है और यह ईश्वर की तरफ से मेरे लिए गाइडेंस है। हालांकि मैं अभी  तक मुसलमान नहीं हुआ था। मैं कुरआन की आयतों का बारीकी से अध्ययन करने लगा। कुरआन कहता है-ए ईमान वालो, अल्लाह से बगावत करने वालों को दोस्त मत बनाओ और ईमान वाले आपस में सब भाई हैं।यह आयत पढ़कर मैंने सोचा कि मुझे अपने मुस्लिम भाइयों से मिलना चाहिए।     अब मैंने यरूशलम का सफर करने का इरादा किया। यरूशलम पहुंचकर मैं वहां की एक मस्जिद में जाकर बैठ गया। एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा-तुम यहां क्यों बैठे हो,क्या तुम्हें कोई काम है? नाम पूछने पर जब मैंने अपना नाम स्टीवन्स बताया तो वह कुछ समझ नहीं पाया। फिर मैं नमाज में शामिल हुआ हालांकि मैं सही तरीके से नमाज नहीं पढ़ पाया। मैं लंदन लौट आया। मैं यहां सिस्टर नफीसा से मिला और उनको बताया कि मैं इस्लाम ग्रहण करना चाहता हूं। सिस्टर नफीसा ने मुझे न्यू रिजेंट मस्जिद जाने का मशविरा दिया।     &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;यह १९७७ की बात है और कुरआन का अध्ययन करते मुझे डेढ साल हो गया था। मैं मन बना चुका था कि अब मुझे अपनी और शैतान की ख्वाहिशें छोड़कर सच्ची राह अपना लेनी चाहिए। मैं जुमे की नमाज के बाद मस्जिद के इमाम के पास पहुंचा। हक को मंजूर कर लिया और इस्लाम का कलिमा पढ ़लिया।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; अब मुझे लगा मैं खुदा से सीधा जुड़ गया हूं। ईसाई और अन्य धर्मावलम्बियों की तरह किसी जरिए से नहीं बल्कि सीधा। जैसा कि एक हिन्दू महिला ने मुझसे कहा-तुम हिन्दुओं के बारे में नहीं जानते,हम एक ईश्वर में आस्था रखते हैं। हम तो उस ईश्वर में ध्यान लगाने के लिए मूर्तियों को माध्यम बनाते हैं। मुझे लगा क्या ईश्वर तक पहुंचने के लिए ऐसे साधनों की जरूरत है? लेकिन इस्लाम तो बन्दे और खुदा के बीच के  ये सारे माध्यम और परदे हटा देता है।      मैं बताना चाहूंगा कि मेरा हर अमल अल्लाह की खुशी के लिए होता है।मैं दुआ करता हूं कि मेरे अनुभवों से सबक मिले। मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि इस्लाम कबूल करने से पहले मैं किसी भी मुसलमान से नहीं मिला था। मैंने पहले कुरआन पढ़ा और जाना कि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है जबकि इस्लाम हर मामले में पूर्णता लिए हुए है। अगर हम पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम के बताए रास्ते पर चलेंगे तो कामयाब होंगे। अल्लाह हमें पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम के बताए रास्ते पर चलने की हिदायत दें।                                                आमीन                                       &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;यूसुफ इस्लाम &lt;/span&gt; पूर्व नाम केट स्टीवन्स &lt;/span&gt;                                  &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पता-चेयरमैन,मुस्लिम ऐड, ३ फरलॉन्ग                                                                      रोड,लंदन,एन-७,यू के &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-4165289846806471387?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/4165289846806471387/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=4165289846806471387' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/4165289846806471387'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/4165289846806471387'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/09/blog-post_14.html' title='कुरआन में मिला,मेरे हर सवाल का जवाब'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' 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/&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;&lt;em&gt;जर्मन&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;&lt;em&gt; के डॉ विलफराइड हॉफमेन ने १९८० में जब इस्लाम कबूल किया तो जर्मनी में हलचल मच गई। उनके इस फैसले का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ। उन्होने अपना नाम मुराद हॉफमेन रखा। जर्मनी के दूत और नाटो के सूचना निदेशक रह चुके डॉ मुराद हॉफमेन ने इस्लाम पर कई किताबें लिखी हैं।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;१९८०&lt;/span&gt; में इस्लाम ग्रहण करने वाले डॉ हॉफमेन १९३१ में जर्मनी कैथोलिक ईसाई परिवार में पैदा हुए। उन्होने न्यूयार्क के यूनियन कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और म्यूनिख यूनिवर्सिटी से कानूनी शिक्षा हासिल की। १९५७ में धर्मशास्र में डॉक्टरेट की। १९६० में हार्वर्ड लॉ स्कूल से उन्होने एलएलएम की डिग्री हासिल की। &lt;span style="color: #009900;"&gt;&lt;em&gt;१९८३ से १९८७ तक ब्रूसेल्स में उन्होने नाटो के सूचना निदेशक के रूप में काम किया। वे १९८७ में अल्जीरिया में जर्मनी के दूत बने और फिर १९९० में मोरक्को में चार साल तक जर्मनी एम्बेसेडर के रूप में काम किया। उन्होने १९८२ में उमरा और १९९२ में हज किया। विभिन्न तरह के अनुभवों ने डॉ हॉफमेन को इस्लाम की ओर अग्रसर किया।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt; जब वे १९६१ में अल्जीरिया में जर्मनी दूतावास में नियुक्त थे तो उन्होने फ्रांस की फौजी टुकडियों और अल्जीरियन नेशनल फ्रंट के बीच नजदीकी से गुरिल्ला जंग देखी। अल्जीरियन नेशनल फ्रंट पिछले आठ सालों से अपनी आजादी के लिए जूझ रहा था। अल्जीरियन पर फ्रांसिसियों का अत्याचार और अल्जीरियन का सहनशील होकर डटे रहने को उन्होने नजदीकी से देखा। रोजाना दर्जनों अल्जीरियन मारे जाते थे,सिर्फ इसलिए कि वे अपना मुल्क आजाद कराना चाहते थे। वे कहते हैं,‘मैं बेहद हैरान था अल्जीरियन लोगों की हिम्मत और सब्र देखकर। वे धैर्य के साथ इस बडी मुसीबत का सामना कर रहे थे। रमजान महीने के दौरान खुद को पाक करना और सब्र ,जीत के प्रति उनका भरोसा और हौसला। गरीबी के बावजूद उनका इंसानियत के प्रति जज्बा। यह सब देख मुझे लगा कि उनके दीन ने ही उनको ऐसे मजबूत आस्था का मालिक बनाया है।’ &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;&lt;em&gt;मुसलमानों के इन अमल को नजदीकी से देखने के बाद डॉ हॉफमेन ने इस्लाम की किताबों का अध्ययन शुरू कर दिया। वे कहते हैं, ‘कुरआन पढना मैंने तब से शुरू किया और फिर कभी पढना बंद नहीं किया।’ इस्लामिक आर्ट ने भी डॉ हॉफमेन को बेहद प्रभावित किया। वे कहते हैं&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;,‘खूबसूरत लेखनी, स्पेस फिलिंग,मकानों और मस्जिदों की स्थापत्य कला देखते ही बनती है। मस्जिदों में कंधे से कंधा मिलाकर एक सीध में नमाज अदा करते मुसलमान भाईचारे और लोकतंत्र की मिसाल होते &lt;span style="color: red;"&gt;&lt;em&gt;हैं।’पुराने इस्लामिक अरबन सेन्टर्स का मुस्लिम समाज के प्रति दायित्व व कामकाज,मुसलमानों की बाजार और खरीद फरोख्त में ईमानदारी,मस्जिदों में इबादत के दौरान दिखने वाली एकता व भाईचारा और मस्जिदों से जुडे समाजसेवी केन्द्र जो गरीबों के उत्थान में जुटे हैं,मदरसे आदि को नजदीकी से देखना डॉ हॉफमेन के लिए खास और अलग तरह का अनुभव था।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt; इस्लामिक भाईचारे और इस्लाम में जिंदगी गुजारने के तरीके को देखकर वे बेहद प्रभावित थे। इन सब बातों के अलावा सच्चाई की तलाश में हाफमेन की कोशिश पर ईसाईयत का इतिहास और ईसाई मत संबंधी उनकी जानकारी और ज्ञान ने भी खासा असर छोड़ा। उन्हे महसूस हुआ कि ईसाईयों की आस्था और विशवास तथा जो कुछ इतिहास के प्रोफेसर ईसाईयत के बारे में पढाते हैं, दोनों के बीच बहुत बडा अंतर है। वे दुखी थे और &lt;span style="color: #009900;"&gt;&lt;em&gt;उन्हे अफसोस था कि गिरिजाघरों ने भी मसीह और ईसाई मत के उस रूप को ग्रहण किया है जो संत पॉल ने स्थापित किया। संत पॉल जो मसीह से कभी नहीं मिला, उसने मूल और असली यहूदी-ईसाई मत की जगह ईसाईयत को एक अलग ही जामा पहना दिया। डॉ हॉफमेन के ईसाईयत की यह अवधारणा गले नहीं उतर पाइ कि इंसान पैदाइशी गुनाहगार है और ईश्वर को इंसानों के गुनाहों के बदले अपने ही बेटे को सूली पर चढ़वाकर कुरबानी लेनी पडी।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt; ‘मेरे यह पच नहीं पा रहा था कि आदम और हव्वा के गुनाह से इंसान को बेदाग करने के लिए क्या ईश्वर के पास मसीह की बलि लेना ही एकमात्र उपाय था! उस ईश्वर के पास जिसने आदम और हव्वा को बिना मां-बाप के पैदा किया था। डॉ हॉफमेन फिर मूल सवाल ईश्वर की उपस्थिति की ओर लोटे। &lt;span style="color: red;"&gt;&lt;em&gt;उन्होने गौर व फिक्र करना ’शुरू किया कि क्या ईश्वर है! कई पाचात्य दार्शानिकों को पढने के बाद वे ईश्वर की उपस्तिथि को स्वीकारने लगे। अब उनके सामने सवाल खड़ा हुआ आखिर ईश्वर इंसानों को गाइड कैसे करता हैं! इस बिन्दू पर गौर करने के बाद उन्हे यकीन हुआ कि ईश्वर पैगम्बर और किताबों के जरिए अपने आदेश जारी करता है। फिर उनके&lt;br /&gt;जहन में सवाल उटा आखिर ईश्वर का सच्चा संदेश किसमें है! यहूदी-ईसाई धर्मग्रंथों में या फिर इस्लाम में!&lt;/em&gt;&lt;/span&gt; डॉ हॉफमेन को कुरआन में इसका सटीक जवाब मिला। कुरआन अध्ययन के दौरान यह आयत पढकर उनकी आंखें खुल गईं- &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;कोई बोझ उठाने वाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वे इस बात से सहमत हुए कि आदम और हव्वा के गुनाह के कारण इंसान पैदाइशी गुनाहगार नहीं बल्कि हर एक को अपने गुनाह का जवाब देना है। उन्होने जाना कि एक मुसलमान बिना पादरियों और मौलवियों के ई’वर से सीधा ताल्लुक रखता है। वह ई’वर की सीधी इबादत करता है बिना किसी मध्यस्थों के जबकि ईसाई लोग पादरियों की शरण में जाकर ईश्वर को हासिल करना चाहते हैं। डॉ हॉफमेन कहते हैं- &lt;span style="color: #009900;"&gt;‘मैंने इस्लाम को उसकी भावना और उसकी रूह के हिसाब से अध्ययन करना शुरू किया। फिर तो मेरा पक्का विशवास हो गया कि गॉड सिर्फ एक ही है और वही सच्चा गॉड है। वह ऐसा सुपर पावर है जिसका न आदि है,न अंत और न उसका कोई शरीक है।&lt;/span&gt; ईसाई मत के मुताबिक गॉड के तीन हिस्सों में बंटे होने की तुलना में कुरआन ने सीधा,सहज और असर अंदाज तरीके से निराकार और एक ईश्वर की अवधारणा को बेहतर ढंग से पेश किया। ईश्वर का यही रूप आधुनिक सोच के अनुरूप भी है। &lt;span style="color: red;"&gt;कुरआन में छिपे दार्शनिक तत्व और नैतिक िशक्षाओं ने मुझे बेहद प्रभावित किया और ये मुझे सोने के समान खरी नजर आईं। कुरआन की आयतों को देखकर मुझे यकीन हो गया कि पैगंबर और उनके मिशन पर किसी तरह का शाक नहीं किया जा सकता।&lt;/span&gt;’ १९८० में अपने पुत्र के १८वें जन्मदिन के मौके पर डॉ हॉफमेन ने १२ पेजों का एक नोट लिखा। इस हस्तलिखित नोट में उन्होने कई दार्शानिक पहलुओं को टच किया था। ये वे दार्शानिक पहलू थे जिनके जवाब डॉ हॉफमेन जान चुके थे। उन्होने अपनी यह नोट बुक एक मुस्लिम इमाम मुहम्मद अहमद रसूल को दिखाई। नोट बुक देखने के बाद इमाम मुहम्मद अहमद रसूल ने कहा कि जो कुछ उन्होने इस नोट बुक में लिखा है, अगर उस पर वे यकीन करते हैं तो वे मुसलमान हैं यानी वे इस्लामी उसूलों पर भरोसा करने लगे हैं। और फिर कुछ दिनों बाद &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;&lt;em&gt;२५ सितंबर १९८० को उन्होने इस्लाम का कलिमा पढ़ लिया-‘ मैं गवाही देता हू कि सिवाय अल्लाह के कोई इबादत के लायक नहीं और मुहम्मद स.ल व अल्लाह के रसूल हैं। इस्लाम कबूल करने के बाद पन्द्रह साल बाद तक डॉ हॉफमेन जर्मनी के दूत और नाटो के अधिकारी की हैसियत से काम करते रहे।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt; वे कहते हैं-‘इस्लाम कबूल करने के बाद मेरी प्रोफेशनल लाइफ में मुझे किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। इस्लाम अपनाने के साढे तीन साल बाद १९८४ में जर्मनी के प्रेसीडेंट डॉ कॉर्ल कारस्टेन्स ने मुझे ‘आर्डर आफ मेरिट आफ दी फेडरल रिपब्लिक आफ जर्मनी’ सम्मान से नवाजा। यही नहीं जर्मन सरकार ने मेरे द्वारा लिखि किताब ‘डायरी आफ ए जर्मन मुस्लिम’ को मुस्लिम देशों और वहां स्थित जर्मन दूतावासों में खोजपरक किताब के रूप में पेश किया।’ &lt;span style="color: red;"&gt;शराब के शौकीन रहे डॉ हॉफमेन ने इस्लाम कबूल करने के बाद शराब छोड़ दी। इस्लाम की खातिर कुछ करने के मकसद से सन् १९९५ में उन्होने एच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली।&lt;/span&gt; शराब को बुराई की जड मानने वाले डॉ हॉफमेन अपने से जुड़ा एक हादसा बताते हैं-‘१९५१ की बात है। मैं न्यूयॉर्क में कॉलेज में पढ़ता था। एक दिन मैं अटलांटा से मिसिसिप्पी जा रहा था कि सामने से आ रही एक गाड़ी ने मेरी कार को टक्कर मार दी। सामने वाली गाड़ी का चालक नींद में था। यह खतरनाक हादसा था जिसमें मेरे १९ दांत टूट गए और चेहरा जख्मी हो गया। उपचार के बाद अस्पताल से छुट्टी देते समय चिकित्सक ने मुझसे कहा-‘ऐसे खतरनाक हादसे में आपका सुरक्षित बच जाना ईश्वर का चमत्कार है। तुम पर ईश्वर की कृपा हुई है,’शायद वो आगे तुमसे कुछ चाहता हो। उस वक्त चिकित्सक की कही बात को मैं समझ नहीं पाया था। &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;उस हादसे के तीस साल बाद इस्लाम कबूल करने पर मुझे अच्छी तरह समझ आ गया है कि आखिर ईश्वर ने उस हादसे में मुझे क्यों बचाया &lt;/span&gt;था। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-8834155066241877298?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/8834155066241877298/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=8834155066241877298' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/8834155066241877298'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/8834155066241877298'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/09/blog-post.html' title='गॉड सिर्फ एक ही है'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SqHIgvCFFaI/AAAAAAAAANw/O8vClo9eR9k/s72-c/MURAD+HOFFMANN.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-6046359890035536930</id><published>2009-09-04T07:00:00.002+05:30</published><updated>2010-07-18T14:58:30.231+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मशहूर हस्तियों ने अपनाया इस्लाम'/><title type='text'>आखिर इन मशहूर लोगों ने क्यों अपनाया इसलाम</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TELJGa3GPZI/AAAAAAAAAac/HowzF5V-uPs/s1600/one+awy+one+god.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hw="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TELJGa3GPZI/AAAAAAAAAac/HowzF5V-uPs/s320/one+awy+one+god.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;आप खुद अपनी आँखों से देख लीजिये इन हस्तियों को&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="color: #009900;"&gt;&lt;strong&gt;जो इसलाम अपनाकर मुसलमान हो गए&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;em&gt;यहाँ क्लिक कीजिये&lt;/em&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=UbPEntwSF04"&gt;http://www.youtube.com/watch?v=UbPEntwSF04&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=8zIlPa_f-_M&amp;amp;feature=related"&gt;http://www.youtube.com/watch?v=8zIlPa_f-_M&amp;amp;feature=related&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-6046359890035536930?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/6046359890035536930/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=6046359890035536930' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/6046359890035536930'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/6046359890035536930'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/09/httpwww.html' title='आखिर इन मशहूर लोगों ने क्यों अपनाया इसलाम'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TELJGa3GPZI/AAAAAAAAAac/HowzF5V-uPs/s72-c/one+awy+one+god.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-6160737032319322586</id><published>2009-08-15T11:02:00.002+05:30</published><updated>2010-07-18T14:55:47.947+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एक पत्रकार का इस्लाम कबूल'/><title type='text'>एक पत्रकार का इस्लाम कबूल करना</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TELHlhYVgDI/AAAAAAAAAaU/h0crNmRixBc/s1600/writing.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" hw="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TELHlhYVgDI/AAAAAAAAAaU/h0crNmRixBc/s200/writing.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red; font-size: 100%;"&gt;इस्लाम&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red; font-size: 100%;"&gt; कबूल करने के पहले अब्दुल्लाह अडियार डी।एम.के. के प्रसिद्ध समाचार-पत्र 'मुरासोलीÓ के 17 वर्षो तक संपादक रहे। डी.एम.के. नेता सी.एन. अन्नादुराई जो बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी रहे, ने जनाब अडियार को संपादक पद पर नियुक्त किया था। जनाब अडियार ने 120 उपन्यास, 13 नाटक और इस्लाम पर 12 पुस्तकों की रचनाएं की।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जनाब अब्दुल्लाह अडियार महरहूम तमिल भाषा के प्रसिद्ध कवि, प्रत्रकार, उपन्यासकार और पटकथा लेखक थे। उनका जन्म 16 मई 1935 को त्रिरूप्पूर (तमिलनाडु) में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा कोयम्बटूर में हुई। वे नास्तिक थे, लेकिन विभिन्न धर्मों की पुस्तकें पढ़ते रहते थे। &lt;span style="color: #009900;"&gt;किसी पत्रकार और साहित्यकार को विभिन्न धर्मों के बारे में भी जानकारी रखनी पड़ती है। जनाब अब्दुल्लाह अडियार अध्ययन के दौरान इस परिणाम पर पहुंचे कि इस्लाम ही सच्चा धर्म है और मनुष्य के कल्याण की शिक्षा देता है।&lt;/span&gt; &lt;span style="color: #009900;"&gt;आखिरकार 6 जून 1987 ई। को वे मद्रास स्थित मामूर मस्जिद गये और इस्लाम कबूल कर लिया। &lt;/span&gt;इस्लाम कबूल करने के पहले वे डी।एम।के। के प्रसिद्ध समाचार-पत्र 'मुरासोलीÓ के 17 वर्षो तक संपादक रहे। डी।एम.के. नेता सी.एन. अन्नादुराई जो बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी रहे, ने जनाब अडियार को संपादक पद पर नियुक्त किया था। जनाब अडियार ने 120 उपन्यास, 13 नाटक और इस्लाम पर 12 पुस्तकों की रचनाएं की। इमरजेंसी के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और काफी प्रताडि़त किया गया। &lt;span style="color: #3333ff;"&gt;जेल में उन्होंने जनाब यूसुफ अली का कुरआन मजीद का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा और उससे काफी प्रभावित हुए। इस्लाम (इस्लाम जिससे मुझे प्यार है) पुस्तिका लिखी, जिसका बाद में हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, सिन्धी, मलयालम और उर्दू में अनुवाद हुआ। उनकी पत्नी थयममल जो ईसाई थीं, इस पुस्तिका को पढ़कर मुसलमान हो गयीं। इसे पढ़कर उ.प्र. के एक जमीदार 1987 ई. में मुसलमान हो गये।&lt;/span&gt; जनाब अब्दुल्लाह अडियार को पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक ने पाकिस्तान आमंत्रित किया और विशेष अतिथि के रूप में उनका स्वागत किया। वे प्रखर वक्ता भी थे और इस्लाम पर धाराप्रवाह बोलते थे। उनके ब्रिटेन में अनेक संभाषण हुए, जिनका विषय था हजरत मुहम्मद (सल्ल.) का पवित्र जीवन। इनके कैसेट उपलब्ध हैं। वे तमिलभाषियों के आमंत्रण पर श्रीलंका और सिंगापुर भी गये। 1932 में तमिलनाडु सरकार ने तमिल साहित्य के विशिष्ट पुरस्कार 'कलाईमम्मानीÓ से उन्हें पुरस्कृत किया। इमरजेंसी के बाद उन्होंने 'नीरोतमÓ (पत्रिका) का प्रकाशन किया, जो बहुत लोकप्रिय हुआ। उन्होने नीरोतम प्रकाशन से ही 'तंगागुरूदुनÓ(पत्रिका) भी प्रकाशित की। जनाब अडियार इस्लाम को एकमात्र मुक्ति मार्ग के रूप में प्रस्तुत करते थे। &lt;span style="color: red;"&gt;उन्होंने मद्रास में इस्लामिक दावा सेन्टर कायम किया। वे 6 करोड़ तमिल जनता को इस्लाम का संदेश पहुंचाने के लिए एक इस्लामी टी.वी. चैनल की स्थापना हेतु प्रयासरत रहे। 20 सितम्बर 1996 (जुमा के दिन) को कोडम्बकम में उनकी मृत्यु हो गयी।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-6160737032319322586?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/6160737032319322586/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=6160737032319322586' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/6160737032319322586'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/6160737032319322586'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/08/blog-post_14.html' title='एक पत्रकार का इस्लाम कबूल करना'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TELHlhYVgDI/AAAAAAAAAaU/h0crNmRixBc/s72-c/writing.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-7984512872573249403</id><published>2009-08-02T15:11:00.000+05:30</published><updated>2009-08-02T16:29:48.803+05:30</updated><title type='text'>इस्लाम में मिला दिली सुकून</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SnVhQk3FJcI/AAAAAAAAANI/-xPWGl_kP40/s1600-h/muhammad-ali-2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5365301468482315714" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 246px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SnVhQk3FJcI/AAAAAAAAANI/-xPWGl_kP40/s320/muhammad-ali-2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SnVhQZmX_MI/AAAAAAAAANA/PqpRie8BBMw/s1600-h/muhammad-ali.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5365301465459457218" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 248px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SnVhQZmX_MI/AAAAAAAAANA/PqpRie8BBMw/s320/muhammad-ali.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;मैंने इस्लाम का कई महीनों तक गहन अध्ययन किया और मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि इस्लाम सच्चा धर्म है, जो प्रकाशमान है।&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;मुहम्मद अली दुनिया के तीन बार हैविवेट चैम्पियन रह चुके अमेरिका के मशहूर बॉक्सर&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;           &lt;span style="font-size:130%;"&gt; &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;दुनिया के तीन बार हैविवेट चैम्पियन रह चुके अमेरिका के मशहूर बॉक्सर  कैशियस क्ले जब इस्लाम कबूल करके मुहम्मद अली बने तो अमेरिका में मानो तूफान आ गया। मुहम्मद अली का इस्लाम में दाखिल होना अमेरिका में इस्लाम के फैलने में महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। इस घटना से अमेरिका में चमात्कारिक रूप से इस्लाम के आगे बढऩे में कामयाबी मिली। १७ जनवरी १९४२ को जन्मे मुहम्मद अली  २२ साल की उम्र में १९६४ में इस्लाम के  आगोश में आ गए।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;     &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;    &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;२७&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; फरवरी १९६४ को मुहम्मद अली ने एसोसिएटेड प्रेस के  सामने इस्लाम धर्म अपनाने का ऐलान किया। यहां पेश है उस वक्त एसोसिएटेड प्रेस  के सामने मुहम्मद अली का किया गया खुलासा।&lt;/span&gt;      मुहम्मद अली ने बताया कि आज उन्होने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया है। इस्लाम वह रास्ता है जिसमें आपको हरदम सुकून व चैन मिलता है।बाईस वर्षीय क्ले ने कहा-वे ऐसे मुसलमानों को काले मुसलमान कहते हैं,दरअसल  यह यहां की प्रैस का दिया हुआ शब्द है। यह नाम उचित नहीं है। इस्लाम तो ऐसा धर्म है जिसके  मानने वाले दुनियाभर में करोड़ों लोग हैं और मैं भी उनमें से  एक &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;हूं&lt;/span&gt;।&lt;strong&gt;इस्लाम सच्चा धर्म&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;    मैंने इस्लाम का कई महीनों तक गहन अध्ययन किया और मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि इस्लाम सच्चा धर्म है जो प्रकाशमान है। जैसे एक पक्षी रात में रोशनी को देखकर चहचहाने लगता है और अंधेरे में चुप रहता है। अब मुझे भी रोशनी नजर आ गई है और मैं भी खुशी से चहचहा रहा हूं।जब मुहम्मद अली से पूछा गया कि लोग आपके धर्म परिवर्तन के बारे में जानने के बहुत इच्छुक हैं तो उनका जवाब था-लोग दूसरों के धर्म के बारे में जानना नहीं चाहते लेकिन वे  मेरे धर्म के बारे में जानना चाहते हैं क्योंकि मैं चैम्पियन हूं। मैं विश्व विजेता हूं, इस वजह से पूरी दुनिया मेरे धर्म परिवर्तन को लेकर आश्चर्यचकित है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;हमारी पहचान इस्लाम से&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;  गोरे लोग हमें काले मुस्लिम कहकर पुकारते हैं, लेकिन हमारी वास्तविक पहचान तो इस्लाम मजहब है। इस्लाम का अर्थ है शान्ति,फिर भी लोग हमें दूसरों से नफरत करने वाले समझते हैं। ऐसे लोगों का आरोप है हम देश पर कब्जा करना चाहते हैं। वे हम मुसलमानों को साम्यवादी कहते हैं। सच्चाई यह नहीं है। अल्लाह को मानने वाले लोग तो दुनिया में सबसे अच्छे इंसान हंै। वे हथियार नहीं रखते। वे दिन में पाँच बार नमाज अदा करते हैं। मुस्लिम औरतें जमीन पर लटकती हुई पोशाक पहनती हैं। वे व्यभिचार नहीं करतीं। मुसलमान दुनिया में शान्ति और चैन के साथ जिंदगी गुजारना चाहते हैं। वे किसी से नफरत नहीं करते। किसी भी तरह की मुश्किल को बढ़ावा नहीं देते। वे चुपचाप अपनी बैठकें करते हैं जिनमें किसी तरह के झगड़े और नफरत फैलाने की बात नहीं होती।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;जीत अल्लाह की मदद  से&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; मुहम्मद अली ने कहा कि इस्लाम से उन्हें दिली सुकून हासिल हुआ है और  हाल ही लिस्टन पर उनकी रोमांचक जीत अल्लाह की मदद से ही हुई है। वे कहते हैं- इस मुकाबले में खुदा मेरे साथ था,बिना खुदा की मदद  के मेरे लिए जीतना मुश्किल था।       उन्होने कहा-वे लोग इस बात से परेशान हैं कि मुस्लिम जमाअत ने नीग्रो लोगों में आपसी एकता को जबरदस्ती से प्रज्ज्वलित किया है। मैं ऐसा नहीं मानता क्योंकि प्रतीकात्मक और थोपी गई एकता अस्थायी होती है और यह नीग्रो समस्या का स्थायी हल नहीं है। हमारा मानना है कि किसी को अपना मजहब दूसरे पर नहीं थोपना चाहिए। मेरे पास रोज बहुत से लोगों के टेलीफोन आते हैं। वे मुझे सिर्फ इशारा करने को कहते हैं और सुझाव देते हंै कि यह आपसी भाईचारे के लिए अच्छा होगा कि मैं किसी गौरी महिला से शादी कर लूं। लेकिन मैं किसी के कहने पर ऐसा नहीं करूंगा। मैं तो अपने ही तरह के लोगों के बीच रहना चाहता हूं और उनके साथ खुश हूं। यह फितरती बात है कि एक ही संस्कृ ति और नस्ल के लोगों  को एक साथ रहना चाहिए जैसे कि जंगल के जानवर भी ग्रुप में रहते हैं। मैक्सिकन,पुइत्रो रिकन्स,चीनी और जापानी अगर एक जगह रहते हैं,तो ज्यादा अच्छी तरह रहते हैं। जैसें मै गर्म मैक्सिकन खाना पसंद नहीं करता। अगर कोई मुझे यह खाने को दे तो मुझे यह अच्छा नहीं लगेगा। इसी तरह हो सकता है आप भी वो पसंद नहीं करे जो मुझे पसंद हो। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कोई गलत काम नहीं किया&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; कैन्टुकी शहर से ताल्लुक रखने वाला यह युवा यह जानकर बेहद गुस्सा हुआ कि कुछ लोग उसके इस्लाम अपनाने के मामले को इस बात से जोड़कर देख रहे हैं कि मानो मैं किसी खतरनाक मकसद को अंजाम देने वाला हूं।  वह क्र ोधित होकर कहता है-मैं एक अच्छा लड़का हूं। मैंने कभी कोई गलत काम नहीं किया। मैं कभी ना जेल गया ना अदालत। मैं उन गौरी औरतों की तरफ भी ध्यान नहीं देता जो मुझे आंखों के इशारे करती हैं। मैं उन लोगों पर खुद को नहीं थोपता जो मुझे पसंद नहीं करते। जहां मेरा सम्मान नहीं होता,वहां मैं बेचैनी महसूस करता हूं। मैं गौरे लोगों को पसंद करता हूं। मैं अपने लोगों को भी पसंद करता हूं। वे बिना किसी परेशानी के एक साथ रह सकते हैं। अगर कोई शान्तिप्रिय रास्ता अपनाता है तो आप उसे बुरा नहीं कह सकते,अगर फिर भी आप ऐसा करते हैं तो शान्ति का ही विरोध करते हैं। &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;हज का अनूठा नजारा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यूं तो मेरी जिंदगी में कई अहम पड़ाव आए,लेकिन हज के  दौरान अराफात पहाड़  पर खड़ा होना मेरी जिंदगी का महत्वपूर्ण,अद्भुत और अनूठा पल था। मैं यह देखकर अभिभूत हो गया कि वहां इकट्ठे डेढ मिलियन हजयात्री अल्लाह से अपने गुनाहों को माफ करने की गुजारिश कर रहे थे और साथ ही उसकी दया की तमन्ना कर रहे थे। मेरे लिए यह उत्साह भर देने वाला अनूठा अनुभव था। अलग-अलग रंग,जाति,देश,नस्ल,अमीर,गरीब सब सिर्फ  दो चादरें पहनकर बिना किसी बड़प्पन  के अल्लाह की इबादत में मशगूल थे। यह इस्लाम में बराबरी का व्यावहारिक नमूना था।    &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;जैसा १५जुलाई १९८९ का उन्होने अल मदीना, जेद्दा क ो बताया।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SnVf1IUp61I/AAAAAAAAAM4/z0cyf-CGs5Y/s1600-h/muhammad-ali-2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-7984512872573249403?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/7984512872573249403/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=7984512872573249403' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/7984512872573249403'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/7984512872573249403'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/08/blog-post.html' title='इस्लाम में मिला दिली सुकून'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SnVhQk3FJcI/AAAAAAAAANI/-xPWGl_kP40/s72-c/muhammad-ali-2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-1341001098385672155</id><published>2009-07-23T09:04:00.001+05:30</published><updated>2010-07-18T13:13:16.965+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अब्दुर्रहीम ग्रीन- ब्रिटेन'/><title type='text'>कुरआन ने मुझ पर जादुई असर डाला</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SmfauD-Mn4I/AAAAAAAAAMo/g7mb_0sxTEc/s1600-h/abdur+raheem+green.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5361494366282882946" src="http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SmfauD-Mn4I/AAAAAAAAAMo/g7mb_0sxTEc/s400/abdur+raheem+green.jpg" style="cursor: hand; height: 295px; width: 300px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;मैंने इस्लामिक प्रार्थना में विनम्रता और आत्मीयता महसूस की है। दूसरी तरफ इंग्लैण्ड के लोग भौतिकवादी और उथले हैं। वे खुश होने का दिखावा करते हैं लेकिन खुशी उनसे दूर है।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;अब्दुर्रहीम&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; ग्रीन ब्रिटेन, पहले ईसाई अब इस्लाम के माने हुए स्कॉलर&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #33cc00; font-size: 180%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;तंजानिया&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt; में जन्में और ब्रिटेन में पले बढ़े ४५ वर्षीय ग्रीन का इस्लाम से परिचय मिस्र में हुआ जहां वे अक्सर अपनी छुट्टियां बिताते थे। अक्टूबर १९९७ में उन्होंने गॉड्स फाइनल रिवेलेशन विषय पर बंगलौर में लेक्चर दिया। इस दौरान बंगलौर से अंगे्रजी में प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका इस्लामिक वॉइस ने उनका इन्टरव्यू लिया। यहां पेश है उस वक्त लिया गया अब्दुर्रहीम ग्रीन के इन्टरव्यू का हिन्दी अनुवाद। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;अब्दुर्रहीम ग्रीन इस्लामिक दुनिया में एक जाना पहचाना नाम है। वे पिछले बीस सालों से ब्रिटेन में इस्लामिक मूल्यों के प्रचार प्रसार में जुटे हैं। वे इस्लामिक चैनल पीस टीवी और अन्य इस्लामिक चैनल्स के जरिए भी इस्लाम को बेहतर तरीके से दुनिया के सामने रख रहे हैं। वे पहले ईसाई थे लेकिन ईसाई आस्था से उनका जल्दी ही मोह भंग हो गया। सुकून की तलाश में अब्दुर्रहीम ग्रीन ने कई धर्मों का अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने कुरआन पढऩा करना शुरू किया। वे कुरआन से बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने कुरआन में अपने हर सवाल का जवाब पाया। वे इस नतीजे पर पहुंचे की कुरआन ईश्वरीय ग्रन्थ और फिर अब्दुर्रहीम ग्रीन ने १९८८ में इस्लाम कबूल कर लिया।&lt;/span&gt; &lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि बताएं?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;मैं १९६४ में तंजानिया के दारुस्सलाम में पैदा हुआ। मेरे माता-पिता दोनों ब्रिटेन के थे। मेरे पिता गेविन ग्रीन ब्रिटेन उपनिवेशवाद में एडमिनिस्ट्रेटर थे। बाद मे उन्होंने १९७६ में बारक्लेज बैंक जॉइन कर लिया और उन्हें इजिप्टियन बारक्लेज बैंक को जमाने के लिए इजिप्ट भेजा गया। मैंने मशहूर रोमन कैथोलिक मोनेस्टिक स्कूल एम्पलेफोर्थ में पढ़ाई की और बाद में इतिहास का अध्ययन करने लन्दन यूनिवर्सिटी चला गया। हालंाकि मैंने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी।अभी मैं इंग्लैण्ड की एक इस्लामिक मीडिया कम्पनी के साथ काम कर रहा हूं। इस्लाम के मैसेज को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में जुटा हूं।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;आपने बीच में ही पढ़ाई क्यों छोड़ दी?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;मेरा ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली से मोहभंग हो गया था। दरअसल ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली में विश्व इतिहास को प्रायोजित तरीके से पेश किया गया था। उन्होंने अपनी सभ्यता को महिमामण्डित करके यूरोप पर थोपा है। इजिप्ट में रहने के दौरान कुछ आलीशान खण्डहर देखकर मुझे लगा कि यह तो अच्छे पुरातत्ववेत्ताओं का काम था। मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि पश्चिम ने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया है। मैंने दुनिया के विभिन्न लोगों और सभ्यताओं के इतिहास का अपने स्तर पर अध्ययन करना शुरू किया। मैंने विभिन्न धर्मग्रंथों और दर्शनशास्त्र को भी पढ़ा। मैंने तीन साल तक गहराई से बोध धर्म का भी अध्ययन किया। इस दौरान मैंने जब कुरआन पढ़ा तो मैं इससे बेहद प्रभावित हुआ। कुरआन की शिक्षा ने मुझ पर जादुई असर डाला और मुझे पूरी तरह यकीन हो गया कि कुरआन सच्चे ईश्वर की तरफ से भेजा गया धर्मग्रन्थ है। मैं नहीं जानता कि मैं किस तरह इस्लाम की छांव में आ पहुंचा। मेरा भरोसा है कि ईश्वर ही ने मुझे सही राह दिखाई।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;फिर&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; भी आपको इस्लाम में ऐसा क्या खास लगा जिससे आप सबसे ज्यादा प्रभावित हुए?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;दरअसल आठ साल की उम्र में ही मेरा ईसाईयत से मोहभंग होने लगा था। मैरी की जय जैसे गीतों के जरिए जो कु छ हमें पढ़ाया जाता था, वो मेरे गले नहीं उतरता था। जहां एक तरफ ईसाई ईश्वर को अनन्त और अपार बताते थे,वहीं गॉड को मैरी की कोख से पैदा होना बताने में भी उन्हें कोई झिझक नहीं थी। मुझे लगता था इस हिसाब से तो मैरी गॉड से भी बड़ी हुई। दूसरा ईश्वर का तीन रूपों में होने का ईसाई मत भी मुझे समझ नहीं आता था। ईश्वर का तीन रूपों में बंटे होना और फिर भी एक होने को मैं पचा नहीं पाता था। मेरे लिए मुश्किल तब हो गई जब एक इजिप्टियन ने मेरे से ईसाई धर्म संबंधी कई तीखे सवाल कर डाले। ईसाई मत को लेकर कन्फ्यूज्ड होने के बावजूद मैंने उसके सामने एक सिध्दांतवादी ईसाई होने की कोशिश की जैसे कि अधिकतर गौरे मध्यमवर्गीय ईसाई करते हैं। मैं तब चकरा गया जब उसने मुझसे यह मनवा ही लिया कि ईश्वर जब सूली पर चढ़ाने से मर गया है तो फिर ईश्वर का अनन्त और अपार होने का ईसाई मत खोखला साबित हो जाता है। इस पर मुझे महसूस हुआ कि मैं ऐसी बेतुकी अवधारणा पर भरोसा कर रहा हूं जिसके मुताबिक दो और दो पंाच होते हैं। यह दौर मेरी किशोर अवस्था का था। धीरे-धीरे पश्चिम की बंधी बंधाई और मशीनी जिंदगी से मुझे नफरत सी होने लगी। मैंने पाया कि यूरोपियन लोगों की जिंदगी के संघर्ष का मकसद सिर्फ जिंदगी का लुत्फ उठाना और एंजोय करना है। वे अपने जीवन को किसी अच्छे और बड़े मकसद के लिए नहीं जीते।मैंने जब फिलीस्तीन के मुद्दे पर इजिप्ट और फिलीस्तीन के लोगों से बात की तो समझ आया कि कैसे पश्चिमी देश अपने लोगों को इस मुद्दे पर बरगलाते रहते है। यहूदियों ने कई ऐतिहासिक,राजनैतिक और आर्थिक भ्रान्तियां गढ़कर मीडिया के द्वारा जबरदस्त तरीके से प्रचारित की है। आखिर ऐसे कैसे हो सकता है कि २००० साल पहले यह उनका देश था जिसे छोड़कर वे चले गए थे। मैंने यह भी जाना कि अभी के यहूदी वास्तविक रूप में गुलाम थे जो बाद में यहूदी बने और फिलीस्तीनी सरजमीन शुरु से हरी-भरी रही है। यह तो इजराइल ने गढ़ा है कि जादुई तरीके से यह रेगिस्तान से ग्रीनलैण्ड में तब्दील हो गई। मैंने जब लैटिन अमेरिका और सोवियत ब्लॉक में अमरीका क ी भूमिका का अध्ययन किया तो अमेरिका का दोगला चरित्र देखने को मिला।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;आपने&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; इजिप्ट और इंग्लैण्ड के लोगों में किस तरह का फर्क महसूस किया?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;मैंने पाया कि इजिप्ट के बाशिंदे गरीब और मेहनतकश होने के बावजूद खुशमिजाज हैं। वे अपनी सारी बातें अल्लाह पर छोड़ देते हैं और अपना गम भूल जाते हैं। वे इबादत में अल्लाह के सामने अपनी परेशानियां रखते हैं और अल्लाह उनकी मदद करता है। मैंने उनकी इस्लामिक प्रार्थना में विनम्रता और आत्मीयता महसूस की है।दूसरी तरफ इंग्लैण्ड के लोग भौतिकवादी और उथले हैं। वे खुश होने का दिखावा करते हैं लेकिन खुशी उनसे दूर है। उनकी प्रार्थना में गाने हैं,डांस है,तालियंा पीटना है लेकिन गॉड के प्रति विनम्रता और आत्मीयता उनकी प्रार्थनाओं में नजर नहीं आएंगी। मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि पश्चिमी लोगों की मानसिकता यहूदी नियंत्रित मीडिया की देन है। इन्हीं में एक है फिलीस्तीन को लेकर पश्चिम के लोगों की सोच। मीडिया वहां के लोगों पर एक ही तरह की मानसिकता थोपता है। देखा गया है कि अमेरिका तीसरी दुनिया के देशों को प्रताडि़त करने के लिए मानवाधिकार का बहाना तलाशता रहता है जबकि खुद उन लैटिन अमेरिकी देशों के नेताओं को प्रताडि़त करता रहता है जो उसकी बात नहीं मानते। अमेरिकी मीडिया इन बातों की कभी आलोचना नहीं करता। &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;क्या&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt; इंग्लैण्ड में एक मुस्लिम के रूप में जिंदगी गुजारना मुश्किल है&lt;/span&gt;।&lt;/strong&gt; पश्चिमी मानसिकता व्यक्तिवादी है यानी दूसरों के बजाय हर कोई खुद की सोचता है। इस्लामिक जिंदगी के लिए यह परेशानी का कारण बनती है। नेक मुस्लिम इस तरह के माहोल से परेशानी महसूस करते हैं। हद से ज्यादा खुलापन और सैक्स के चलते उन्हें दिक्कतें होती हैं। इंग्लैण्ड की अधिकतर लड़कियां १३ साल की उम्र तक अपना कोमार्य खो चुकी होती है और सामान्यत एक लड़की के तीन-चार ब्वॉय फै्रण्ड होते हैं। पश्चिम के मुसलमानों के साथ दिक्कत यह है कि वे उस पाश्चात्य सोसायटी के साथ कै से घुले-मिले जहंा स्वच्छंदता,सैक्स और नशा आम है। वे खुद को इन सबसे कैसे बचाए रखें? इंग्लैण्ड में इस्लाम के प्रचार के अच्छे नतीजे सामने आए हैं? इंग्लैण्ड में इस्लामिक मूल्यों का धीरे धीरे प्रचार प्रसार हो रहा है। नव मुस्लिम्स में उत्साह है। वे जानते हैं कि आम आदमी का जीवन किस तरह अंधेरे में है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;आपके&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; परिवार के बारे में बताएं?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; मेरे दो बीवियां और छह बच्चे हैं। &lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;क्या ब्रिटेन में बहू विवाह पर पाबंदी नहीं है?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; यंू तो ब्रिटेन में दूसरे विवाह पर पाबंदी है लेकिन ब्रिटेन के कई लोगों ने दो विवाह कर रखे हैं। दूसरी शादी कॉमन लॉ वाइव्ज के तहत उचित है जिसमें दूसरी बीवी और उसके बच्चे विरासत के हकदार होते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-1341001098385672155?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/1341001098385672155/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=1341001098385672155' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/1341001098385672155'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/1341001098385672155'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/07/blog-post.html' title='कुरआन ने मुझ पर जादुई असर डाला'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SmfauD-Mn4I/AAAAAAAAAMo/g7mb_0sxTEc/s72-c/abdur+raheem+green.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-8573625491959128641</id><published>2009-06-16T21:58:00.001+05:30</published><updated>2010-07-18T13:19:10.372+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माइकल जैक्शन के बड़े भाई जेरीमन जैक्शन मुस्लिम'/><title type='text'>इस्लाम अपनाने के बाद मुझे नई जिंदगी मिली</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SjfJEYomZoI/AAAAAAAAALo/11U8LUM7KR0/s1600-h/Jermaine.jpg"&gt;मशहूर पॉप सिंगर माइकल जेक्सन इस्लाम अपनाकर मिकाइल बन गए हें यह तो आप जानते हें लेकिन क्या आप जानते हैं माइकल के बड़े भाई जो खुद पॉप सिंगर और गिटारवादक थे. वे भी १९८९ में मुस्लिम हो गए थे.&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5347964159695152770" src="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SjfJEYomZoI/AAAAAAAAALo/11U8LUM7KR0/s320/Jermaine.jpg" style="cursor: hand; display: block; height: 320px; margin: 0px auto 10px; text-align: center; width: 231px;" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="color: #3333ff; font-size: 130%;"&gt;अमेरिका के मशहूर पॉप सिंगर माइकल जैक्शन के बड़े भाई जेरीमन जैक्शन ने १९८९ में इस्लाम अपना लिया। इस्लाम कबूल करने के बाद जेरीमन जैक्शन का पहली बार इन्टरव्यू लन्दन के अरबी समाचार पत्र अल-मुजल्ला में प्रकाशित हुआ। इस इन्टरव्यू में उन्होंने इस्लाम अपनाने से जुड़े कई सवालों के जवाब दिए। यह उस वक्त का इन्टरव्यू है जब इनके छोटे भाई माइकल जैक्शन मुस्लिम नहीं हुए थे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;इस्लाम&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; की तरफ आपका सफर कब और कैसे शुरू हुआ?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;१९८९ की बात है, जब मैं अपनी बहन के साथ मध्यपूर्वी देशों की यात्रा पर गया था। बहरीन में रुकने पर हमारा गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया। मैं कुछ बच्चों से मिला और उनसे हल्की-फुल्की गपशप की। मैंने उनसे कुछ सवाल पूछे और उन मासूम बच्चों ने भी जिज्ञासापूर्वक मेरे से कई बातें पूछी। बातचीत के दौरान उन्होंने मुझसे मेरे धर्म के बारे में सवाल किया। मैंने उन बच्चों को बताया कि मैं ईसाई हूं। जब मैंने उनसे पूछा-आप किस धर्म के हो ? इस सवाल पर उनके चेहरे पर एक खास चमक नजर आई। वे सब एक साथ बोले-इस्लाम। उनके इस उत्साहित उत्तर ने मुझे अन्दर तक हिलाकर रख दिया। फिर वे मुझे इस्लाम के बारे में बताने लगे। उन बच्चों ने अपनी उम्र के मुताबिक टुकड़ों में मुझे इस्लाम से जुड़ी कुछ जानकारी दी। उनके बात करने के अन्दाज से मुझे लगा कि उन्हें इस्लाम पर गर्व है। इस तरह मेरा रुख इस्लाम की तरफ हुआ।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;इस्लाम कबूल करने के बाद आपने कैसा महसूस किया?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस्लाम अपनाने के बाद मुझे लगा मानो मुझे नई जिंदगी मिली हो। मैंने इस्लाम में उन सभी सवालों के जवाब पाए जिनके जवाब मैं ईसाई धर्म में नहीं खोज पाया था। खासतौर पर इस्लाम में ही मुझे ईसा मसीह के जन्म संबंधी सवाल का संतोषप्रद जवाब मिला। मैं पहली बार धर्म के मायने सही तरीके से समझ पाया। मैंने अपने परिवार वालों से इस्लाम की इन बातों को प्रोत्साहित करने की विनती की। मेरा परिवार ईसाई धर्म के एवेन्डेन्स ऑफ जेहोवा पंथ का अनुयायी है। इस मत के अनुसार सिर्फ १४४,००० आदमी ही स्वर्ग में जाएंगे। ऐसे कैसे हो सकता है? मेरे लिए हमेशा यह हैरानी की बात बनी रहती थी। मुझे यह जानकर ताज्जुब हुआ कि बाइबल कई सारे लोगों ने संकलित की खासतौर पर किंग जेम्स ने अपने हिसाब से बाइबल को संकलित करा कर उसको अधिकृत माना। मुझे आश्चर्य हुआ कि एक आदमी ईश्वरीय ग्रन्थ का संकलन करता है और इसे ईश्वर से जोड़ देता है लेकिन सच्चाई यह है कि इस तरह के संकलन में ईश्वरीय आदेशों की पालना नहीं की गई। सऊदी अरब ठहरने के दौरान मुझे इंग्लैण्ड के पूर्व पॉप स्टार केट स्टीवन्स से मुस्लिम बने यूसुफ इस्लाम की इस्लामिक कैसेट खरीदने का मौका मिला। इन कै सेट्स से मैंने बहुत कुछ सीखा।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;इस्लाम&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; कबूल करने के बाद अमेरिका लौटने पर किस तरह की प्रतिक्रिया हुई।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; अमेरिका लौटने पर अमेरिकी मीडिया ने इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ जमकर जहर उगला। इस तरह की चर्चाओं ने मेरे दिलो दिमाग पर असर डाला। हॉलीवुड भी मुसलमानों की जमकर निंदा करने में लगा था। वे मुसलमानों को आतंकवादी के रूप में पेश करते थे। ईसाईयत और इस्लाम में कई बातों में समानता है जैसे कि पवित्र कुरआन ईसा मसीह को एक पैगम्बर का दर्जा देता है। मुझे आश्चर्य हुआ कि फिर क्यों अमेरिका के ईसाई मुसलमानों पर बेतुके आरोप लगाते हैं। इस माहौल ने मुझे निराश ही किया। मैंने तय किया कि अमेरिकी मीडिया की इस्लाम और मुसलमानों की बनाई इस गलत इमेज को दूर करने की भरपूर कोशिश करुंगा। मुझे इस बात का अंदाजा नहीं था कि अमेरिकी मीडिया मेरे इस्लाम अपनाने की बात को पचा नहीं पाएगा और इस मुद्दे पर इतना ज्यादा हो हल्ला करेगा। अमेरिकी मीडिया की यह भूमिका अभिव्यक्ति और अंतरात्मा की स्वतंत्रता के लंबे चोड़े खोखले दावों की पोल खोल रही थी। इस तरह अमेरिकी समाज का पाखंड खुलकर मेरे सामने आया। इस्लाम ने मेरी कई समस्याओं के समाधान सुझाए। मैं खुद को एक अच्छा और पूर्ण इंसान महसूस करने लगा।मुस्लिम होने के बाद मैंने खुद में काफी अच्छे बदलाव महसूस किए। मैंने वे सारी चीजें छोड़ दी जो इस्लाम में मना है। मेरे परिवार के सामने भी मुश्किलें आईं। यूं कहें कि जैक्शन परिवार अंतरद्वंद्व में था। मुझे लिखे गए धमकी भरे पत्रों ने मेरे परिवार को चिंतित किया।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;आपको&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; किस तरह की धमकियां दी गई?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;मुझे धमकी दी गई कि इस्लाम अपनाकर मैंने अमेरिकी समाज और सभ्यता से दुश्मनी पाल ली है। मुझे कहा गया कि मैंने अन्य अमेरिकियों के साथ संबंध बनाए रखने का अधिकार खो दिया है। मुझे धमकाया गया कि वे अमेरिका में मेरा जीना हराम कर देंगे। लेकिन मैं मानता हूं कि मेरा परिवार खुले विचारों वाला है। हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। हमारे माता-पिता ने हमें बचपन से ही ऐसा सिखाया था। यही वजह है कि जैक्शन परिवार सभी धर्मों के लोगों से दोस्ताना संबंध रखता है। उसी परवरिश का नतीजा है कि मै अब तक यह सब कुछ सहन करता रहा।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;आपके&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; भाई माइकल जैक्शन की क्या प्रतिक्रिया हुई?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अमेरिका लौटने पर मैं सऊदी अरब से काफी इस्लामिक किताबें ले आया था। खुद माइकल जैक्शन ने उनमें से कुछ किताबें अध्ययन के लिए मेरे से मांगी। इससे पहले मुसलमानों को लेकर उसका नजरिया भी अमेरिकी मीडिया का इस्लाम के खिलाफ दुष्प्रचार से प्रभावित था। वह न तो इस्लाम का विरोधी था और ना ही मुसलमानों का पक्षधर। लेकिन यह किताबें पढऩे के बाद तो वह मुसलमानों के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलता था। इस्लाम के अध्ययन का ही नतीजा था कि माइकल मुस्लिम बिजनेसमेनों में दिलचस्पी लेने लगा। अब तो वह सऊदी अरबपति राजकुमार वलीद बिन तालल की बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बराबर का साझीदार है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;पहले&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; यह कहा गया कि माइकल जैक्शन मुसलमानों का विरोधी है। लेकिन अब चर्चा है कि माइकल भी मुसलमान हो गया है। आखिर सच्चाई क्या है?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मुझे अच्छी तरह याद है कि माइकल ने कभी भी मुसलमानों के खिलाफ अपमानजनक शब्द नहीं बोले। उसके तो गाने भी सबसे प्रेम करने का संदेश देते हैं। हमने तो अपने माता-पिता से सभी से प्रेम करना सीखा है । कुछ लोग उस पर मनगढन्त आरोप लगा रहे हैं। जब मैं मुस्लिम हुआ था तो मेरे खिलाफ भी तो जमकर माहौल बनाया गया था। माइकल को भी ऐसे ही बदनाम किया गया है। हालांकि इस्लाम से नजदीकी बढ़ाने पर माइकल जैक्शन की आलोचना और उसको मिली धमकियों को मीडिया गोल कर गया। लेकिन कौन जानता है तब क्या होगा जब माइकल जैक्शन इस्लाम अपना लेगा।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;आपके&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; धर्म परिवर्तन पर परिवार के बाकी लोगों की क्या प्रतिक्रिया थी?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;मेरे अमेरिका लौटने से पहले ही मेरी मां जान चुकी थी कि मैं मुसलमान हो गया हू। मेरी मां धार्मिक और सभ्य महिला है। उसने मेरे से सिर्फ एक ही सवाल पूछा-तुमने मुसलमान होने का फैसला अचानक लिया है या फिर गहन अध्ययन और चिंतन के बाद? मैंने जवाब दिया-अच्छी तरह चिन्तन और मनन करके ही मैंने यह निर्णय लिया है। हमारा परिवार आस्थावान परिवार के रूप में जाना जाता है। जो कुछ भी आज हम हैं ईश्वर की अनुकम्पा से ही हैं फिर भला ईश्वर के प्रति हमारा समर्पण क्यों न हो? इसी वजह से तो हम जनकल्याणकारी संस्थाओं के जरिए सक्रिय रूप से जनकल्याण में जुटे रहते हैं। हमने गरीब अफ्रीकी देशों के लिए विशेष एयरक्राफ्ट से दवा भिजवाई। बोस्निया युद्ध के दौरान हमने अपने एयरक्राफ्ट के जरिए पीडि़तों की मदद की। हम इस तरह के कामों को लेकर संवेदनशील रहते हैं क्योंकि हमने भी गरीबी को झेला है। हम ऐसे घर में रहते थे जो मुश्किल से कुछ स्क्वायर मीटर ही था।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;क्या आपने अपनी पॉप स्टार बहन जेनेट जेक्शन से इस्लाम के संबंध में चर्चा की थी?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; मेरे धर्म परिवर्तन करने से परिवार के अन्य सदस्यों की तरह मेरी बहन को भी आश्चर्य हुआ। शुरू में तो वह बेहद चिंतित हुई। उसके दिमाग में तो एक ही बात बैठी हुई थी कि मुसलमान कई विवाह करते हैं। जब मैंने उसको अमेरिकी समाज के सन्दर्भ के साथ यह बात बताई कि इस्लाम किन हालात में दूसरे विवाह की इजाजत देता है तो वह जवाब से सन्तुष्ट थी। हकीकत यही है कि पश्चिमी समाज में बेहयाई और बेवफाई आम है। पाश्चात्य देशों में शादीशुदा होने के बावजूद पुरुषों के कई अन्य महिलाओं से शारीरिक संबंध होते हैं। पश्चिमी समाज के नैतिक पतन का यह एक प्रमुख कारण है जबकि इस्लाम इस नैतिक पतन से समाज को बचाए रखने के उपाय सुझाता है। इस्लाम के मुताबिक अगर कोई शख्स किसी महिला की तरफ आकर्षित होता है तो उसके लिए जरूरी है कि वह इस रिश्ते को सम्मानजनक तरीके से निभाए और इसे कानूनी जामा पहनाए। अगर वह ऐसा नहीं कर पाता है तो वह अपनी एक पत्नी के साथ ही निर्वाह करे। दूसरी तरफ यह भी सच्चाई है कि इस्लाम दूसरी शादी पर इतनी शर्तें लगा देता है कि एक आम मुस्लिम के लिए आर्थिक रूप से इनको निभा पाना मुश्किल है। मुस्लिम दुनिया में मुश्किल से एक फीसदी लोग होंगे जिनके एक से अधिक पत्नियां हैं। मेरा मानना है कि इस्लामिक समाज में महिलाएं उस सुगन्धित फूल की तरह है जो घूरने वाली वासनायुक्त निगाह से पूरी तरह से सुरक्षित हैं। दूसरी तरफ पश्चिमी समाज ऐसी सोच से पूरी तरह खाली है। पश्चिम को इस तरह के ज्ञान और दर्शन की सराहना करनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;मुस्लिम&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; सोसाइटी को देखने पर आपको कैसा महसूस हुआ?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; मुझे इसमें मानवता के व्यापक हित नजर आए। मेरा मानना है कि इस्लामिक सोसाइटी इस ग्रह की सबसे सुरक्षित जगह है। महिलाओं का ही उदाहरण लीजिए। अमेरिकी महिलाएं इस तरह के परिधान पहनती हैं जो पुरुषों को उनके उत्पीडऩ का आमत्रंण देते हैं। जबकि इस्लामिक समाज में ऐसा बिल्कुल भी देखने को नहीं मिलेगा। दूसरी तरफ विभिन्न तरह के बिगाड़ों से पश्चिमी समाज का नैतिक पतन हो चुका है। मेरा मानना है कि अगर इंसानियत कहीं बची है तो सिर्फ इस्लामिक सोसाइटी में। समय आएगा जब पूरी दुनिया इस सच्चाई को स्वीकार करेगी।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;अमेरिकी&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; मीडिया के बारे में आपके क्या विचार हैं?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;अमेरिकी मीडिया अन्तर्विरोधों से भरा पड़ा है। हॉलीवुड का उदाहरण लीजिए,जहां आर्टिस्ट का स्तर उसकी गाड़ी के मॉडल और जिस रेस्टोरेंट में वह जाता है,उससे आंका जाता है। मीडिया ही है जो किसी को जमीन से उठाकर आसमान पर बिठा देता है। वह नहीं सोचता कि आर्टिस्ट भी आखिर इंसान ही होते हैं। मैं मध्यपूर्वी देशों के कई आर्टिस्टों से मिला जिनमें ना कोई घमण्ड था और ना ही किसी तरह की गलतफहमी। सीएनएन टीवी चैनल देखते वक्त कुछ छोटी खबरों की बड़ी प्रस्तुति से लगता है मानो दुनिया में इनके अलावा कुछ घटित ही ना हुआ हो। फ्लोरिडा के जंगलों में लगी आग की खबर को देखकर तो ऐसा लगा मानो पूरी पृथ्वी ही आग की चपेट में आ गई हो,जबकि सच्चाई यह थी कि यह एक छोटा सा इलाका था जो आग की चपेट में आ गया था।ओखामा शहर में जब बम ब्लास्ट हुए उस वक्त मैं अफ्रीका में था। बिना किसी सबूत के मीडिया इसमें मुस्लिमों के हाथ होने के खबरें देने लगा। जांच-पड़ताल होने पर इस बम ब्लास्ट का दोषी एक ईसाई निकला। इससे हम अमेरिकी मीडिया की सोच को समझ सकते हैं। अमेरिकन मीडिया ने तो सऊदी अरब को भी नहीं छोड़ा और उसके बारे में अजीब तरह की खबरें फैलाता रहता है। जब मैं पहली बार सऊदी अरब गया तो मेरा मानना था कि वहां के मकान ऐसे ही होंगे और वहां का कम्यूनिकेशन नेटवर्क भी कमजोर होगा। लेकिन जब मैं वहंा पहुंचा तो हैरान रह गया। मुझे यह दुनिया का सभ्य और खूबसूरत मुल्क लगा।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;क्या&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt; आप अपने इस्लामिक व्यक्तित्व और फैमिली कल्चर के बीच तालमेल बिठा लेते हैं?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;क्यों नहीं। अच्छी बातों और उपलब्धियों के बीच तालमेल बनाए रखा जा सकता है। &lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;इस्लाम अपनाने के बाद क्या आप मशहूर बॉक्सर मुहम्मद अली से मिले&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;? मुहम्मद अली हमारे पारिवारिक मित्र हैं। मुसलमान होने के बाद मैं उनसे कई बार मिला। वे इस्लाम से संबंधित मुझे अच्छी बातें बताते &lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;हैं।क्या आपने लॉस एन्जिल्स शहर की शाह फैसल मस्जिद देखी?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;हां,वास्तव में यह एक खूबसूरत मस्जिद है। मैं भी ऐसी ही एक खूबसूरत मस्जिद फालिस इलाके में बनवाना चाहता हंू। क्योंकि इस इलाके में मस्जिद नहीं है और यहां के मुस्लिम आथ्ििक रूप से सक्षम नहीं है कि इस पॉश इलाके में मस्जिद के लिए जमीन खरीद सके। अल्लाह ने चाहा तो मैं यह काम करूंगा।इ&lt;span style="color: red;"&gt;स्लाम के मामले में आप किससे ज्यादा प्रभावित हुए?&lt;/span&gt;मैं कई लोगों से प्रभावित हुआ लेकिन सच्चाई यह है कि सबसे पहले मैंने कुरआन का अध्ययन किया क्योंकि मैं इस रास्ते में आधी-अधूरी जानकारी रखकर किसी तरह का जौखिम नहीं उठाना चाहता था। हालांकि कई ऐसे इस्लामिक उलमा है जिन पर फख्र किया जा सकता है। अल्लाह को मंजूर हुआ तो मेरा इरादा अपने परिवार के साथ उमरा के लिए सऊदी अरब जाने का &lt;span style="color: red;"&gt;है।क्या आपकी पत्नी और बच्चे भी मुसलमान हैं?&lt;/span&gt;मेरे सात बेटे और दो बेटियां हैं जो मेरी तरह ही मुस्लिम हैं। मेरी पत्नी अभी इस्लाम का अध्ययन कर रही है। वह सऊदी अरब जाने के लिए जोर देती है। मुझे भरोसा है कि इन्शा अल्लाह वह भी जल्दी इस्लाम अपना लेगी। सर्वशक्तिमान ईश्वर से दुआ है कि वह हमें इस सच्चे धर्म पर जमे रहने का साहस और सब्र दे। &lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आमीन &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-8573625491959128641?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/8573625491959128641/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=8573625491959128641' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/8573625491959128641'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/8573625491959128641'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/06/blog-post.html' title='इस्लाम अपनाने के बाद मुझे नई जिंदगी मिली'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SjfJEYomZoI/AAAAAAAAALo/11U8LUM7KR0/s72-c/Jermaine.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-2068299411502276425</id><published>2009-06-01T20:19:00.001+05:30</published><updated>2010-07-18T13:22:26.461+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कमला सुरेया ने आखिर इसलाम क्यों कबूला'/><title type='text'>मुस्लिम औरतों की जीवन-शैली पसन्द है</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SiPtdbs_zzI/AAAAAAAAALY/IJmpzGODjcM/s1600-h/kamla_das_madhavi_kutti.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5342374672900017970" src="http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SiPtdbs_zzI/AAAAAAAAALY/IJmpzGODjcM/s320/kamla_das_madhavi_kutti.jpg" style="cursor: hand; display: block; height: 250px; margin: 0px auto 10px; text-align: center; width: 191px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #6600cc; font-size: 130%;"&gt;अंग्रेजी के पाठकों में कमला दास और मलयालम के पाठकों में माधवी कुट्टी के नाम से जानी जाने वाली मशहूर लेखिका और कवयित्री ने दिसम्बर 1999 ई. में इस्लाम कबूल करके अपना नाम सुरैया रख लिया तो केरल के साहित्य, समाज, धर्म और संस्कृति के क्षेत्रों में जैसा तूफान आया, वैसा वहां के इतिहास में किसी एक व्यक्ति के धर्म बदलने से नहीं आया था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #3366ff;"&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;कमला सुरेया ने आखिर इसलाम क्यों कबूला &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 180%;"&gt;&lt;span style="color: #3366ff;"&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;पढिये उन्ही की जुबानी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आपने इस्लाम कबूल करने का फैसला कब किया ï?&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;सुरैया : ठीक-ठीक समय तो याद नहीं। मैं समझती हूं, यह 27 वर्ष पहले की बात है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आपने इतने लम्बे समय तक इन्तजार क्यों किया ?&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;सुरैया : सत्तर के दशक में, जब मैंने इस पर सबसे पहले अपने पति से बात की तो उन्होंने इन्तजार करने को कहा। उन्होंने मुझे इस्लाम पर किताबें पढऩे की सलाह दी। मैंने दोबारा 1984 ई। के लोकसभा चुनावों से पहले धर्म बदलने के बारे में सोचा था। लेकिन उस समय मेरे सभी बच्चों की न तो शादी हुई थी और न वे किसी अच्छे काम पर लगे थे। मैं अपने निर्णय का प्रभाव उनकी जिन्दगी पर नहीं डालना चाहती थी। अब वे सभी अच्छी तरह सेटल्ड हो गए हैं और खुश हैं। इसलिए मैंने अब इस्लाम कबूल करने का ऐलान किया। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;इस्लाम से आपका परिचय किसने कराया ?&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;सुरैया : इस्लाम से पहला परिचय मुंबई में दो मुस्लिम नेत्रहीन बच्चों, इरशाद अहमद और इम्तियाज अहमद के माध्यम से हुआ। दोनों बच्चे नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड द्वारा मेरे पास भेजे गये थे। उस समय मैं स्वैच्छिक रूप से नेत्रहीन बच्चों को पढ़ाया-लिखाया करती थी। वे बच्चे मेरे फ्लैट बैंक हाउस (चर्चगेट, मुंबई) में मेरे साथ रहते थे। मुझे महसूस हुआ कि उन्हें इस्लामी साहित्य भी पढ़ाया जाना चाहिए,इसलिए मैं उन्हें इस्लामी किताबें भी पढ़ाया करती थी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;इस्लाम में ऐसा क्या था जिसने आपको आकर्षित किया&lt;/span&gt; ? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;सुरैया : मैं परदा बहुत पसन्द करती हूं, जो मुस्लिम औरतें पहनती हैं। मैं मुस्लिम औरतों की पारम्परिक जीवन-शैली को पसन्द करती हूं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;लेकिन क्या परदा आपकी आजादी पर पाबन्दी नहीं लगा देगा?&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;सुरैया : मैं अब आजादी नहीं चाहती। मैंने आजादी का बहुत इस्तेमाल कर लिया। आजादी मेरे लिए बोझ बन गई थी। अपने जीवन को नियमित और अनुशासित बनाने के लिए हिदायत चाहती हूं। मैं एक आका चाहती हूं, जो मेरी हिफाजत करे मैं अल्लाह की बन्दी,उसकी आज्ञाकारी बनना चाहती हूं। सचमुच, मैं पिछले 24 सालों से कभी-कभार बुर्का पहनती रही हूं। मैं बाजारों और विदेशों में भी बुर्का पहनकर जाती रही हूं। मेरे पास बहुत-से बुर्के हैं। परदे में औरत की इज्जत की जाती है। कोई भी उसे छूता नहीं और न ही छेड़छाड़ करता है। आपको पूरी हिफाजत मिलती है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;इस्लाम कबूल करने का तात्कालिक कारण क्या था?&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;सुरैया : हाल ही में मैं एक कार से मालाबार से कोच्चि जा रही थी। मैं सुबह 5: 45 पर चली थी। मैंने उगते हुए सूरज को देखा। आश्चर्यजनक रूप से उसका रंग डूबते हुए सूर्य जैसा था। वह मेरे साथ सफर करता रहा। सात बजे वह सफेद हो गया। वर्षों से मैं उस निशान की तलाश में थी जो मुझसे कहे कि अब इस्लाम कबूल कर लो। आखिरकार, मुझे वह पैगाम मिल ही गया। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;क्या आपके बच्चों ने आपके इस फैसले को मान लिया?&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;सुरैया : हां, बिलकुल। उन्होंने मेरे फैसले का सम्मान किया।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #3366ff;"&gt;टाइम्स ऑफ इण्डिया: ५ दिसम्बर १९९९&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-2068299411502276425?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/2068299411502276425/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=2068299411502276425' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/2068299411502276425'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/2068299411502276425'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/06/i-27-1984-24-5-45.html' title='मुस्लिम औरतों की जीवन-शैली पसन्द है'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SiPtdbs_zzI/AAAAAAAAALY/IJmpzGODjcM/s72-c/kamla_das_madhavi_kutti.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-1015967065108631103</id><published>2009-05-31T13:01:00.001+05:30</published><updated>2010-07-18T13:28:39.841+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्रिकेटर यूसुफ योहान्ना - इस्लाम कबूल'/><title type='text'>इस्लाम में पीस है,सुकून है</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TEKzz3BBOyI/AAAAAAAAAaE/YPK_RWkSj98/s1600/mohammad+yousuf-1.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" hw="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TEKzz3BBOyI/AAAAAAAAAaE/YPK_RWkSj98/s320/mohammad+yousuf-1.jpg" width="245" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #6633ff; font-size: 130%;"&gt;पाकिस्तान के मशहूर क्रिकेटर यूसुफ योहान्ना की जुबानी कि क्यों बने वे यूसुफ योहान्ना से मोहम्मद यूसुफ&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: #ff6600;"&gt;पाकिस्तान के मशहूर क्रिकेटर यूसुफ योहान्ना ने सितम्बर २००५ में इस्लाम कबूल किया। उन्होंने अपना नाम मोहम्मद यूसुफ रखा। यूसुफ का कहना है कि उन्होंने इस्लाम अपनाने के ऐलान से तीन साल पहले ही इस्लाम अपना लिया था लेकिन पारिवारिक कारणों के चलते उन्होंने इसका ऐलान नहीं किया था। यूसुफ की बीवी ने भी यूसुफ के साथ ही इस्लाम अपना लिया और अपना नाम तानिया से फातिमा रख लिया। यहां पेश है मोहम्मद यूसुफ का इन्टरव्यू जिसमें उन्होंने इस्लाम कबूल करने से जुड़े विभिन्न सवालों के जवाब दिए है।&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;span class=""&gt;आपका&lt;/span&gt; बचपन कहां और कैसे गुजरा?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;मेरा बचपन रेलवे कालोनी में गुजरा। मुझे बचपन से ही क्रिकेट खेलने का शौक था। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;बचपन में धर्म आपके जीवन में क्या अहमियत रखता था। आपने बचपन में अपने धर्म की शिक्षा ली?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;मैं बचपन में सण्डे को चर्च जाता था। हालांकि मैं चर्च नियमित नहीं जाता था। समझदार होने के बाद मैं हर सण्डे चर्च जाने लगा था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आपका इस्लाम की तरफ रुझान कैसे हुआ?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;मैं मुस्लिम माहौल के बीच ही पला-बढ़ा। मेरे बचपन के सारे दोस्त मुस्लिम थे और मैं मुस्लिम इलाके में ही रहता था। लेकिन सच्चाई यह है कि मुझे इनका अमल इस्लाम के मुताबिक नजर नहीं आता था। अमल के मामले में वे बाकी लोगों की तरह ही थे, इस वजह से उनका कोई खास असर मुझ पर नहीं हुआ। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आखिर आप में ऐसा बदलाव कैसे आया?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;मेरे में अचानक ही बदलाव नहीं आया। जब मैंने तब्लीगी जमात के लोगों का व्यवहार और जिंदगी के प्रति उनका नजरिया देखा तो उनसे बेहद प्रभावित हुआ। हालांकि उन्होने मुझे कभी यह नहीं कहा कि आप मुसलमान बन जाइए। दरअसल मैं उनसे बेहद प्रभावित हुआ और उनको देखकर ही मैं मुस्लिम हो गया। मैं ही क्या यही तब्लीगी जमात अमरीका के कैलीफोर्निया गई हुई थी तो वहां का एक यहूदी इनके अमल से बेहद प्रभावित हुआ और वह मुस्लिम हो गया। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;इस्लाम के खिलाफ जबरदस्त दुष्प्रचार के बावजूद लोग इस्लाम कबूल कर रहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;दरअसल यह हमारा ही क सूर है। हम मुसलमान इसके लिए जिम्मेदार हैं। कहने को पाकिस्तान इस्लामिक देश है लेकिन बाहर से आने वाले व्यक्ति को यहां का माहौल देखकर कतई नहीं लगे कि यहां के लोग इस्लामिक उसूलों को अपनाए हुए हैं।दरअसल यह हमारा ही कसूर है। हम मुसलमान इसके लिए जिम्मेदार हैं। अगर हम पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलेहेवसल्लम की जिंदगी को फोलो करें तो मुसलमानों पर कोई उंगली नहीं उठा सकता।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;इस्लाम में आपको ऐसा क्या खास लगा कि आपने ईसाई धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लिया?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;जिन बाअमल मुसलमानों से प्रभावित होकर मैं मुसलमान बना उनमें मैंने पाया कि इस्लाम जिंदगी गुजारने का एक खास तरीका है। इस्लाम में पीस है,सुकून है,हर एक के साथ अच्छा व्यवहार,लोगों की भलाई की सोच आदि ऐसी बातें हैं जिनसे मैं बेहद प्रभावित हुआ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;पाकिस्तान में अक्सर आंदोलन और विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं,आप इसे ठीक मानते है? &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;हमें शान्ति बनाई रखनी चाहिए। पाकिस्तानी मुसलमानों को शान्तिपूर्वक तरीके से ही ऐसे कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले हमें अपने आपको सुधारना चाहिए। क्या हम वास्तव में इस्लाम के मुताबिक जिंदगी गुजार रहे हैं? जब तक हम खुद सही नहीं होंगे लोग तो हमारा मजाक उड़ाएंगे। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आपके लिए यह फैसला लेना कितना मुश्किल था। इस्लाम कबूल करने पर आपके परिवार वालों की किस तरह की प्रतिक्रिया हुई।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;परिवार वालों ने मेरे इस फैसले का विरोध किया। मुझे अहसास था मेरे घर वाले मुझसे नाराज होंगे लेकिन सच तो यह है कि दुनिया की कामयाबी ही कामयाबी नहीं है। क्योंकि एक दिन सब को मरना है और अपने कर्मों का हिसाब देना है। दुनिया का सबसे बड़ा सच मौत है और सबसे बड़ा झूठ-जिंदगी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आपने अपनी पत्नी को मुसलमान होने के बारे में बताया तो उनकी शुरूआती प्रतिक्रिया क्या रही?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;मैंने उसको यह नहीं बताया था कि मैं मुसलमान हो गया हूं। मैंने उसको बताया कि आजकल मैं ऐसा कुछ कर रहा हूं जिससे मुझे सुकून हासिल हो रहा है,अच्छा महसूस हो रहा है। तुम भी इस्लामिक तालीम को समझो और अगर यह अच्छी लगती है तो इन बातों को अपना लो। क्योंकि इस्लाम में जबरदस्ती नहीं है। इस्लाम जबरदस्ती से नहीं फै लाया गया है। इस्लाम प्यार से फैला है,भलाई से फैला है। इस्लाम मन को पवित्र करता है जिससे लोग खुद को ईश्वर के करीब महसूस करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आपको इस राह पर लाने में सबसे बड़ा हाथ किसका है?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;अल्लाह के हुक्म और पैगम्बर के तरीके के मुताबिक जिंदगी गुजारने वालों से मैं बेहद प्रभावित हुआ। ऐसे लोगों की जिंदगी मेरे लिए अनुकरणीय बनी। इनमें से एक है सईद अनवर।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;पाकिस्तानी क्रिकेट टीम का रुझान भी अब इस्लाम की तरफ देखने को मिलता है। टीम में यह बदलाव कैसे आया?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;मैं काफी समय से टीम में रहा लेकिन पहले मैंने टीम के लोगों में ऐसी अच्छी बातें नहीं पाईं। इस बदलाव का कारण टीम के लोगों का इस्लामिक मूल्यों को अपनी जिंदगी में लागू करना है। सईद अनवर जैसे लोग दुनिया भर में इस्लामिक उसूलों को फैला रहे हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आप उन लोगों को क्या मैसेज देना चाहते हैं जो इस्लाम की हकीकत को जानना चाहते हैं लेकिन किसी दबाव की वजह से घबराते हैं। झिझकते हैं। क्या वास्तव में इस्लाम अपनाना बेहद मुस्लिम है&lt;/span&gt;?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;देखिए मैंने महसूस किया है कि गैर मुस्लिम का मुस्लिम होना इतना मुश्किल नहीं है जितना एक पैदाइशी मुसलमान का इस्लाम के मुताबिक जिंदगी गुजारना। मुसलमानों के बीच इस्लामिक शिक्षा के प्रचार प्रसार की ज्यादा जरूरत है। मैं तो दूसरे धर्म से आया हूं, मुझे पता है दूसरे धर्मों में सुकून और आत्मिक शंाति नहीं है । दिली सुकू न इस्लाम में ही मिलेगा। इस्लाम सच्चा धर्म है। यही वजह है कि मैं इस्लाम में आया। मेरा तो मुस्लिम भाइयों से यही गुजारिश है कि वे अल्लाह के हुक्म और पैगम्बर मुहम्मद साहब की जिंदगी को अपनाएं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आप जब ईसाई थे तो मुसलमानों को देखकर क्या महसूस करते थे? &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;इस्लाम के मुताबिक जिंदगी गुजारने वाले मुसलमानों को देखकर मुझे लगता था कि वास्तव में यह अलग हटकर मजहब है। अल्लाह के हुक्म और पैगम्बर की सुन्नतों के मुताबिक जिंदगी गुजारने वाले लोगों को देखकर ही तो मैं मुस्लिम हुआ हूं। मुझे लगता था सच्चे ईश्वर की तरफ से ही यह मजहब है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-1015967065108631103?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/1015967065108631103/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=1015967065108631103' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/1015967065108631103'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/1015967065108631103'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/05/blog-post.html' title='इस्लाम में पीस है,सुकून है'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TEKzz3BBOyI/AAAAAAAAAaE/YPK_RWkSj98/s72-c/mohammad+yousuf-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-1918370587601356882</id><published>2009-04-07T08:25:00.001+05:30</published><updated>2010-07-18T13:35:01.368+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संजय द्विवेदी ने इस्लाम कुबूल किया.'/><title type='text'>आचार्य संजय द्विवेदी ने अपनाया इस्लाम</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SdrDU9gAfWI/AAAAAAAAAKY/hqzJGlHvN_w/s1600-h/ahmed+pandit.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5321780674565274978" src="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SdrDU9gAfWI/AAAAAAAAAKY/hqzJGlHvN_w/s320/ahmed+pandit.jpg" style="cursor: hand; display: block; height: 240px; margin: 0px auto 10px; text-align: center; width: 320px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: #3333ff; font-size: 180%;"&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;आचार्य संजय द्विवेदी बन गए अहमद पंडित&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;काशी विद्यापीठ से आचार्य की डिग्री ले चुके संजय द्विवेदी ने इस्लाम कुबूल किया.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #3333ff; font-size: 130%;"&gt;कांग्रेस पार्टी के आला नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के पोते आचार्य संजय द्विवेदी को आखिर इस्लाम में ऐसा क्या खास लगा? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: #cc33cc;"&gt;आचार्य संजय पंद्रह साल की उम्र में ही बिरला ग्रुप के मंदिरों के मुख्य पुजारी बन गए थे और वे आल इंडिया ब्राह्मण असोसिअशन के अध्यक्ष भी थे .&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;क्लिक कीजिये और उन्ही से सुनिए आखिर क्यों आये वो इस्लाम की आगोश में &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=yPdts-pxukc"&gt;http://www.youtube.com/watch?v=yPdts-pxukc&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SdrCbEz1IYI/AAAAAAAAAKI/TRNpB8V1FfM/s1600-h/ahmad_pandit-full;init_.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-1918370587601356882?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/1918370587601356882/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=1918370587601356882' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/1918370587601356882'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/1918370587601356882'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/04/blog-post.html' title='आचार्य संजय द्विवेदी ने अपनाया इस्लाम'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SdrDU9gAfWI/AAAAAAAAAKY/hqzJGlHvN_w/s72-c/ahmed+pandit.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-9206079773891025638</id><published>2009-03-13T22:24:00.001+05:30</published><updated>2010-07-18T13:37:15.346+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पीटर सैंडर्स-मुस्लिम'/><title type='text'>खुदा ने मेरे लिए इस्लाम को चुना</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SbqZBm0UdrI/AAAAAAAAAKA/eE_GrhNbgAw/s1600-h/peter.jp1.bmp"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SbqQTXxwCYI/AAAAAAAAAJ4/oVTBOQiP3Qc/s1600-h/peter.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5312717372911520130" src="http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SbqQTXxwCYI/AAAAAAAAAJ4/oVTBOQiP3Qc/s320/peter.jpg" style="cursor: hand; display: block; height: 320px; margin: 0px auto 10px; text-align: center; width: 194px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #cc33cc; font-size: 130%;"&gt;पीटर सैंडर्स ने अपना कैरियर साठ के दशक के मध्य में शुरू किया। वे अपने वक्त के संगीत के सितारों बॉब डायलन,जिमी हैंडरिक्स, द डोर्स और रोलिंग स्टोन्स की अगली पीढ़ी के नुमाइंदे थे। लेकिन संगीत से सैंडर्स के दिल की प्यास नहीं बुझ सकी।&lt;span style="color: #3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #cc33cc; font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;१९७० के आखिर में उन्होंने भारत की आध्यात्मिक यात्रा की। साल भर बाद जब वे ब्रिटेन लौटे तो इस्लाम धर्म ग्रहण कर चुके थे और उन्होने अपना नाम बदलकर अब्दुल अदीम रख लिया था। सैंडर्स अब प्यासे नहीं थे। इस्लाम ने उनके काम को नई ऊर्जा दे दी थी। इसी वर्ष उन्होंने मुस्लिम देशों की यात्राएं शुरू की। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #cc33cc; font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #cc33cc;"&gt;१९७१ में उन्होंने काबा और हज यात्रियों की करीब से तस्वीरें खींची जो पहली बार पश्चिमी अखबारों-द सण्डे टाइम्स और द ऑब्जर्वर में छपीं। आज सैंडर्स या अब्दुल अदीम मुस्लिम समाज के सबसे बड़े फोटोग्राफर के रूप में जाने जाते हैं,संभव है वे इकलौते भी हों। अब्दुल अदीम एक फोटो प्रदर्शनी लगाने जकार्ता आए। रिपब्लिका में प्रकाशित इमान यूनियार्ता एफ़ द्वारा लिए गए उनके साक्षात्कार के प्रमुख अंश हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;strong&gt;१९७१ में भारत की यात्रा के बाद आपने इस्लाम धर्म अपना लिया। यह कैसे हुआ?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;जब मैं बीस साल का हो रहा था,मौत के बारे में सोचता था कि क्या हम इसके बाद खत्म हो जाते हैं? यह सवाल मुझे आतंकित किए हुए था। आखिरकार मैंने संगीत में अपने कैरियर को छोडऩे का फैसला किया। मै भारत गया और वहां पर हिंदू,बौध्द,सिक्ख और इस्लाम धर्मों के बारें में सीखा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आपने इस्लाम को ही क्यों चुना? &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color: #3366ff; font-size: 130%;"&gt;मैं पक्का नहीं जानता। &lt;/span&gt;&lt;span style="color: #3333ff; font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: #3366ff;"&gt;खुदा&lt;/span&gt; ने मेरे लिए इसे चुना। लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span style="color: #3333ff; font-size: 130%;"&gt;भारत में मेरे साथ एक अद्भुत घटना घटित हुई। एक सुबह मैं स्टेशन पर रेल का इंतजार कर रहा था। स्टेशन खचाखच लोगों से भरा था। भीड़ के बीच एक महिला ने अचानक मेरे बगल में अपनी जाजम बिछा ली और नमाज पढऩे लगी। मेरे लिए यह घटना चौंकाने वाली थी। ऐसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था। मैंने एक व्यक्ति से पूछा-यह सब क्या है? उसने जवाब दिया-यह मेरी दादी है। यह मुस्लिम है और प्रार्थना कर रही है। संभव है यही कारण रहा हो। अल्लाह ने वह क्षण एक तस्वीर की तरह मुझे दिया जो आज भी मेरी स्मृतियों में है।&lt;/span&gt; &lt;span style="font-size: 130%;"&gt;जब मैं ब्रिटेन लौटा तो मेरे कई साथी नशे के लती हो चुके थे और कुछ इस्लाम धर्म अपनाकर इससे बचे हुए थे, तब मुझे लगा कि यही मेरा रास्ता है। इसके तीन महीने बाद मेरी जिंदगी में निर्णायक मोड़ आया। मैं हज करने मक्का गया और फिर मैंने चालीस विभिन्न मुस्लिम देशों की एक अंतहीन यात्रा शुरू कर दी।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आपको दुनिया का सबसे दिलचस्प हिस्सा कौनसा लगता है?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;यह सवाल मुझसे अक्सर पूछा जाता है। मेरा जवाब यही होता है-ब्रिटेन। हालाकि मुझे अन्य स्थान भी पसंद है। मैं चीन तीन बार गया। मैं इस बार फिर वहां जाऊंगा। पूरी दुनिया दिलचस्प है और हर देश अपने आप में विशिष्ट है।तस्वीरें खींचने के लिए एक यात्रा में आप कितना वक्त बिताते हैं? जब मै जवान था, एक देश में मैं छह महीने तक रह जाता था। लेकिन अब मैं दो सप्ताह से ज्यादा नहीं रुकता हूं खासकर कठिन इलाकों में।आप विभिन्न देशों के लोगों से कैसे घुल मिल जाते हैं?सिर्फ मुस्कराते रहना ही काफी है,इससे मैं संबंध बना लेता हूं। आप मानें या न मानें इंसान गजब की चीज है। वह जितना गरीब होता है उतना ज्यादा उदार होता है। चीन में नब्बे साल की एक वृध्दा से मैं मिला। यह जानकर कि मैं भी एक मुस्लिम हूं,उसने मुझे अपने यहां बुलाया। उसके यहां पहुंचते ही मैंने देखा कि वहां सिर्फ एक पतला गद्दा और एक दुबली बिल्ली थी। लेकिन इस्लाम हमें मेहमानों का सत्कार करना सिखाता है। उसने मेरा अच्छा स्वागत किया और सबसे अच्छे खाने लगाए। जिस देश में मैं पैदा हुआ,वहां के लोग बहुत संकुचित सोच के हैं। वे पहली मुलाकात में आपको अपने घर आने का न्यौता नहीं देंगे। लेकिन,हम दुनिया के गरीब लोगों में उनकी बदहाली के बावजूद यह दिलचस्प उदार भाव पाते हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: 130%;"&gt;&lt;strong&gt;आपके द्वारा मुस्लिम समाज की ली गई तस्वीरें पश्चिम मीडिया में काफी छपी हैं। आपको उनसे क्या उम्मीद है?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;कई घटनाओं ने मुस्लिमों के खिलाफ नफरत पैदा की है। अमेरिका में ११/९ और ब्रिटेन में ७/७ की घटना। ये लोग डरे हुए हैं। लेकिन आपको जानना चाहिए कि अधिकतर मुस्लिम अमनपसंद है। इस्लाम के मायने ही अमन के है। इस्लाम को हिंसा से जोडऩा गलत है।मैंने संबंधों को जोडऩे की कोशिश की। मैं ब्रिटिश नागरिक हूं। मैं लन्दन में जन्मा हूं। इस्लाम का सम्मान करता हूं। इस्लाम एक महान धर्म है। मैं कई मुस्लिमों से मिलता हूं। सबसे बेहतर वे मुस्लिम है जो अपनी जिंदगी में इस्लाम को अपनाए हुए होते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;क्या आप मुस्लिम समाज के खूबसूरत पक्ष की तस्वीरें उतारते हैं या सच्चाई बयान करने को प्राथमिकता देते हैं?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;मैंने सकारात्मक तस्वीरें बनाने और मुस्लिमों की खूबसूरती को सामने लाने की कोशिश की है। हमें इस जीवन में खूबसूरती की जरूरत है। खुदा को भी खूबसूरत चीजें पसंद हैं। मैं अक्सर गरीब मुस्लिम समुदाय के बीच रहता हूं और मेरा मानना है कि इन लोगों में अब भी खूबसूरती और रहमदिली बाकी है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;तमाम यात्राओं के बाद मुस्लिम समुदाय के बारें में आपकी क्या राय है?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;इस्लाम एक ऐसी स्वच्छ नदी है जिसमें तमाम संस्कृतियां घुलमिल कर एक साथ रह सकती हैं। जब इस नदी की धारा काली चट्टानों से होकर गुजरती है तो पानी काला दिखता है और जब यही धारा पीली चट्टान पर से गुजरेगी तो पानी पीला दिखेगा। यही वजह है कि अफ्रीका में इस्लाम अफ्रीकी है,यूके में इस्लाम ब्रितानी है और चीन में चीनी इस्लाम है।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;आपका एक प्रोजेक्ट परंपरागत मुस्लिम समुदायों के बारे में दस्तावेजीकरण का है। क्यों?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;मैंने पैंतीस साल यात्रांए की और पाया कि इस्लाम पारंपरिक माहौल में बेहतर पनप सकता है जहां कुछ विशिष्ट समुदाय पैदा हो जाते हैं। लेकिन आधुनिक विश्व में यह चीज खत्म हो रही है। पारंपरिक इस्लाम मॉरिशेनिया जैसे स्थानों पर ही बचा है। जहां लोग एक दूसरे की रक्षा करते हैं और अध्यात्म के उच्चतम स्तर पर आपस में जुड़े हैं। यह मैंने पश्चिम में नहीं पाया। मैंने अपने बच्चों को ऐसा माहौल देने की कोशिश की लेकिन ऐसा नहीं हो सका। मैं क्या करता? मैं जबरदस्ती नहीं कर सकता। इस्लाम में जोर जबरदस्ती नहीं चलती। अपनी समझ से ही सच्चाई तक पहुंचा जा सकता है। मैंने इंडोनेशिया में देखा कि यहां आधुनिकता और परंपरागत मान्यताओं के बीच एक संतुलन है।&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;साभार: स्पैन,अंक:फरवरी-मार्च,पेज:२८-२९&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-9206079773891025638?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/9206079773891025638/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=9206079773891025638' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/9206079773891025638'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/9206079773891025638'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/03/blog-post.html' title='खुदा ने मेरे लिए इस्लाम को चुना'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' src='http://1.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/TCwV5HOSFGI/AAAAAAAAAZM/3Dv_5aWT5Zc/S220/LA+I+LAHA......gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SbqQTXxwCYI/AAAAAAAAAJ4/oVTBOQiP3Qc/s72-c/peter.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8466288701788376888.post-6013938390149553214</id><published>2009-02-22T08:23:00.001+05:30</published><updated>2010-07-18T13:39:11.828+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संगीतकार ए आर रहमान-इस्लाम कबूल'/><title type='text'>हम ईश्वर की शरण में आना चाहते थे</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SaDCb1fuzCI/AAAAAAAAAJY/0Eg5n8GH86I/s1600-h/ar-rahman-saira-banu.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5305454144514870306" src="http://4.bp.blogspot.com/_323QzRxEZxk/SaDCb1fuzCI/AAAAAAAAAJY/0Eg5n8GH86I/s320/ar-rahman-saira-banu.jpg" style="cursor: hand; display: block; height: 238px; margin: 0px auto 10px; text-align: center; width: 320px;" /&gt;&lt;/a&gt; अपनी बीवी सायरा के साथ ऐ आर रहमान&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color: red; font-size: 130%;"&gt;इस्लाम कबूल करने का फैसला अचानक नहीं लिया गया बल्कि इसमें हमें दस साल लगे। यह फैसला मेरा और मेरी मां दोनों का सामूहिक फैसला था। हम दोनों सर्वशक्तिमान ईश्वर की शरण में आना चाहते थे। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;संगीतकार ए आर रहमान ने सन् २००६ में अपनी मां के साथ हज अदा किया था। हज पर गए रहमान से अरब न्यूज के सैयद फैसल अली ने बातचीत की। यहां पेश है उस वक्त सैयद फैसल अली की रहमान से हुई गुफ्तगू। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;भारत के मशहूर संगीतकार ए आर रहमान किसी परिचय के मोहताज नहीं है। तड़क-भड़क और शोहरत की चकाचौंध से दूर रहने वाले ए आर रहमान की जिंदगी ने एक नई करवट ली जब वे इस्लाम की आगोश में आए। रहमान कहते हैं-इस्लाम कबूल करने पर जिंदगी के प्रति मेरा नजरिया बदल गया। भारतीय फिल्मी-दुनिया में लोग कामयाबी के लिए मुस्लिम होते हुए हिन्दू नाम रख लेते हैं,लेकिन मेरे मामले में इसका उलटा है यानी था मैं दिलीप कुमार और बन गया अल्लाह रक्खा रहमान। मुझे मुस्लिम होने पर फख्र है। संगीत में मशगूल रहने वाले रहमान हज के दौरान मीना में दीनी माहौल से लबरेज थे। पांच घण्टे की मशक्कत के बाद अरब न्यूज ने उनसे मीना में मुलाकात की। मगरिब से इशा के बीच हुई इस गुफ्तगू में रहमान का व्यवहार दिलकश था। कभी मूर्तिपूजक रहे रहमान अब इस्लाम के बारे में एक विद्वान की तरह बात करते हैं। दूसरी बार हज अदा करने आए रहमान इस बार अपनी मां को साथ लेकर आए। उन्होने मीना में अपने हर पल का इबादत के रूप में इस्तेमाल किया। वे अराफात और मदीना में भी इबादत में जुटे रहे और अपने अन्तर्मन को पाक-साफ किया। अपने हज के बारे में रहमान बताते हैं-अल्लाह ने हमारे लिए हज को आसान बना दिया। इस पाक जमीन पर गुजारे हर पल का इस्तेमाल मैंने अल्लाह की इबादत के लिए किया है। मेरी अल्लाह से दुआ है कि वह मेरे हज को कबूल करे। उनका मानना है कि शैतान के कंकरी मारने की रस्म अपने अंतर्मन से संघर्ष करने की प्रतीक है। इसका मतलब यह है कि हम अपनी बुरी ख्वाहिशों और अन्दर के शैतान को खत्म कर दें। वे कहते हैं-मैं आपको बताना चाहूंगा कि इस साल मुझे मेरे जन्मदिन पर बेशकीमती तोहफा मिला है जिसको मैं जिन्दगी भर भुला नहीं पाऊंगा। इस साल मेरे जन्मदिन ६ जनवरी को अल्लाह ने मुझे मदीने में रहकर पैगम्बर की मस्जिद में इबादत करने का अनूठा इनाम दिया। मेरे लिए इससे बढ़कर कोई और इनाम हो ही नहीं सकता था। मुझे बहुत खुशी है और खुदा का लाख-लाख शुक्र अदा करता हूं। इस्लाम स्वीकार करने के बारे में रहमान बताते हैं- यह १९८९ की बात है जब मैंने और मेरे परिवार ने इस्लाम स्वीकार किया। मैं जब नौ साल का था तब ही एक रहस्यमयी बीमारी से मेरे पिता गुजर गए थे। जिंदगी में कई मोड़ आए। वर्ष-१९८८ की बात है जब मैं मलेशिया में था। मुझे सपने में एक बुजुर्ग ने इस्लाम धर्म अपनाने के लिए कहा। पहली बार मैंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन यही सपना मुझे कई बार आया। मैंने यह बात अपनी मां को बताई। मां ने मुझे प्रोत्साहित किया और कहा कि मैं सर्वसक्तिमान ईश्वर के इस बुलावे पर गौर और फिक्र करूं। इस बीच १९८८ में मेरी बहन गम्भीर रूप से बीमार हो गई। परिवार की पूरी कोशिशों के बावजूद उसकी बीमारी बढ़ती ही चली गई। इस दौरान हमने एक मुस्लिम धार्मिक रहबर की अगुवाई में अल्लाह से दुआ की। अल्लाह ने हमारी सुन ली और आश्चर्यजनक रूप से मेरी बहन ठीक हो गई। और इस तरह मैं दिलीप कुमार से ए आर रहमान बन गया। इस्लाम कबूल करने का फैसला अचानक नहीं लिया गया बल्कि इसमें हमें दस साल लगे। यह फैसला मेरा और मेरी मां दोनों का सामूहिक फैसला था। हम दोनों सर्वशक्तिमान ईश्वर की शरण में आना चाहते थे। अपने दुख दूर करना चाहते थे। शुरू में कुछ शक और शुबे दूर करने के बाद मेरी तीनों बहिनों ने भी इस्लाम स्वीकार कर लिया। मैंने उनके लिए आदर्श बनने की कोशिश की। ६ जनवरी १९६६ को चेन्नई में जन्मे रहमान ने चार साल की उम्र में प्यानो बजाना शुरू कर दिया था। नौ साल की उम्र में ही पिता की मृत्यु होने पर रहमान के नाजुक कंधों पर भारी जिम्मेदारी आ पड़ी। मां कस्तूरी अब करीमा बेगम और तीन बहिनों के भरण-पोषण का जिम्मा अब उस पर था। ग्यारह साल की उम्र में ही वे पियानो वादक की हैसियत से इल्याराजा के ग्रुप में शामिल हो गए। उनकी मां ने उन्हें प्रोत्साहित किया और वे आगे बढऩे की प्रेरणा देती रहीं। रहमान ने सायरा से शादी की। उनके तीन बच्चे हैं-दस और सात साल की दो बेटियां और एक तीन साल का बेटा। रहमान ने बताया कि इबादत से उनका तनाव दूर हो जाता है और उन्हें शान्ति मिलती है। वे कहते हैं- मैं आर्टिस्ट हूं और काम के भयंकर दबाव के बावजूद मैं पांचों वक्त की नमाज अदा करता हूं। नमाज से मैं तनावमुक्त रहता हूं और मुझमें उम्मीद व हौसला बना रहता है कि मेरे साथ अल्लाह है। नमाज मुझे यह एहसास भी दिलाती रहती है कि यह दुनिया ही सबकुछ नहीं है,मौत के बाद सबका हिसाब लिया जाना है। रहमान ने अपना पहला हज २००४ में किया। इस बार उनकी मां उनके साथ थी। वे कहते हैं-इस बार मैं अपनी पत्नी को भी हज के लिए लाना चाहता था,लेकिन मेरा बेटा केवल तीन साल का है, इस वजह से वह नहीं आ सकी। अगर अल्लाह को मंजूर हुआ तो मैं फिर आऊंगा,अगली बार पत्नी और बच्चों के साथ। वे कहते हैं-इस्लाम शान्ति,प्रेम,सहअस्तित्व,सब्र और आधुनिक धर्म है। लेकिन चन्द मुसलमानों की गलत हरकतों के कारण इस पर कट्टरता और रूढि़वादिता की गलत छाप लग गई है। मुसलमानों को आगे आकर इस्लाम की सही तस्वीर पेश करनी चाहिए। अपने ईमान और यकीन को सही रूप में लोगों के सामने प्रस्तुत करना चाहिए। मुसलमानों की इस्लामिक शिक्षाओं से अनभिज्ञता दिमाग को झकझोर देती है। रहमान कहते हैं-मुसलमानों को इस्लाम के बुनियादी उसूलों को अपनाना चाहिए जो कहते हैं-अपने पड़ौसियों के साथ बेहतर सुलूक करो,दूसरों से हंसकर मिलो,एक ईश्वर की इबादत करो और गरीबों को दान दो। इंसानियत को बढ़ावा दो,और किसी से दुश्मनी मत रखो। इस्लाम यही संदेश लेकर तो आया है। हमें अपने व्यवहार,आदतों और कर्मों से दुनिया के सामने इंसानियत की एक अनूठी मिसाल पेश करनी चाहिए। पैगम्बर मुहम्मद सल्ललाहो अलेहेवसल्लम ने अपने अच्छे व्यवहार,सब्र और सच्चाई के साथ ही इस्लाम का प्रचार किया। आज इस्लाम को लेकर दुनिया भर में फैली गलतफहमियों को दूर किए जाने की जरूरत है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;सैयद फैसल अली&lt;br /&gt;अरब न्यूज जुमा,13जनवरी,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;प्रस्तुति: जहीर हसन खुश्तर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;a href="mailto:jaheerhasan@yahoo.com"&gt;jaheerhasan@yahoo.com&lt;/a&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8466288701788376888-6013938390149553214?l=newmuslim.islamicwebdunia.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/feeds/6013938390149553214/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8466288701788376888&amp;postID=6013938390149553214' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/6013938390149553214'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8466288701788376888/posts/default/6013938390149553214'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://newmuslim.islamicwebdunia.com/2009/02/13-jaheerhasanyahoo.html' title='हम ईश्वर की शरण में आना चाहते थे'/><author><name>इस्लामिक वेबदुनिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11061886527726526853</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='17' 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&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;मेरे&lt;/span&gt; माता-पिता प्रोटेस्टेन्ट ईसाई थे। ननिहाल और ददिहाल दोनों ओर धर्म की बड़ी चर्चा थी। हाई स्कूल की शिक्षा समाप्त हुई तो मेरा विवाह हो गया। और शादी होते ही मैं मॉडलिंग के पेशे से जुड़ गयी। अल्लाह ने मुझे सुन्दर बनाया था। फिर मैं मेहनत भी खूब करती थी। जल्द ही कारोबार चल निकला। पैसे की रेल-पेल हो गयी। गाड़ी, बंगला आदि सुख-सुविधाओं की सभी चीज़ें उपलब्ध हो गयीं। स्थिति यह हो गयी थी कि अपनी पसन्द का जूता खरीदने के लिए मैं हवाई जहाज़ से दूसरे शहर जाती थी। इसी बीच मैं एक बेटे और एक बेटी की मां भी बन गयी। परन्तु यह भी एक सच्चाई है कि नाना प्रकार की सुख सुविधाओं के बावजूद भी मैं संतुष्ट नहीं थी। कोई कसक थी जो मन को व्याकुल किये रखती थी। जीवन में शून्य का आभास बढ़ता जा रहा था। इसी बेचैनी में मैंने मॉडलिंग का पेशा त्याग दिया। और ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार में लग गयी। अब मैं विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए जाने लगी। वहां पहुंचकर अपनी शिक्षा पूरी करने का विचार आया। मैंने विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया। उस समय मेरी आयु 30 वर्ष थी। अब मेरा सोभाग्य कहिए कि मुझे एक ऐसी क्लास में दाखिला मिला जिसमें कालों और एशियाई मूल के छात्रों की संख्या अच्छी-खासी थी। यह देखकर मैं बहुत परेशान हुई, परन्तु अब क्या हो सकता था। मेरी उलझन उस समय और अधिक बढ़ गयी जब मुझे पता चला कि उनमें कई छात्र मुसलमान भी हैं। मुझे मुसलमानों से अत्यधिक घृणा थी। आम यूरोपीय सोच के अनुसार मेरा भी यही विचार था कि इस्लाम बर्बरता एवं जिहालत वाला धर्म है और मुसलमान असभ्य, अय्याश, महिलाओं पर अत्याचार करने वाले लोग होते हैं। अमे
