गुरुवार, 9 मई 2013

श्रीलंकाई ईसाई पादरी इस्लाम की शरण में

जॉज एंथोनी श्रीलंका में कैथोलिक पादरी थे। एंथोनी की इस्लाम कबूल करने और अपना नाम अब्दुल रहमान रखने की दास्तां बड़ी रोचक और दिलचस्प है।  एक ईसाई पादरी के रूप में उनकी बाइबिल की शिक्षा पर अच्छी पकड़ थी। वे आज भी फर्राटे से बाइबिल की कई आयतों को कोट करते हैं। बाइबिल अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि बाइबिल में कई विरोधाभास हैं। वे सिंहली भाषा में बाइबिल की उन आयतों का जिक्र करते हैं जो संदेहास्पद और विरोधाभाषी हैं।
वे कहते हैं कि बाइबिल में पैगम्बर मुहम्मद सल्ल.की भाविष्यवाणी की गई है। अब्दुल रहमान कहते हैं कि ईसाई ईसा मसीह को गॉड मानते हैं जबकि इसके विपरीत पवित्र बाइबिल में उन्हें एक इंसान के रूप में बताया गया है।
अब्दुल  रहमान कहते हैं कि ईसाइयत, बौद्ध धर्म और अन्य दूसरे धर्मों में ईश्वर द्वारा पैगम्बर भेजे जाने की अवधारणा इतनी स्पष्ट और प्रभावी नहीं है बल्कि कई पैगम्बारों के मामले में ये धर्म खामोश हैं जबकि इस्लाम में सभी पैगम्बरों को मानना और उन्हें पूरा-पूरा सम्मान देना जरूरी है। इस्लाम की यह अवधारणा और नजरिया हर किसी को प्रभावित करता है और उस पर अपना असर छोड़ता है।
अब्दुल रहमान कहते हैं कि रोमन कैथोलिक पादरी पर शादी का प्रतिबंध लगाने के पीछे कोई कारण समझ में नहीं आता जबकि ईसाइयों के अन्य कई दूसरे वर्गों के पादरी शादी कर सकते हैं। अब्दुल  रहमान ईसाइयत से जुड़े ऐसे ही विरोधाभास और शंकाओं पर विचार मग्र और सोच विचार कर रहे थे कि इस बीच उन्हें एक ऑडियो कैसेट हासिल हुई। यह ऑडियो कैसेट श्रीलंका के ईसाई पादरी शरीफ डी. एल्विस के बारे में थी जिन्होंने ईसाइयत छोड़कर इस्लाम अपना लिया था। इस्लामिक विद्वान अहमद दीदात की कई ऑडियो कैसेट्स  से भी अब्दुल रहमान  बेहद प्रभावित हुए। वे लगातार सच्चाई की तलाश में जुटे रहे और फिर एक दिन फादर जॉर्ज एंथनी इस्लाम अपनाकर अब्दुल रहमान बन गए।

अब्दुल रहमान श्रीलंका के राथ्नापुरा गांव के बांशिदे हैं और वे काटूमायाका चर्च में पादरी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। दस साल तक पादरी का प्रशिक्षण लेने के बाद ही जॉर्ज को पादरी का यह पद हासिल हुआ था।
अब्दुल रहमान ने अपनी मां को एक खत लिखा जिसमें उन्होंने अपनी मां को इस्लाम से रूबरू कराया। इस्लाम का कई महीनों तक अध्ययन करने के बाद उनकी मां ने भी इस्लाम अपना लिया। अब्दुल  रहमान की एकमात्र बहिन ग्रीस में काम करती है। उनके पिता और बहिन अभी तक ईसाई हैं।
अब्दुल रहमान ने सच्चाई अपनाने की खातिर ईसाई पादरी जैसे बेहद सम्मानजनक ओहदे को छोड़ दिया। उन्होंने आध्यात्मिक सुकून हासिल करने के लिए खुशी-खुशी दुनियावी सुख-सुविधाओं को कुर्बान कर दिया। फिलहाल अब्दुल रहमान इस्लाम प्रेजेंटेशन कमेटी ऑफ कुवैत से जुड़कर इस्लामी प्रशिक्षु के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

1 टिप्पणियाँ:

वीना ने कहा…

इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है लेकिन पढ़कर थोड़ा-सा ही समझ आया.....