सोमवार, 7 फरवरी 2011

पादरी जो मुसलमान हो गया

इब्राहिम खलील अहमद जिनका पुराना नाम खलील फिलोबस था, पहले इजिप्ट के कॉप्टिक पादरी थे। फिलोबस ने धर्मशास्त्र में प्रिंसटोन यूनिवर्सिटी से एम ए किया। इस्लाम को गलत रूप में पेश करने के मकसद से फिलोबस ने इसका अध्ययन किया। वे इस्लाम में कमियां ढूढना चाहते थे लेकिन हुआ इसका उलटा। वे इस्लाम से बेहद प्रभावित हुए और उन्होने अपने चार बच्चों के साथ इस्लाम कबूल कर लिया।
                   जानिए खलील इब्राहिम आखिर कैसे आए इस्लाम की गोद में?


  मैं १३जनवरी १९१९को अलेक्जेन्डेरिया में पैदा हुआ था। मैंने सैकण्डरी तक की शिाक्षा अमेरिकन मिशन स्कूल से हासिल की। १९४२ में डिप्लोमा हासिल करने के बाद मैंने धर्मशास्र में स्पेशलाइजेशन के लिए यूनिवर्सिटी में एडमिशान लिया। धर्मशास्र में प्रवेश लेना आसान नहीं था। चर्च की खास सिफारिश पर ही इस विभाग में एडमिशन लिया जा सकता था और इसके लिए एक मुशिकल परीक्षा से भी गुजरना पडता था। मेरे लिए अलेक्जेन्डेरिया अलअटारिन चर्च ने सिफारिश की और लॉअर इजिप्ट की चर्च असेम्बली ने भी मेरा इम्तिहान लिया। असेम्बली ने धर्म के क्षेत्र में मेरी योग्यता का अंकन किया। नोडस चर्च असेम्बली ने भी मेरी सिफारिश की। इस असेम्बली में सूडान और इजिप्ट के पादरी थे। कुल मिलाकर मुझे धर्मशास्र विभाग में एडमिशान के लिए कडे इम्तिहानों से गुजरना पडा।१९४४ में बोर्डिंग स्टूडेंट के रूप में धर्मशास्र विभाग में एडमिशान के बाद मैंने १९४८ तक ग्रेजुएशन के दौरान अमेरिकन और इजिप्टियन टीचर्स से अध्ययन किया।
   शिक्षा पूरी होने पर मुझे यरूशलम में नियुक्त किया जाना था लेकिन इस्राइल और फिलीस्तीन के बीच युध्द छिड़ जाने के कारण में वहां नहीं गया और मुझे उसी साल इजिप्ट के आसना में भेज दिया गया। इसी साल मैंने अमेरिकन यूनिवर्सिटी से थिसिस के लिए अपना पंजीयन कराया। मेरे थिसिस का सब्जेक्ट था-‘मुसलमानों के बीच ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां।’ इस्लाम से मेरा परिचय तब हुआ था जब मैंने धर्मशस्र का अध्ययन शुरू किया था। वहां मैंने इस्लाम और मुसलमानों के विशवास और विचारधारा को डगमगाने और भ्रमित करने व उनके धर्म से संबंधित उनके बीच गलतफहमियां पैदा करने के तरीकों का अध्ययन किया।मैंने अमेरिका की प्रिंसटोन यूनिवर्सिटी से १९५२ में एम ए किया। फिर मैं एसूट में धर्मशास्र विभाग में टीचर नियुक्त हुआ। मैं स्टूडेंट को इस्लाम से जुड़ी वे बातें ही पढ़ाता था जो ईसाई मिशनरी मुसलमानों के खिलाफ आम लोगों के बीच बताती थींं। इस्लाम विरोधी ताकतों की ओर से फैलाई जाने वाली झूठी भा्रंतियों को बताकर इस्लाम का गलत रुप स्टूडेंट के सामने पेश करता था। इस्लाम संबंधी अपनी इस क्लास के दौरान मुझे महसूस होने लगा कि मुझे इस्लाम संबंधी अपनी जानकारी को बढाना चाहिए।
    मैंने तय किया कि मुझे ईसाई मिशनरियों की इस्लाम के खिलाफ लिखी किताबों के अलावा मुस्लिम लेखकों की किताबें भी पढनी चाहिए। मैंने कुरआन को समझकर पढने का भी निर्णय किया। ज्यादा से ज्यादा इस्लाम की जानकारी हासिल करने के पीछे मेरा मकसद इस्लाम में और खामियां निकालना था। इस अध्ययन का नतीजा मेरी सोच के बिल्कुल उलट निकला। मैं अजीब कशमकश में फंस गया। मेरे मन में अंतरव्ंदव्द चलने लगा क्योंकि अब तक जो कुछ मैं इस्लाम की कमियां लोगों को बताता था ऐसा मैंने कुरआन के अध्ययन में नहीं पाया। मेरे आरोप मुझे निराधार लगने लगे। मैं इस सच्चाई का सामना करने से कतराता रहा और मैंने इस्लाम का नेगेटिव अध्ययन कराना जारी रखा।
   १९५४ में मैं जर्मन स्विस मिशन के महासचिव के रूप में आसवान गया। वहां भी मुझे इस्लाम संबंधी भ्रांतियां पैदा करनी थी जो मेरे मिशन का हिस्सा थी। एक होटल में मिशनरी की ओर से कॉन्फ्रेस का आयोजन किया गया। इस मौके पर मैंने इस्लाम को लेकर कई भा्रंतियां पैदा की। अपने लेक्चर के अंत में मेरे मन में अंतव्र्दव्द शुरू हो गया। मैं अपनी इस भूमिका के बारे में सोचने लगा। मैं अपने आपसे सवाल करने लगा कि सच्चाई जानने के बावजूद मैं आखिर झूठ क्यों बोल रहा हूं? आखिर मैं सच्चाई से मुंह क्यों मोड़ रहा हूं? इसी कशमकश के बीच मैं कॉन्फ्रेस खत्म होने से पहले ही वहां से अपने घर के लिए रवाना हो गया। मैं मंथन करने लगा।
 इस बीच जब मैं एक पार्क की तरफ जा रहा था तो मैंने रेडियो में कुरआन की यह आयत सुनी-    कह दो-मेरी ओर ईवर ने ज्ञान भेजा है कि जिन्नों के एक गिरोह ने कुरआन सुना, फिर जिन्नों ने कहा कि हमने एक मनभाता कुरआन सुना जो भलाई और सूझबूझ का मार्ग दिखाता है; इसलिए हम उस पर ईमान ले आए और अब हम कभी किसी को अपने रब का साझी नहीं ठहराएंगे।
    कुरआन ७२ :१-२

और यह कि जब हमने हिदायत की बात सुनी तो उस पर ईमान ले आए। अब जो कोई अपने रब पर ईमान लाएगा,उसे न तो किसी हक के मारे जाने का भय होगा और न किसी जुल्म ज्यादती का।   कुरआन ७२ :१३
   कुरआन की यह आयत सुनने के बाद उस रात मुझे सुकून का एहसास हुआ। घर पहुचने के बाद मै पूरी रात लाइब्रेरी में बेठकर कुरआन पढ़ता रहा। मेरी पत्नी ने मुझसे पूरी रात बैठे रहने का कारण पूछा लेकिन मैंने उससे मुझे अकेले छोड़ देने को कहा। मैं काफी देर तक कुरआन की इस आयत पर गौर व फिक्र करता रहा-
  यदि हमने इस कुरआन को किसी पर्वत पर भी उतार दिया होता तो तुम अवश्य देखते अल्लाह के भय से वह दबा हुआ और फटा जाता है। ये मिसालें हम लोगों के लिए इसलिए पेश करते हैं कि वे सोच विचार करें। कुरआन ५९:२१

 मैंने इन आयतों पर भी चिंतन किया-
  तुम ईमान वालों का दुशमन सब लोगों से बढकर यहूदियों और मुशरिकों को पाओगे और ईमान वालों के लिए मित्रता में सबसे निकट उन लोगों को पाओगे जिन्होने कहा कि -हम ईसाई हैं। यह इस कारण कि ईसाईयों में बहुत से धर्मज्ञाता और संसार त्यागी संत पाए जाते हैं। और इस कारण कि वे अहंकार नहीं करते। जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आखें आंसुओं से छलकने लगती हंै । इसका कारण यह है कि उन्होने सच्चाई को पहचान लिया है । वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। इसलिए तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले। और हम अल्लाह पर और जो सत्य हमारे पास पहुंचा है उस पर ईमान क्यों नहीं लाएं,जबकि हमें उम्मीद है कि हमारा रब हमें अच्छे लोगों के साथ हमें जन्नत में दाखिल करेगा।
                          कुरआन ५:८२-८४

 मैंने इन आयात पर भी गौर किया-
   तो आज इस दयालुता के अधिकारी वे लोग हैं जो उस रसूल उम्मी का अनुसरण करते हैं,जिसके बारे में वे अपने यहां तौरात और इंजील में लिखा पाते हैं। और जो उन्हे भलाई का हुक्म देता है और बुराई से रोकता है। उनके लिए अच्छी स्वच्छ चीजों को हलाल और बुरी अस्वच्छ चीजों को हराम ठहराता है और उन पर से उनके वह बोझ उतारता है,जो अब तक उन पर लदे हुए थे। उन बन्धनों को खोलता है,जिनमें वे जकड़े हुए थे। अत जो लोग उस पर ईमान लाए, उसका सम्मान किया और उसकी सहायता की और उस हिदायत के मार्ग पर चले जो वो लेकर आए,तो ऐसे ही लोग सफलता प्राप्त करने वाले हैं।

कहो-ऐ लोगो! मैं तुम सबकी ओर उस अल्लाह का रसूल हूं जो आकाशों और धरती के राज्य का स्वामी है, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं,वही जीवन देता है और वही मौत देता है। अत अल्लाह और उसके रसूल,उस उम्मी नबी पर ईमान लाओ जो खुद अल्लाह और उसके कलाम पर ईमान रखता है। उसका अनुसरण करो,ताकि तुम सही राह पा लो। कुरआन ७:१५७-१५८

     उस रात मैंने सच्चाई जान ली और फिर इस्लाम कबूल करने का फैसला कर लिया। सुबह मैंने अपने इस फैसले के बारे में अपनी पत्नी को बताया। मेरे तीन बेटे और एक बेटी हैं। मेरी पत्नी को यह एहसास होने पर कि मैं जल्दी ही इस्लाम कबूल करने जा रहा हूं तो उसने बिना देरी किए ईसाई मिशनरी के मुखिया से मदद मांगी और मुझे रोकने को कहा। मिशनरी के मुखिया स्विटजरलेंड के मॉन्सियोर शोविटस बहुत चतुर व्यक्ति थे। मॉन्सियोर के पूछने पर मैंने उनको साफ साफ बता दिया कि मैं अब इस्लाम अपनाना चाहता हूं, यह जानकर उन्होने मुझसे कहा कि ऐसा करने पर तुम्हे नौकरी से निकाल दिया जाएगा और इसके लिए तुम खुद जिम्मेदार बनोगे। मैंने तुरंत अपना इस्तीफा उनको पकड़ा दिया। उन्होने मुझ पर अपना फैसला वापस लेने का दबाव बनाया और मेरी मानसिकता बदलने की काफी कोशिश की लेकिन मैं अपने फैसले पर अटल था। मुझे अपने फैसले पर अडिग देख मॉन्सियोर ने मेरे बारे में अफवाह उड़ा दी कि मैं पागल हो गया हूं। फिर तो मुझे बेहद मुशिकलों का सामना करना पड़ा। मुसीबतों से परेशान होकर मैं आसवान छोड़कर वापस केअरो आ गया। केअरो में मेरा परिचय एक सम्मानीय और अच्छे प्रोफेसर से हुआ। उन्होने मेरे बारे में बिना कुछ जाने मुसीबतों और परेशानियों के दौर में मेरा साथ दिया। मैंने उनके सामने अपना परिचय एक मुस्लिम के रूप में दिया था हालांकि तब तक मैंने आफिसियल रूप से इस्लाम कबूल नहीं किया था। डॉ मुहम्मद अब्दुल मोनेम अल जमाल नाम के यह व्यक्ति कोसागार में सचिव थे। उनकी इस्लामिक अध्ययन में जबरदस्त दिलचस्पी थी और वे कुरआन का अमेरिकी अंगे्रजी में अनुवाद कराने के इच्छुक थे। उन्होने कुरआन के अनुवाद के लिए मुझसे मदद चाही क्योंकि मेरी अंग्रेजी अच्छी थी और मैं अमेरिकन यूनिवर्सिटी से एम ए कर चुका था। वे यह भी जानते थे कि मैं कुरआन,तोरात और बाइबिल का तुलनात्मक अध्ययन कर रहा हूं। मैंने उनकी कुरआन के अनुवाद में मदद की।इस बीच जब डॉ जमाल को पता चला कि मैंने नौकरी छोड़ दी है और इन दिनों मैं बेरोजगार हूं तो उन्होने मुझे केअरो में ही नौकरी दिलाने में मेरी मदद की। और इस तरह मेरी गाड़ी फिर से पटरी पर आ गई। इस दौरान पत्नी से दूर रहने पर उसको लगा कि मैंने उसको भुला दिया है जबकि उससे दूरी इस बीच की उथल पुथल के कारण हुई थी। इस्लाम ग्रहण करने के ऐलान का इरादा मैंने कुछ वक्त के लिए टाल दिया क्योंकि मैं इससे उत्पन्न होने वाली स्थितियों से निपटने के लिए खुद को और मजबूत बनाना चाहता था। १९५५ में मैंने अपना इस्लामिक अध्ययन और विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन पूरा कर लिया। इस बीच मेरा जीवन सहज हो गया था। मैंने नौकरी छोड़कर स्टेशनरी निर्यात का बिजनेस शुरू कर दिया था। बिजनेस में मैंने अपनी जरूरत के मुताबिक अच्छा पैसा कमाया। इस तरह सैट होने के बाद मैंने इस्लाम कबूल करने और इसका ऐलान करने का निशचय किया। और फिर २५ दिसंबर १९५९ को मैंने इजिप्ट में अमेरिकन मिशान के मुखिया डॉ थॉमसन को टेलीग्राम के जरिए इस्लाम कबूल करने की जानकारी दी। मैंने डॉ जमाल को अपनी वास्तविक दास्तां बताई तो वे आशचर्यचकित हुए क्योंकि वे अब तक इससे अनजान थे। इस्लाम कबूल करने के ऐलान के साथ ही मेरे सामने नई तरह की परेशानियां आनी शाुरू हो गई। मिशानरी में मेरे साथ काम करने वाले मेरे पूर्व सात साथियों ने मुझ पर इस्लाम कबूल न करने का दबाव बनाया। मैं अपने इरादे पर अंिडग था। उन्होने मुझे मेरी पत्नी से अलग करने की धमकी दी। मैंने साफ कह दिया- वह अपना फैसला लेने के लिए आजाद है। मुझे मारने की धमकी दी गई।जब उनकी बातों का मुझ पर असर नहीं हुआ तो उन्होने मेरे पास मेरे एक पुराने खास दोस्त और मेरे साथ काम कर चुके सहकर्मी को भेजा। वह मेरे पास आकर रोने लगा। मैंने उसके सामने कुरआन की यह आयत पढ़ी- जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें छलकने लगती हंै । इसका कारण यह है कि उन्होने सत्य को पहचान लिया है । वे कहते हैं -हमारे रब हम ईमान लाए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले। और हम अल्लाह पर और जो सत्य हमारे पास पहुंचा है उस पर ईमान क्यों नहीं लाएं,जबकि हमें उम्मीद है कि हमारा रब हमें अच्छे लोगों के साथ जन्नत में दाखिल करेगा। कुरआन ५:८३-८४ मैंने उससे कहा- कुरआन सुनने के बाद तुम्हे विनम्र होकर ई’वर के सामने झुक जाना चाहिए और सच्चे धर्म को तुम्हे भी अपना लेना चाहिए। अपनी बातों का असर न होता देख वह मुझे अकेला छोड़ चला गया। और फिर मैंने जनवरी १९६० में आधिकारिक रूप से इस्लाम कबूल करने का ऐलान कर कर दिया।
  इस्लाम कबूल करने के ऐलान के करते ही मेरी पत्नी मुझे छोड़ गई और अपने साथ घर का सारा फर्नीचर ले गई। मेरे तीन बेटे और एक बेटी मेरे साथ रहे और उन्होने भी इस्लाम कबूल कर लिया। इस्लाम कबूल करने में सबसे ज्यादा उत्साहित मेरा बड़ा बेटा इसाक था जिसने अपना इस्लामिक नाम ओसामा रख लिया। ओसामा ने फिलोसोफी में डॉक्टरेट की और वह पेरिस की यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गया। घर छोड़ने के छह साल बाद मेरी पत्नी वापस लौट आई इस शार्त पर कि वह अपना धर्म नहीं छोड़ेगी। मैंने उसे अपना लिया क्योंकि इस्लाम में इसकी इजाजत थी। मैंने उससे कहा कि मैं तुम्हे दबाव डालकर मुस्लिम नहीं बनाना चाहता, बल्कि चाहता हूं कि इस्लाम को समझने के बाद तुम ही इस मामले मेंं फैसला लो। कुछ वक्त बाद वह भी इस्लाम के मूल्यों में भरोसा करने लगी लेकिन अपने घर वालों के डर से इस्लाम अपनाने का ऐलान नहीं कर पाई। लेकिन हमारा व्यवहार उसके साथ मुस्लिम औरत की तरह है। वह रमजान के महीने के रोजे रखती है। मेरे सभी बच्चे भी रोजे रखते हैं और नमाज पढते हैं। मेरी बेटी नाजवा कWामर्स की स्टूडेंट है,बेटा जोसेफ डॉक्टर और जमाल इंजिनियर है। १९६१ से अब तक मैं इस्लाम पर और ईसाई मिशानरियों की इस्लाम के खिलाफ मुहिम पर कई किताबें लिख चुका हूं। १९७३ में मैंने हज किया। मैं इस्लाम पर तकरीर करता हूं। मैंने कई यूनिवर्सिटी और समाजसेवी संस्थाओं में सेमिनार का आयोजन किया। मैं अपना पूरा वक्त इस्लाम के लिए खर्च कर रहा हूं। कुरआन और पैगम्बर मुहम्मद सल्ललाहो अलेहेवस्सलम की जीवनी का अध्ययन करने पर इस्लाम के प्रति मेरा यकीन पुख्ता बनता गया। इस्लाम से जुड़ी सारी गलतफहमियां दूर हो गईंं। इस्लाम में एक ईश्वर की अवधारणा से मैं बेहद प्रभावित हुआ और मुझे इस्लाम की यह सबसे बड़ी खूबी लगी। अल्लाह एक है। उसका कोई साझी नहीं है। इस्लाम की इस अवधारणा से मैं उस एक ईश्वर का बन्दा बन गया जिसका कोई हमसर नहीं। एक ईश्वर में भरोसा व्यक्ति को खुद्दार बनाता है और समस्त मानव जाति को हर तरह की दासता से मुक्ति देता है और यही सही मायनों में आजादी है। मैं इस्लाम में माफी देने के नियम और ई’वर और बन्दे के बीच सीधे संबंध से बेहद प्रभावित हुआ।
अल्लाह कहता है -
कह दो - ऐ मेरे बन्दो जिन्होने अपने आप पर ज्यादती की है अल्लाह की दयालुता से निराशा न हो। निसंदेह अल्लाह सारे ही गुनाहों को माफ कर देता है। निशचय ही वह बड़ा क्षमाशील,अत्यन्त दयावान है। ३९: ५३

रविवार, 9 जनवरी 2011

अब मैं मुस्लिम के रूप में ही जीना चाहती हूं

वे कट्टर ईसाई थीं। लेकिन जब इस्लाम का अध्ययन किया और इस्लाम के रूप में सच्चाई सामने आई तो इसे अपना लिया।
  पूर्व पादरी, मिशनरी, प्रोफेसर और धर्मशास्त्र में मास्टर डिग्री धारक खदीजा स्यू वेस्टन की जुबानी कि आखिर वे किस तरह इस्लाम की आगोश में आईं।

   यह तुम्हें क्या हो गया है? यह पहली प्रतिक्रिया होती थी जब इस्लाम अपनाने के बाद पहली बार मेरे क्लास के साथी, दोस्त और साथी पादरी मुझसे मिलते थे।
 मुझे लगता मैं उनको दोष नहीं दे सकती थी। धर्म बदलने की वजह से मैं उनके लिए सबसे ज्यादा नापसंदीदा बन गई थी। पहले मैं प्रोफेसर, पादरी, चर्च प्लांटर और मिशनरी थी। धर्म के मामले में मैं बेहद कट्टर थी।
   बात तब की है जब मैंने पादरियों की एक विशेष शिक्षण संस्था से ग्रेजुएशन के बाद धर्मशास्त्र में मास्टर डिग्री ली ही थी। इसके छह महीने बाद ही मेरी मुलाकात एक महिला से हुई जो सऊदी अरब में काम करती थी और वह इस्लाम अपना चुकी थी। मैंने उस महिला से जाना कि इस्लाम में महिलाओं को किस तरह की हैसियत और अधिकार दिए गए हैं? उसका जवाब जानकर मुझो बेहद हैरत हुई। दरअसल मैं नहीं जानती थी कि इस्लाम में महिलाओं को इतना ऊंचा मुकाम दिया गया है। मैंने उससे अगला सवाल अल्लाह और मुहम्मद सल्ल. से संबंधित पूछा। उसने मुझो बताया कि वह मुझे इस्लामिक सेन्टर ले जाएगी ताकि वे मेरे सवाल का बेहतर जवाब दे सकें।

प्रार्थना के दौरान हम जीसस से बुरी ताकतों और शैतान से हिफाजत करने की प्रार्थना करते थे। हमें यही बताया गया था कि इस्लाम शैतान का धर्म है। मुसलमानों को लेकर मेरा ऐसा ही नजरिया था। लेकिन इस्लामी केंद्र में उनसे मिलकर  मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। उनका अंदाज और व्यवहार सीधा व सरल था। कोई बनावटीपन नहीं। ना किसी तरह का भय और परेशानी का दिखावा, ना कोई मनोवैज्ञानिक चालाकी और ना ही किसी तरह का अचेतन प्रभाव डालने की कोशिश। उन लोगों में ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला बल्कि उन्होंने कहा- आप घर पर बाइबल के अध्ययन के साथ-साथ कुरआन का अध्ययन भी करें। मुझे तो इनके इस तरह के व्यवहार पर बेहद आश्चर्य हुआ। उन्होंने मुझे कुछ किताबें दी और कहा कि अगर इनको पढऩे के बाद उनके दिमाग में किसी तरह के सवाल उठते हैं तो उनसे जवाब जाना जा सकता है। मैंने पहली बार इस्लाम पर किसी मुस्लिम की लिखी किताब पढ़ी थी। इससे पहले मैंने इस्लाम पर ईसाइयों द्वारा लिखित किताबें ही पढ़ी थी। अगले दिन मैं फिर से इस्लामी केंद्र गई और वहां मैंने कई सवाल पूछते हुए करीब तीन घण्टे गुजारे। और फिर मैं हफ्ते में एक बार इस्लामी केंद्र जाने लगी। इस तरह मैंने इस्लाम से जुड़ी तकरीबन बारह किताबें पढ़ डाली। यह पढऩे पर  मुझे समझ में आया कि मुसलमानों को ईसाईयत की तरफ लाने के मामले में ही सबसे ज्यादा मेहनत क्यों करनी पड़ती है। आखिर मुसलमान धर्म बदलने के मामले में इतने कठोर क्यों हैं? क्या आप जानना चाहते हैं वे ऐसे क्यों हैं? क्योंकि उनको ऑफर करने के लिए कुछ होता ही नहीं? क्योंकि मुसलमान सीधे अल्लाह से जुड़ाव रखते हैं, जो गुनाहों को माफ करने वाला है। जिसका वादा है परलोक का अनंत सुख और कामयाबी देने का।

   इस्लाम को समझने के दौरान स्वाभाविक रूप से मेरा पहला सवाल यही था कि अल्लाह का अस्तित्व किस रूप में है जिसकी मुसलमान इबादत करते हैं? दरअसल ईसाई के रूप में हमें पढ़ाया जाता है कि यह एक अलग गॉड है, जो झूठा है। जबकि सच्चाई यह है कि मुसलमान जिस ईश्वर की इबादत करते हैं वह सर्वज्ञ-सब कुछ जानने वाला, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी-सब जगह उपस्थित है। यह सिर्फ एक है और उसकी शक्तियों में उसका कोई साझी नहीं है। और ना ही कोई उसके बराबर है।
  यह बड़ी दिलचस्प बात है कि चर्च के शुरूआती तीन सौ सालों में बिशप ईसा मसीह के बारे में ऐसा ही बताते थे जैसा कि आज मुस्लिम यकीन रखते हैं कि ईसा अलै. ईश्वर के पैगंबर और उपदेशक थे। सम्राट कॉन्स्टेन्टीन नेे ट्रिनिटी (ईश्वर को तीन रूपों में मानने की ईसाइयों की अवधारणा) ईजाद की। उसे ईसाई धर्म की कोई जानकारी नहीं थी। उसी ने ईसाईयत को मूर्तिपूजक अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया। वक्त की कमी के कारण मैं इस विषय की गहराई में नहीं जा पाई हूं, लेकिन
 इंशा अल्लाह मैं यह साबित करूंगी कि ट्रिनिटी बाइबल के कई अनुवादों में नहीं है और ना ही मूल ग्रीक और हिब्रू भाषा की बाइबल में यह अवधारणा पाई जाती है।

  मेरी दूसरी जिज्ञासा मुहम्मद सल्ल. को लेकर थी। मुहम्मद सल्ल.कौन हैं? मैने जाना कि मुसलमान मुहम्मद सल्ल. की इबादत नहीं करते जिस तरह कि ईसाई ईसा मसीह की करते हैं। वे ईश्वर और बंदों के बीच मध्यस्थ नहीं है बल्कि मुसलमानों को मुहम्मद सल्ल. से प्रार्थना करने के लिए मना किया गया है। मुसलमान तो अपनी इबादत में मुहम्मद सल्ल. पर रहम और करम करने की अल्लाह से दुआ करते हैं, उसी तरह जिस तरह मुसलमान इब्राहीम अलै. के लिए अल्लाह से दुआ करते हैं। मुहम्मद सल्ल. तो अल्लाह के आखरी पैगबंर और संदेशवाहक हैं। वे अंतिम पैगंबर है। यही वजह है कि पिछले चौदह सौ अट्ठारह सालों में कोई पैगबंर नहीं आया। इनका मैसेज पूरी इंसानियत के लिए है जबकि मूसा और ईसा अल्ल. सिर्फ यहूदियों की तरफ भेजे गए पैगबंर थे। लेकिन इन सबका एक ही मैसेज था-
 तुम्हारा रब सिर्फ एक ही है और सिवाय उसके कोई कोई ईश्वर नहीं है।   (मार्क 12: 29)

   क्योंकि एक ईसाई के रूप में मेरी जिंदगी में प्रार्थना की काफी अहमियत थी, इसलिए मेरी दिलचस्पी और उत्सुकता इस बात में थी कि मुसलमानों का प्रार्थना का तरीका क्या है। दरअसल एक ईसाई के रूप में हम मुसलमानों के अन्य पहलुओं की तरह उनके इस पहलू को भी नजरअंदाज ही करते थे। हम सोचते थे जैसा कि हमें सिखाया भी गया था कि मुसलमान मक्का स्थित काबा की इबादत करते हैं, उसी के सामने झुकते हैं और यही उनके झूठे ईश्वर का केंद्र बिंदु है। लेकिन मुझे सच्चाई जानकर हैरत हुई कि मुसलमान तो उस तरीके से इबादत करते हैं जो तरीका खुद ईश्वर की तरफ से बताया गया है। उनकी प्रार्थना के शब्दों में उसी एक ईश्वर की महिमा और उसी का गुणगान है। इबादत करने के लिए किस तरह की पवित्रता होना जरूरी है, यह भी उसी ईश्वर ने गाइड किया है। वह ईश्वर बहुत पवित्र है और यह उचित नहीं है कि लोग अपने-अपने हिसाब से मनमाने तरीके से उसकी इबादत करे बल्कि ज्यादा उचित यह है कि ईश्वर हमें गाइड करे कि उसकी प्रार्थना किस तरह की जानी चाहिए।

    आठ साल तक धार्मिक अध्ययन के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंच गई थी कि इस्लाम सच्चा धर्म है। लेकिन मैंने अभी तक इस्लाम कबूल नहीं किया था क्योंकि अभी तक इस्लाम दिल की गहराइयों में नहीं उतरा था। मैं लगातार प्रार्थना करती, बाइबल का अध्ययन करती और इस्लामी केंद्र में भी लेक्चर में शामिल होती। मैं पूरी गंभीरता से ईश्वर की हिदायत को तलाश रही थी। मैं जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करना चाहती थी। और यह भी सच है कि अपना धर्म बदल लेना कोई आसान काम भी नहीं है।
 मुझे लगातार बेहद हैरत होती रही कि इस्लाम के बारे में हमें क्या बताया जाता है जबकि इस्लाम सही मायने में कितना अच्छा मजहब है। मेरे मास्टर लेवल कोर्स के दौरान एक प्रोफेसर जो इस्लाम विषय के ऑथोरिटी माने जाते थे, मैं उनका सम्मान करती थी, लेकिन वे और उन जैसे कई ईसाई इस्लाम को लेकर गलतफहमियों के शिकार रहते हैं।

   एक बार फिर ईश्वर से हिदायत की दुआ के दो माह बाद एक दिन मुझे महसूस हुआ मानों मेरे अंदर कोई एक खास बूंद टपकी हो। मैं उठ खड़ी हुई और यह पहला मौका था जब मैंने अल्लाह शब्द बोला। मैंने दुआ की-ऐ अल्लाह मेरा यकीन है कि तू सिर्फ एक है और तू ही सच्चा गॉड है। उस दिन मैंने एक खास सुकून का एहसास किया और उस दिन इस्लाम अपनाने के बाद पिछले चार सालों में मैंने इस्लाम अपनाने के अपने फैसले पर कभी खेद महसूस नहीं किया। इस्लाम अपनाने के बाद मुझे कई तरह के इम्तिहानों से गुजरना पड़ा। मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। उस वक्त मैं दो बाइबल कॉलेजों में पढ़ाती थी। मेरे पूर्व के क्लास के साथियों, प्रोफेसरों और मेरे साथी पादरियों ने मेरा बहिष्कार कर दिया। मेरे शौहर ने मुझे छोड़ दिया और मेरे अपने ही युवा बच्चे मुझे शक की नजरों से देखने लगे। गवर्नमेंट ने मुझ पर संदेह किया। बिना मजबूत ईमान के किसी की वश की बात नहीं कि वह इस तरह की शैतानी ताकतों का मुकाबला कर सके। अल्लाह ही ने मुझे यह सब सहन करने की ताकत दी वरना मेरे बूते की बात ना थी। अल्लाह का मुझ पर बहुत बड़ा एहसान है कि उसने मुझे मुस्लिम बनाया। अब मुस्लिम के रूप में ही जीना चाहती हूं और मुस्लिम के रूप में मरना।
    कहो-मेरी नमाज और मेरी कुर्बानी और मेरा जीना और मेरा मरना सब अल्लाह के लिए है, जो सारे संसार का रब है। उसका कोई साझी नहीं है। (कुरआन-6: 162-163)
 मुझे तो इसी का आदेश मिला है और सबसे पहला मुस्लिम (आज्ञाकारी) मैं हूं।

(सिस्टर खदीजा वेस्टन अभी जेद्दा स्थित एक दावत सेंटर में महिलाओं को पढ़ाने का काम कर रही हैं।)

शुक्रवार, 24 दिसम्बर 2010

टोनी ब्लेयर की साली मुसलमान बनी

ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की साली ने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल कर लिया है. चेरी ब्लेयर की बहन लौरेन बूथ ने पिछले दिनों  इस्लाम कबूल करने की घोषणा की. बूथ पेशे से पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.

  मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 43 साल की बूथ ने इस्लाम कबूल करने की बात लंदन में पिछले दिनों  सामाजिक संगठन ग्लोबल पीस एंड यूनिटी 2010 के बैनर तले हुए एक कार्यक्रम में उजागर की. कई इस्लामिक  नेताओं की मौजूदगी में बूथ ने बताया कि उन्होंने यह फैसला उन लोगों की धारणा बदलने के लिए किया है जो इस्लाम को आतंकवाद फैलाने वाला मानते हैं.

http://www.dw-world.de/dw/article/0,,6147468,00.html

  बूथ का कहना है कि अब वह उन सभी गतिविधियों से दूर रहेंगी जिसकी इजाजत इस्लाम नहीं देता। वर्ष 2007 में प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद ब्लेयर रोमन कैथोलिक बन गए थे। अब बूथ ने अपनी आस्था बदली है। ईरान का दौरा करने के बाद बूथ का इस्लाम की ओर से झुकाव हुआ।
        स्थानीय समाचार पत्र "डेली मेल" के अनुसार  बूथ दो बच्चों की मां हैं। अब वह घर से बाहर निकलते समय हिजाब पहनती हैं। इसके साथ ही उन्होंने अब शराब पीना छो़ड दिया है और नियमित नमाज पढ़ने के साथ पवित्र कुरआन पढ़ती हैं। कभी ब्रिटेन में टेलीविजन कलाकार रही बूथ ने कहा, ""छह सप्ताह पहले मैं ईरान गई थी। इस दौरान मैंने ईरान के पवित्र शहर कोम में एक दरगाह का दौरा किया। वहां मैंने अपने को अध्यात्म के नजदीक पाया।""
  बूथ ने कहा, ""मैं हमेशा से यही मानती रही हूं कि मुस्लिम समुदाय बहुत प्रेम करने वाला और अमनपसंद हैं। अब मैं इस समुदाय का हिस्सा बनकर बहुत खुश हूं।""

http://www.khaskhabar.com/blair-sister-in-law-converts-to-islam-1020102516635712217.html

रविवार, 5 सितम्बर 2010

सोच-समझकर इस्लाम चुना


आमिना थॉमस


(भूतपूर्व ‘अन्नम्मा थॉमस’)

ईसाई पादरी की बेटी

केरल, भारत

क़ुरआन और बाइबल के तुलनात्मक अध्ययन और सच्चे दिल से अल्लाह के सामने दुआ ने इस्लाम की ओर झुके हुए मेरे दिल को ताक़त दी और मैं अन्दर ही अन्दर मुसलमान हो गई।
 
मैं दक्षिणी भारत के एक प्रोटेस्टेंट ईसाई घराने में पैदा हुई और पली-बढ़ी। लेकिन अब मैं बहुत ख़ुश हूं कि मैं एक मुस्लिम औरत हूं। केवल संयोगवश मुसलमान नहीं बनी, बल्कि ख़ूब सोच-समझकर मैंने इस्लाम का चयन किया है। संसार के पालनहार, जिसने सही रास्ते अर्थात् इस्लाम की ओर मेरा मार्गदर्शन किया, उसका मैं जितना भी शुक्र अदा करूं, कम है। मेरा इस्लाम क़बूल करना विभिन्न धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन का परिणाम है। तुलनात्मक अध्ययन ने मेरे मन-मस्तिष्क को क़ायल किया कि इस्लाम ही एक सच्चा धर्म है और अल्लाह का अन्तिम धर्म है। इस्लाम के संबंध में मेरा अध्ययन जारी था कि बेहतर भविष्य के लिए मैं सऊदी अरब गई। यहां मैंने मुसलमानों और उनकी जीवनशैली का बहुत क़रीब से निरीक्षण किया।


  सऊदी अरब में मुझे धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन का सुनहरा मौक़ा मिला। लिट्रेचर, ऑडियो, वीडियो कैसिटों के अलावा चलते-फिरते ज़िन्दा प्रमाणों ने मेरी बड़ी सहायता की। ये जीवंत प्रमाण वे मनुष्य थे, जिन्होंने सच्चाई और सत्य धर्म का रास्ता पाने के लिए बड़ी खोज और मेहनत की थी। जब उन्हें सीधी राह मिल गई तो उन्होंने ईसाइयत को अलविदा कहकर इस्लाम क़बूल कर लिया। उन लोगों की खोज और अनुभव मेरे लिए बड़े लाभदायक और मार्गदीप सिद्ध हुए।

अमेरिकी नवमुस्लिम श्रीमती ख़दीजा वॉटसन के साथ, जो किसी अमेरिकी यूनीवर्सिटी में धर्मशास्त्र (Theology) की प्रोफ़ेसर रह चुकी हैं, साक्षात् वार्तालाप आध्यात्मिक शान्ति की तलाश में मेरे लिए बड़ी लाभप्रद रही। इसी बीच मैंने उच्च शिक्षा प्राप्त नवमुस्लिमों की जीवनियों का अध्ययन किया। इनमें प्रोफ़ेसर अब्दुल अहद दाऊद (पूर्व नाम रेवरेंड डेविड बेंजमीन कलदानी), एक बिशप और रोमन कैथोलिक पादरी, ‘मुहम्मद इन दी बाइबल’ का लेखक क़िसीस (पादरी) चार्ल्स विलियम पिकथॉल के बेटे ‘मुहम्मद मारमाड्युक पिकथॉल की कथाएं’ बड़ी महत्वपूर्ण थीं।

मैं यह तो समझ गई थी कि एक ही ख़ुदा हर चीज़ का रचयिता है, लेकिन मुझे यह यक़ीन नहीं था कि सच्चा एक ख़ुदा ईसाइयत में है या इस्लाम में। यह हक़ीक़त है कि दोनों धर्म एक-दूसरे के बहुत क़रीब हैं, मगर इबादत का ढंग बिल्कुल अलग है। अब फिर मैं क्या करूं? यह सवाल मुझे लगातार परेशान कर रहा था। मैंने अपनी यह परेशानी अल्लाह के सामने पेश करने का फै़सला किया। ऐ मेरे अल्लाह! सही धर्म को चुनने में मेरा मार्गदर्शन कर। मैं केवल सच्चाई की तलाश में हूं, इसलिए मुझे गुमराह होने से बचा ले। अगर ईसाई धर्म सच्चा है तो फिर मुझे इस पर जमा दे और इसके बारे में मेरे मन में जो शंकाएं और भ्रम हैं, उन्हें दूर कर दे। अगर इस्लाम सच्चा है तो फिर इसकी सच्चाई की पुष्टि कर और मेरे दिल में इसको जमा दे। मेरी मदद कर और मेरे अन्दर इतनी हिम्मत पैदा कर दे कि मैं अपने भावी धर्म के रूप में उसको क़बूल कर लूं।’’

क़ुरआन और बाइबल के तुलनात्मक अध्ययन और सच्चे दिल से अल्लाह के सामने दुआ ने इस्लाम की ओर झुके हुए मेरे दिल को ताक़त दी और मैं अन्दर ही अन्दर मुसलमान हो गई। मैंने मुसलमानों की तरह नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी। पूरी नमाज़ के दौरान में मैंने महसूस किया कि इस्लाम की सबसे ज़्यादा आकर्षक चीज़ नमाज़ ही है।

रविवार, 29 अगस्त 2010

तीन हजार अमेरिकी सैनिकों ने अपनाया इस्लाम

नमाज़ अदा करते अमेरिकी मुस्लिम सैनिक
डॉ. अबू अमीना बिलाल फीलिप्स।


क्या आपने भी सुना था कि खाड़ी युद्ध के दौरान तीन हजार अमेरिकी सैनिकों ने इस्लाम अपना लिया था। यह सच है। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस बदलाव के पीछे कौन हैं? जिन लोगों ने इस्लाम की यह दावत इन अमेरिकी सैनिकों तक पहुंचाई उनमें से एक अहम शख्सियत हैं डॉ. अबू अमीना बिलाल फीलिप्स। अबू अमीना फीलिप्स जमैका में जन्मे और पढ़ाई कनाड़ा में की । फिलहाल वे दुबई अमेरिकन यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं। अबू अमीना पहले ईसाई थे लेकिन 1972 में इस्लाम अपनाकर वे मुस्लिम बन गए।

बिलाल बताते हैं-'पहले खाड़ी युद्ध के दौरान मैंने नौसेना के धार्मिक विभाग में सऊदी रेगिस्तान में काम किया। अमेरिकी सैनिक इस्लाम के बारे में बहुत सी गलतफहमियां रखते थे। अमेरिका में उन्हें आदेश दिए गए थे कि वे मस्जिदों के करीब ना जाएं। हम उन्हें मस्जिदों में ले गए। मस्जिदों के अंदर की सादगी और माहौल को देखकर वे बेहद प्रभावित हुए। दरअसल जब उन्होंने पहली बार सऊदिया की जमीन पर कदम रखा था तो उन्हें यह एक अजीब जगह लगी थी जहां महिलाएं काला हिजाब पहने नजर आती थीं। लेकिन सऊदी अरब में रहने पर उन सैनिकों को एक खास अनुभव हुआ और ये उनके लिए आंखें खोल देने वाला अनेपक्षित अनुभव था। अमेरिकी सैनिक वहां के लोगों की मेहमाननवाजी देखकर आश्चर्यचकित रह गए। लोग उनके लिए ताजा खजूर और दूध लाते थे और उनका बेहद सम्मान किया जाता था। अमेरिकी सैनिकों ने ऐसी मेहमाननवाजी और आत्मीय व्यवहार कोरिया और जापान में नहीं देखा था जहां उनका बरसों तक पड़ाव रहा था।'

बिलाल बताते हैं-मैं वापस अमेरिका लौट आया और मैंने अमेरिकी डिफेंस डिपार्टमेंट में इस्लामिक चैप्टर्स की स्थापना की। मेरे सऊदी में रहने के दौरान तकरीबन तीन हजार अमेरिकी सैनिकों ने इस्लाम अपनाया। शायद आप मेरी इस बात पर भरोसा ना करें कि दुनिया में सिर्फ सऊदी अरब ही ऐसा देश है जहां अमेरिकी सैनिक अपने पीछे वार बेबीज(युद्ध के कारण अनाथ हुए बालक) नहीं छोड़ के आए। ये अमेरिकी सैनिक अपने तंबुओं में इस्लामिक सिद्धांतों और व्यवहार पर खुलकर चर्चा करते थे। ये मुस्लिम सैनिक अमेरिकी सेना में इस्लाम के दूत हैं। सऊदी अरब ने पश्चिमी देशों पर इस्लामी की अच्छी छाप छोड़ी है। मैंने देखा कि सऊदी अरब अपने नागरिकों की देखभाल अमेरिकी नागरिकों से बेहद अच्छे ढ़ंग से करता है। जहां बीस लाख अमेरिकी नागरिक आज भी गलियों और फुटपाथ पर सोते हैं, वहीं सऊदी अरब का एक भी नागरिक फुटपाथ पर नहीं सोता।

यू आए इस्लाम की आगोश में
अबू अमीना पहले ईसाई थे। उनका जन्म 1947 में जमैका में हुआ। वे अच्छे पढ़े लिखे परिवार से हैं। इनके माता-पिता दोनों टीचर थे। उनके दादा जी के भाइयों में से एक चर्च के मिनिस्टर और बाइबिल के विद्वान थे। इनका परिवार खुले विचारों वाला था। वे हर सण्डे अपनी मां के साथ चर्च जाते थे। जब वे ग्यारह साल के थे तो इनका परिवार कनाड़ा पलायन कर गया। पहले इनका नाम इनाके था। जब वे बायो केमेस्ट्री से ग्रेजुएशन कर रहे थे,उसी दौरान वे साम्यवादी विचारधारा के लोगों के सम्पर्क में आए। साम्यवाद का आकषर्ण उन्हें चीन भी ले गया। चीन से लौटकर वे कनाड़ा की साम्यवादी पार्टी में शामिल हो गए। साम्यवादी पार्टी में रहकर उन्होंने इसमें कई तरह की कमियां और दोष देखे। उन्हें उस पार्टी के नेताओं में अनुशासन की कमी नजर आती थी। उसका जवाब उन्हें यह मिलता था कि क्रांति के बाद सब ठीक हो जाएगा। पार्टी के फंड में से गबन का मामला भी उनके सामने आया। वे शहरी गुरिल्ला लड़ाई सीखने के लिए चीन जाना चाहते थे। लेकिन जो आदमी इनक ा इसके लिए चयन करने आया था वह नशेड़ी था। इन सब बातों ने अबू अमीना का साम्यवाद के प्रति मोह कम कर दिया।
  अमीना बिलाल कैलीफोर्निया भी गए और वहां वे काले लोगों को इंसाफ दिलाने के मकसद से ब्लैक पेंथर्स गुट में शामिल हो गए। लेकिन उन्होंने वहां देखा कि उनमें से ज्यादातर लोग ड्रग्स लेते थे। सुरक्षा कमेटियों के नाम पर वे चंदा इकट करते थे और फिर उन पैसों को ड्रग्स और पार्टियों पर खर्च कर देते थे। अबू अमीना ने अमेरिका में मैल्कल एक्स, अलीजा मुहम्मद और उनके बेटे वरीथ दीन मुहम्मद क ो इस्लाम की ओर बढ़ते देखा। उन्होंने मुस्लिम बने मैल्कल एक्स की जीवनी पढ़ी। उन्होंने एलीजा मुहम्मद का कुछ साहित्य पढ़ा,पर उसका उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि एलीजा मुहम्मद के साहित्य में गोरे लोगों से जातीय घृणा जबरदस्त थी और एलीजा मुहम्मद का नेशन ऑफ इस्लाम भी इस्लाम की विचारधारा के अनुरूप नहीं था। उनका कहना है-मैं सब गोरे लोगों को शैतान के रूप में नहीं देखना चाहता था। अमीना फिलिप्स को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली किताब सैयद कुतुब की 'इस्लाम: द मिस अंडरस्टूड रिलीजन' थी। इस पुस्तक में इस्लाम समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद, अर्थव्यवस्था और आध्यात्मिक पहलुओं को अच्छे अंदाज में पेश किया गया था। उन्हें यकीन हो गया था कि इस्लाम पश्चिमी समाज के आर्थिक और सामाजिक जीवन में बेहतर भूमिका अदा कर सकता है। मौलाना अबुल आला मौदूदी की किताब 'टुवार्ड्स अंडरस्टेडिंग इस्लाम' ने उन्हें इस्लाम के बारे में विस्तृत नजरिया दिया। बिलाल ने इटली जैसे साम्राज्यवादी देशों से मोरक्को,लीबिया जैसे अफीक्री देशों द्वारा इस्लामिक नजरिए के साथ युद्ध जीतने का भी अध्ययन किया। वे कहते हैं- 'मुझो जानने को मिला कि इस्लाम थप्पड़ के लिए दूसरा गाल पेश करने की तालीम नहीं देता यानी इसमें जुल्म बर्दाश्त करते रहने की तालीम नहीं है। इस तरह इस्लाम का अच्छी तरह अध्ययन के बाद मैं इस्लाम का हिमायती बन गया और फिर 1972 में सोच समझाकर मैंने इस्लाम धर्म अपना लिया।'
  बिलाल ने मिस्र के शख्स से अरबी और इस्लामी शरीअत सीखी। बिलाल ने विभिन्न स्रोतों से इस्लाम की जानकारी हासिल की। अबू अमीना ने इस्लामिक यूनिवर्सिटी मदीना से ग्रेजुएशन किया। बिलाल ने 1985 में रियाद यूनिवर्सिटी से इस्लाम धर्म में एमए और 1994 में इस्लाम पर ही पीएचडी की। बाद में वे इंग्लिश मीडियम के बच्चों को इस्लाम पढ़ाने लगे। उन्होंने बच्चों के लिए पांच इस्लामिक पाठ्यपुस्तकें भी लिखीं। बिलाल ने साल 2000 में ऑनलाइन इस्लामिक यूनिवर्सिटी भी गठित की। यह यूनिवर्सिटी इस्लाम में बीए और अन्य छोटे कोर्सेज कराती हैं। दुनियाभर के 160 देशों के करीब 20000 से ज्यादा स्टूडेंट इस यूनिवर्सिटी में पंजीकृत हैं।

भारत दौरा
अपनी पीएचडी के दौरान बिलाल भारत भी आए। उन्होंने उत्तर भारत के मुसलमानों की दयनीय दशा
देखी। उन्होंने देखा कि उत्तर भारतीय मुसलमान अंधविश्वास में लिप्त हैं। वे केरल भी गए। यहां उनको अच्छी उम्मीद दिखाई दी।

बिलाल का मानना है कि पश्चिमी देशों में इस्लाम के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। वे गरमी के मौसम में अमेरिका और कनाड़ा में इस्लाम और अरबी पढ़ाते हैं। उनका मानना है कि गैर मुस्लिम देशों के मुसलमानों को चाहिए कि वे इस्लामी समुदाय में इस्लामिक स्कूल चलाएं वरना इस्लाम को जिंदगी में लागू करने वालों की तादाद दस फीसदी से भी कम रह जाएगी। वे कहते हैं कि मुसलमान अपनी जिंदगी इस्लामिक उसूलों के मुताबिक गुजारें। अबू अमीना बिलाल की जिंदगी का मकसद है कि समाज में इंकलाब आ जाए लेकिन यह इंकलाब तभी आएगा जब हर शख्स अपने जीवन के आचरण को इस्लामिक मूल्यों के मुताबिक संवारेगा। और बिलाल ने अपनी कोशिश इसी के लिए लगा रखी है।
 अबू अमीना भारत के इस्लामिक चैनल पीसी टीवी से भी जुड़े हैं और यहां आप इनको इस्लाम पर बोलते हुए देख सकते हैं।

स्रोत:
सऊदी गजट्स बायोग्राफी
http://www.4newmuslim.org/

http://www.islamfortoday.com/

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

एक साथ तीन पादरी मुसलमान



अमेरिका के तीन ईसाई पादरी इस्लाम की शरण में आ गए। उन्हीं तीन पादरियों में से एक पूर्व ईसाई पादरी यूसुफ एस्टीज की जुबानी कि कैसे वे जुटे थे एक मिस्री मुसलमान को ईसाई बनाने में, मगर जब सत्य सामने आया तो खुद ने अपना लिया इस्लाम।

   बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि आखिर मैं एक ईसाई पादरी से मुसलमान कैसे बन गया? यह भी उस दौर में जब इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ हम नेगेटिव माहौल पाते हैं। मैं उन सभी का शुक्रिया अदा करता हूं जो मेरे इस्लाम अपनाने की दास्तां में दिलचस्पी ले रहे हैं। लीजिए आपके सामने पेश है मेरी इस्लाम अपनाने की दास्तां-

   मैं मध्यम पश्चिम के एक कट्टर इसाई घराने में पैदा हुआ था। सच्चाई यह है कि मेरे परिवार वालों और पूर्वजों ने अमेरिका में कई चर्च और स्कूल कायम किए। 1949 में जब मैं प्राइमेरी स्कूल में था तभी हमारा परिवार टेक्सास के हाउस्टन शहर में बस गया। हम नियमित चर्च जाते थे। बारह साल की उम्र में मुझे ईसाई धार्मिक विधि बेपटिस्ट कराई गई। किशोर अवस्था में मैं अन्य ईसाई समुदायों के चर्च,मान्यताओं,आस्था आदि के बारे में जानने को उत्सुक रहता था। मुझे गोस्पेल को जानने की तीव्र लालसा थी। धर्म के मामले में मेरी खोज और दिलचस्पी सिर्फ ईसाई धर्म तक ही सीमित नहीं थी हिंदू,यहूदी,बोद्ध धर्म ही नहीं बल्कि दर्शनशास्त्र और अमेरिकी मूल निवासियों की आस्था और विश्वास भी मेरे अध्ययन में शामिल रहे। सिर्फ इस्लाम ही ऐसा धर्म था जिसको मैंने गंभीरता से नहीं लिया था।
  इस दौरान मेरी दिलचस्पी संगीत में बढ़ गई। खासतौर से गोस्पल और क्लासिकल संगीत में। चूकि मेरा पूरा परिवार धर्म और संगीत के क्षेत्र से जुड़ा हुआ था इसलिए मैं भी इन दोनों के अध्ययन में जुट गया। और इस तरह मैं कई गिरिजाघरों से संगीत पादरी के रूप में जुड़ गया। मैंने 1960 में लोगों को की बोर्ड के जरिए संगीत की शिक्षा दी और फिर 1963 में लॉरेल,मेरीलेण्ड में अपना ‘एस्टीज म्यूजिक स्टूडियो’ खोल लिया। इसके बाद मैंने करीब तीस साल तक अपने पिता के साथ मिलकर कई बिजनेस प्रोजेक्ट तैयार किए। हमने बहुत सारे मनोरंजन प्रोग्राम बनाए और कई शो किए। हमने टेक्सास और ऑकलाहोम से फ्लोरिडा के बीच कई पियानो और ऑरगन स्टोर खोले। इन सालों में मैंने करोड़ों डॉलर कमाए। करोड़ों डॉलर कमाने के बावजूद दिल को सुकून नहीं था। सुकून तो सच्चाई की राह पाकर ही हासिल हो सकता था।

   मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि आपके मन में भी यह सवाल उठते होंगे-आखिर ईश्वर ने मुझे किस मकसद के लिए पैदा किया है? ईश्वर को मुझसे किस तरह की अपेक्षा है? आखिर ईश्वर कौन है? हम मूल पाप में यकीन क्यों रखते हैं? इंसान को अपने पाप स्वीकारने के लिए क्यों मजबूर किया जाता है और इसके परिणामस्वरूप उसे सदा के लिए सजा क्यों दी जाती है?
   अगर आप किसी से यह सवाल पूछते हैं तो आपसे कहा जाता है कि आपको ऐसे सवाल पूछे बिना अपने धर्म पर यकीन करना चाहिए या यह तो रहस्य है,ऐसे सवाल नहीं किए जाने चाहिए।

ठीक इसी तरह ट्रीनिटी(तसलीस) का सिद्धान्त भी है। अगर मैं किसी धर्मप्रचारक या किसी ईसाई पादरी से पूछता कि-‘एक’ अपने आप में तीन में कैसे बदल सकता है? ईश्वर तो कुछ भी करने की ताकत रखता है तो फिर लोगों के पाप कैसे माफ नहीं कर सकता? उसे जमीन पर एक इंसान के रूप में आकर सभी लोगों के पाप अपने ऊपर लेने की आखिर कहां जरूरत पड़ी? हमें याद रखना चाहिए की वह तो सारे ब्रह्माण्ड का पालक है,वह तो चाहे जैसा कर सकता है।
   1991 में एक दिन मुझे यह जानकारी मिली कि मुसलमान बाइबिल पर यकीन रखते हैं। मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। आखिर ऐसे कैसे हो सकता है? इतना ही नहीं मुसलमान तो ईसा पर ईमान रखते हैं कि वे ईश्वर के सच्चे पैगम्बर थे और उनकी पैदाइश बिना पिता के अल्लाह के चमत्कार के रूप में हुई। ईसा अब ईश्वर के पास हैं, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अंतिम दिनों में फिर से इस जमीन पर आएंगे और एंटीक्राइस्ट(दज्जाल)के खिलाफ ईमान वालों का नेतृत्व करेंगे।

मुझे यह सब जानकर बड़ी हैरत हुई। दरअसल मैं जिन ईसाई पंथ वालों के साथ सफर किया करता था वे इस्लाम और मुसलमानों से सख्त नफरत किया करते थे। वे लोगों के बीच इस्लाम के बारे में झूठी बातें करके लोगों को भ्रमित करते थे। ऐसे में मुझे लगता था कि मुझे इस धर्म के लोगों से आखिर क्या लेना-देना।

मेरे पिता चर्च से जुड़े कामों में जुटे हुए थे, खासतौर पर चर्च के स्कूल प्रोगाम्स में। 1970 में मेरे पिता अधिकृत रूप से पादरी बन गए। मेरे पिता और उनकी पत्नी(मेरी सौतेली मां)बहुत से ईसाई धर्म प्रचारकों को जानते थे। वे अमेरिका में इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन पेट रॉबर्टसन के नजदीकियों में से थे।

1991 में मेरे पिता ने मिस्र के एक मुसलमान शख्स के साथ बिजनेस शुरू किया। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उस शख्स से मिलूं। मैं बड़ा खुश हुआ कि चलो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामकाज होगा। लेकिन जब मेरे पिता ने मुझे बताया कि वह शख्स मुसलमान है तो पहले तो मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। मैंने कहा-एक मुसलमान से मुलाकात करूं? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं नहीं मिलना चाहता किसी मुस्लिम से। हमने इनके बारे में बहुत सी बातें सुनी हैं। ये लोग आतंकवादी होते हैं, हवाई जहाज अगवा करते हैं, बम विस्फोट करते हैं,अपहरण करते हैं और ना जाने क्या-क्या करते हैं। वे ईश्वर में भरोसा नहीं करते। दिन में पांच बार जमीन को चूमते हैं और रेगिस्तान में किसी काले पत्थर की पूजा करते हैं।

मैंने इनसे कह दिया मैं किसी मुसलमान शख्स से नहीं मिल सकता। मेरे पिता ने मुझ से कहा कि वह बहुत अच्छा इंसान है और मुझ पर जोर डाला कि मैं उससे मिलूं। आखिर में मैं उस मुसलमान शख्स से मिलने को तैयार हो गया और शर्त रखी कि मैं सण्डे के दिन चर्च में प्रार्थना करने के बाद ही उससे मिलूंगा। मैंने हमेशा की तरह बाइबिल अपने साथ ली,चमकता क्रॉस गले में लटकाकर उससे मिलने पहुंचा। मेरी टोपी पर ठीक सामने लिखा था-जीसस ही रब है। मेरी पत्नी और दो छोटी बेटियां भी मेरे साथ थीं। अपने पिता के ऑफिस पहुंचकर मैंने उनसे पूछा-कहां है वह मुसलमान? पिता ने सामने बैठे शख्स की ओर इशारा किया। उसे देख मैं परेशानी में पड़ गया। मुसलमान तो ऐसा नहीं हो सकता। मैं तो सोचता था कि लंबे चौगे,दाढ़ी और सिर पर साफे के साथ लंबे कद और बड़ी आंखों वाले शख्स से मुलाकात होगी। इस शख्स के तो दाढ़ी भी नहीं थी। सच बात तो यह है कि उसके सिर पर भी बाल नहीं थे। उसने बड़ी गर्मजोशी और खुशी के साथ मेरा स्वागत किया और मेरे से हाथ मिलाया। मैं तो कुछ समझ नहीं पाया। मैं तो सोचता था कि ये लोग तो आतंकवादी और बम विस्फोट करने वाले होते हैं। मैं तो चक्कर में फंस गया।

मैंने सोचा चलो कोई बात नहीं,मैं इस शख्स पर अभी से काम शुरू कर देता हूं। शायद ईश्वर मेरे जरिए ही इसे नरक की आग से बचाना चाह रहा है। एक दूसरे से परिचय के बाद मैंने उससे पूछा- क्या आप ईश्वर में यकीन रखते हैं? उसने कहा-‘हां’। बहुत अच्छा, फिर मैंने पूछा-आप आदम और हव्वा में विश्वास रखते हैं? उसने कहा-‘हां’। मैंने आगे पूछा-और इब्राहीम के बारे में आपका क्या मानना है? क्या आप उनको मानते हैं? और यह भी कि उन्होंने अपने बेटे को कुरबान करने की कोशिश की? उसने फिर हां में जवाब दिया। इसके बाद मैंने उससे जाना-मूसा को भी मानते हो? उसने फिर हामी भरी। मेरा अगला सवाल था-अन्य पैगम्बरों-दाऊद, सुलेमान,जॉहन आदि को भी मानते हो? उसका जवाब फिर हां में था। मैंने जाना कि क्या तुम बाइबिल पर यकीन रखते हो? उसने हां कहा। अब मैं एक बड़े सवाल पर आया-क्या तुम ईसा को मानते हो? उसने कहा-हां।

   यह सब जानकर मुझे उस शख्स को ईसाई बनाने का काम आसान लग रहा था। मुझे लग रहा था,उसे तो अब सिर्फ बपतीशा की विधि की ही जरूरत है और यह काम मेरे जरिए होने वाला है। मैं इसे बड़ी उपलब्धि मान रहा था। एक मुसलमान हाथ में आना और इसे ईसाई धर्म स्वीकार करवाना बड़ा काम था। उसने मेरे साथ चाय पीने की हां भरी तो हम एक चाय की दुकान पर चाय पीने गए। हम वहां बैठकर अपने पसंद के विषय आस्था, विश्वास आदि पर बैठकर घंटों बातें करते रहे। ज्यादा बातें मैंने ही की। उससे बातचीत करने पर मुझे एहसास हुआ कि वह तो बहुत अच्छा आदमी है। वह कम ही बोलता था और शर्मीला भी था। उसने मेरी बात बड़ी तसल्ली से सुनी और बीच में एक बार भी नहीं बोला। मुझे उस शख्स का व्यवहार पसंद आया। मैंने मन ही मन सोचा-यह व्यक्ति तो बहुत अच्छा ईसाई बनने की काबिलियत रखता है। लेकिन भविष्य में क्या होने वाला है, इसकी मुझे थोड़ी सी भनक भी नहीं थी।

मैंने अपने पिता से सहमति जताई और उसके साथ बिजनेस करने के लिए राजी हो गया। मेरे पिता ने मुझे प्रोत्साहित किया और मेरे से कहा कि मैं उस मुस्लिम शख्स को अपने साथ बिजनेस ट्यूर पर उत्तरी टेक्सास ले जाऊं। लगातार कई दिनों तक हमने कार में सफर के दौरान अलग-अलग धर्म और आस्थाओं पर चर्चा की। मैंने उसे रेडियो पर आने वाले इबादत से जुड़े अपने पसंदीदा प्रोग्राम्स के बारे में बताया। मैंने बताया कि इन धार्मिक प्रोग्राम्स में सृष्टि की रचना का उद्देश्य,पैगम्बर और उनके मिशन और ईश्वर अपने मैसेज इंसानों तक कैसे पहुंचाता है, इसकी जानकारी दी जाती है। इन रेडियो प्रोग्राम्स के जरिए कमजोर और आम लोगों तक यह धार्मिक संदेश पहुंच जाते हैं। इस दौरान हम दोनों ने अपने धार्मिक विचार और अनुभवों को एक दूसरे के साथ बांटा।
   एक दिन मुझे पता चला कि मेरा यह मुस्लिम दोस्त मुहम्मद अपने मित्र के साथ जहां रह रहा था उस जगह को छोड़ चुका है और अब कुछ दिनों के लिए उसे मस्जिद में रहना पड़ेगा। मैं अपने पिता के पास गया और उनसे कहा कि क्यों न हम मुहम्मद को अपने बड़े घर में अपने साथ रख लें। वह अपने काम में भी हाथ बंटाएगा और अपने हिस्से का खर्चा भी अदा कर देगा। और जब कभी बिजनेस के सिलसिले में बाहर जाएंगे तो हमें हरदम तैयार मिलेगा। मेरे पिता को यह बात जम गई और फिर मुहम्मद हमारे साथ ही रहने लगा।

मैं टेक्सास में अपने साथी धर्मप्रचारकों से मिलने जाया करता था। उनमें से एक टेक्सास मैक्सिको सरहद तथा दूसरा ओकलहोमा सरहद पर रहता था। एक धर्मप्रचारक को तो बहुत बड़ा क्रॉस पसंद था जो उसकी कार से भी बड़ा था। वह उसे कंधे पर रखता और उसका सिरा जमीन पर घसीटते हुए चलता। जब वह उस क्रॉस को लेकर सड़क पर चलता तो कई लोग अपनी गाड़ी रोककर उससे पूछते-क्या चल रहा है? तो वह उन्हें ईसाई धर्म से जुड़ी किताबें और पम्फलेट देता। एक दिन मेरे इस क्रॉस वाले दोस्त को दिल का दौरा पड़ा और उसे हॉस्पिटल में लम्बे समय तक भर्ती रहना पड़ा। मैं हफ्ते में कई बार उस दोस्त से मिलने जाता। साथ में मैं अपने दोस्त मुहम्मद को भी ले जाता और इस बहाने हम अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताओं का आदान-प्रदान कर लेते। मेरे उस बीमार दोस्त पर इस्लाम का कोई असर नहीं पड़ा, इससे साफ जाहिर था कि इस्लाम के बारे में जानने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। एक दिन उसी अस्पताल में भर्ती एक मरीज व्हील चैयर पर मेरे दोस्त के कमरे में आया। मैं उसके नजदीक गया और मैंने उसका नाम पूछा। वह बोला-नाम कोई महत्वपूर्ण चीज नहीं है। मैंने उससे जाना कि वह कहां का रहने वाला है, तो वह चिड़कर बोला-मैं तो जूपीटर ग्रह से आया हूं। दरअसल वह अकेला था और अवसाद से पीडि़त था। इस वजह से मैं उसके सामने मालिक की गवाही देने की कोशिश करने लगा। मैंने उसे तौरात में से पैगम्बर यूनुस के बारे में पढ़कर सुनाया। मैंने बताया कि पैगम्बर यूनुस को ईश्वर ने लोगों को सीधी राह दिखाने के लिए भेजा था। यूनुस अपने लोगों को ईश्वर की सीधी राह दिखाने में विफल होकर उस बस्ती से निकल गए। इन लोगों से बचते हुए वे एक कश्ती में जाकर सवार हो गए। तूफान आया कश्ती भी टूटने लगी तो लोगों ने यूनुस को समंदर में फैंक दिया। एक व्हेल मछली पैगम्बर यूनुस को निगल गई। यूनुस मछली के पेट में समंदर में तीन दिन और तीन रात रहे। फिर जब यूनुस ने अपने गुनाह की माफी मांगी तो ईश्वर के आदेश से उस मछली ने उन्हें तट पर उगल दिया और वे अपने शहर निनेवा लौट आए। इस घटना में सबक यह था कि अपनी परेशानियों और बिगड़े हालात से भागना नहीं चाहिए। हम जानते हैं कि हमने क्या किया है और हमसे भी ज्यादा ईश्वर जानता है कि हमने क्या किया है।

इस वाकिए को सुनने के बाद व्हील चैयर पर बैठे उस शख्स ने ऊपर मेरी ओर देखा और मुझसे अपने किए व्यवहार की माफी मांगी। उसने कहा कि वह अपने रूखे व्यवहार से दुखी है और इन्हीं दिनों वह गम्भीर परेशानियों से गुजरा है। उसने कहा वह मेरे सामने अपने पाप कबूल करना चाहता है। मैंने उससे कहा मैं कैथोलिक पादरी नहीं हूं और मैं लोगों के पाप कबूल नहीं करवाता। वह बोला- ‘मैं यह बात जानता हूं। मैं खुद एक रोमन कैथोलिक पादरी हूं।’ यह सुनकर मैं भौंचक्का रह गया। क्या मैं एक पादरी को ही ईसाई धर्म के उपदेश दे रहा था? मैं सोच में पड़ गया आखिर इस दुनिया में यह क्या हो रहा है। उस पादरी ने अपनी कहानी सुनाई। उसने बताया कि मैक्सिको और न्यूयॉर्क में वह बारह साल तक ईसाई प्रचारक के रूप में काम कर चुका है और यहां उसका अनुभव पीड़ादायक रहा। अस्पताल से छुट्टी के बाद उस ईसाई पादरी को ऐसी जगह की जरूरत थी जहां वह तंदुरुस्ती हासिल कर सके। मैंने अपने पिता से कहा कि उसे अपने यहां रहने के लिए कहना चाहिए कि वह भी हमारे साथ रहे। हम इस पर सहमत हो गए और वह भी हमारे साथ रहने लगा। मेरी उस ईसाई पादरी से भी इस्लाम की धारणाओं और मान्यताओं पर बातचीत हुई तो उसने इस पर अपनी सहमति जताई। उसकी सहमति पर मुझे ताज्जुब हुआ। उस पादरी से मुझे यह जानकर भी हैरत हुई कि कैथोलिक पादरी इस्लाम का अध्ययन करते हैं और कुछ ने तो इस्लाम में डॉक्टरेट की उपाधि भी ले रखी है।
  हम हर शाम खाने के बाद टेबल पर बैठकर धर्म की चर्चा करते। चर्चा के दौरान मेरे पिता के पास किंग जेम्स की अधिकृत बाइबिल होती,मेरे पास बाइबिल का संशोधित स्टैडण्र्ड वर्जन होता, मेरी पत्नी के पास बाइबिल का तीसरा रूप और कैथोलिक पादरी के पास कैथोलिक बाइबिल, जिसमें प्रोटेस्टेंट बाइबिल से सात पुस्तकें ज्यादा है। हमारा वक्त इसमें गुजरता कि किसकी बाइबिल ज्यादा सत्य और सही है और फिर हम मुहम्मद को बाइबिल का संदेश देकर उसे ईसाई बनाने की कोशिश करते।

एक बार मैंने मुहम्मद से कुरआन के बारे में जाना कि पिछले चौदह सौ सालों में कुरआन के कितने रूप बन चुके हैं? उसने मुझे बताया कि कुरआन सिर्फ एक ही रूप में है और उसमें कभी कोई फेरबदल नहीं हुआ। उसने मुझे यह भी बताया कि कुरआन को दुनियाभर में लाखों लोग कंठस्थ याद करते हैं और कुरआन को जबानी याद रखने वाले लाखों लोग दुनियाभर में फैले हुए हैं। मुझे यह असंभव बात लगी। ऐसे कैसे हो सकता है? बाइबिल को देखो सैकड़ों सालों से इसकी मौलिक भाषा ही मर गई। सैंकड़ों साल के काल में इसकी मूल प्रति ही खो गई। फिर भला ऐसे कैसे हो सकता है कि कुरआन असली रूप में अभी भी मौजूद हो।

   एक बार हमारे घर रह रहे कैथोलिक पादरी ने मुहम्मद से कहा कि वह उसके साथ मस्जिद जाना चाहता है और देखना चाहता है कि मस्जिद कैसी होती है। एक दिन वे दोनों मस्जिद गए। वापस आए तो वे मस्जिद के अपने अनुभव बांट रहे थे। हम भी पादरी से पूछे बगैर नहीं रह सके कि मस्जिद कैसी थी और वहां क्या-क्या विधियां कराई गईं? पादरी ने जवाब दिया-ऐसा कुछ नहीं किया गया जैसा तुम समझ रहे हो। मुस्लिम आए,नमाज पढ़ी और चले गए। ‘चले गए,ऐसे ही चले गए? बिना कोई भाषण और गाने के ही चले गए?’ उसने कहा-हां,ऐसा ही था उनकी इबादत का तरीका।

  कुछ दिन और गुजरने के बाद एक दिन कैथोलिक पादरी ने मुहम्मद से कहा कि वह एक बार और उसके साथ मस्जिद जाना चाहता है। लेकिन इस बार तो कुछ अलग ही हुआ। वे काफी देर तक घर नहीं लौटे। अंधेरा हो गया तो हमें उनकी चिंता होने लगी। कहीं उनके साथ कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई है? वे दोनों आए, दरवाजे में मैंने मुहम्मद को तो पहचान लिया लेकिन साथ आने वाले को एकदम से नहीं पहचान पाया। वह सफेद लंबा चौगा और सिर पर सफेद टोपी लगाए था। अरे,यह तो पादरी है? मैंने उससे पूछा-‘पेटे, क्या तुम मुसलमान बन गए हो?’ उसने कहा-हां, आज मैंने इस्लाम अपना लिया है।


क्या एक पादरी मुसलमान बन गया?

   इसके बाद मैं ऊपर के कमरे में गया और इस मुद्दे पर अपनी पत्नी से बात की। मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि वह भी जल्दी ही इस्लाम अपनाने जा रही है, क्योंकि वह इस नतीजे पर पहुंची है कि इस्लाम सच्चा धर्म है। यह जानकर मुझे तगड़ा झटका लगा। मैंने नीचे आकर मुहम्मद को जगाया और उसे बाहर आकर मेरे साथ चर्चा करने को कहा। हम दोनों रात भर टहलते रहे और इस्लाम पर चर्चा करते रहे। फज्र की नमाज का वक्त हो गया था। अब तक मैं जान चुका था कि इस्लाम सत्य है और अब मुझे इस मामले में अपनी भूमिका निभानी है। मैं पीछे की तरफ अपने पिता के घर गया। वहां एक पलाई का टुकड़ा पड़ा था। मैंने उसी पलाई के टुकड़े पर अपना माथा रख दिया। मेरा मुंह उस दिशा में था जिस तरफ मुंह करके मुसलमान नमाज पढ़ते हैं। मेरा बदन पलाई पर फैला था और मेरा ललाट जमीन पर टिका था। मैंने उसी स्थिति में सच्चे ईश्वर से प्रार्थना की- ‘है ईश्वर अगर तुम यहां है तो मेरा मार्गदर्शन कर, मुझे सच्ची राह पर ले चल।’ थोड़ी देर बाद मैंने अपना सिर उठाया तो मैंने कुछ खास महसूस किया। नहीं,नहीं मैंने चिडिय़ा या फरिश्तों को आसमान से आते हुए नहीं देखा। ना मैंने किसी तरह की आवाज सुनी और ना कोई संगीत। ना ही मैंने कोई तेज रोशनी देखी या रोशनी की कोई झलक। जो कुछ मैंने महसूस किया वह था मेरे अंदर हुआ बदलाव। मैंने खुद के अंदर बदलाव महसूस किया। अब मैं ज्यादा जागरूक हो गया था कि अब समय आ गया है कि मैं झूठ बोलना, धोखा देना और झूठ पर आधारित बिजनेस बंद कर दूं। अब समय आ गया है कि मैं अपने आपको सीधा, नेक और ईमानदार इंसान बनाने के काम में लग जाऊं। अब मेरी समझ में आ गया था कि मुझे अब क्या करना है। मैं ऊपर गया और फंव्वारे के नीचे बैठ नहाने लगा, इस सोच के साथ कि अब मैं अपने पुराने सभी गुनाह धो रहा हूं। और अब एक नई जिंदगी में दाखिल हो रहा हूं। एक ऐसी जिंदगी जिसका आधार सच्चाई है और जिसे किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। सुबह ग्यारह बजे दो गवाहों एक पूर्व पादरी फादर पीटर जेकब (जो अब मुसलमान हो चुका था) और मुहम्मद अब्दुल रहमान की उपस्थिति में मैंने इस्लाम का कलमा ए शहादत पढ़ लिया। खुली गवाही दी कि अल्लाह एक ही है और मुहम्मद(स.अ.व.)अल्लाह के पैगम्बर हैं। कुछ देर बाद ही मेरी पत्नी ने भी इस्लाम का कलमा पढ़ लिया। उसने तीन गवाहों के सामने कलमा पढ़ा। तीसरा मैं था।
  मेरे पिता थोड़े संकोची स्वभाव के थे, इस वजह से उन्होंने कुछ महीने बाद इस्लाम कबूल किया लेकिन उसके बाद उन्होंने अपनी सारी ताकत और सामथ्र्य इस्लाम के लिए लगा दी। फिर तो हम अन्य मुसलमानों के साथ स्थानीय मस्जिद में नमाज अदा करने लगे।
  मैंने बच्चों को भी ईसाई स्कूलों से हटाकर मुस्लिम स्कूलों में दाखिल करा दिया। इन दस सालों में बच्चे कुरआन और इस्लामी शिक्षा को याद करने में जुटे हैं।
 सबसे बाद में मेरे पिता की पत्नी (मेरी सौतेली मां) ने इस बात को स्वीकार किया कि ईसा ईश्वर का बेटा नहीं हो सकता। ईसा तो ईश्वर का पैगम्बर था, ईश्वर नहीं था।

   अब आप थोड़ा गौर करें और सोचें कि कैसे अलग-अलग पृष्ठभूमियों और पंथ वालों ने सत्य को अपनाया और यह जानने की कोशिश की कि किस तरह सृष्टि के रचयिता और अपने पालनहार को जाना जाए। आप जरा सोचिए तो सही। एक कैथोलिक पादरी। एक चर्च संगीतकार और पादरी। एक अधिकृत पादरी और ईसाई स्कूलों का संस्थापक। सब एक साथ मुसलमान हो गए। यह तो ईश्वर की मेहरबानी ही है कि हमारी आंखों से परदा हटा और इस्लाम रूपी सत्य को देखने के लिए ईश्वर ने हमारा मार्गदर्शन किया।

   अगर मैं अपने जीवन की कहानी को यहीं पूरी कर दूं तो आपको लगेगा कि यह कहानी तो चकित करने वाली है। आश्चर्य वाली बात ही है कि तीन अलग-अलग पंथों के पादरियों ने अपने धर्म के एकदम खिलाफ माने जाने वाली मान्यताओं और विचारों को अपनाया। और उन्होंने ही नहीं बाद में उनके परिवार वालों ने भी इस्लाम अपनाया।

    लेकिन बात अभी पूरी नहीं हुई। और भी है। उसी साल मैं टेक्सास के ग्रांड प्रेयरी स्थान पर था। वहां पर मेरी मुलाकात जोय नाम के बेपटिस्ट सेमीनारी के एक विद्यार्थी से हुई जिसने पादरियों को शिक्षा देने वाली संस्था सेमीनारी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कुरआन का अध्ययन किया और इस्लाम अपना लिया। और भी कई ऐसे लोग हैं। मुझे एक और कैथोलिक पादरी याद आ रहा है जो इस्लाम की अच्छाइयां इतनी ज्यादा बयान करता था कि एक दिन मैं उससे पूछ बैठा-आप इस्लाम में दाखिल क्यों नहीं हो जाते? उसका जवाब था-क्या? मैं अपनी नौकरी खो दूं? उसका नाम है-फादर जॉन और मुझे अब भी उससे उम्मीद है। इसी साल मेरी एक और पूर्व कैथोलिक पादरी से मुलाकात हुई जो पिछले आठ सालों से अफ्रीका में ईसाई धर्म प्रचारक था। उसने इस्लाम के बारे में वहीं सीखा और फिर इस्लाम कबूल कर लिया। उसने अपना नाम उमर रखा और अभी वह डलास टैक्सास में रहता है।

   इस्लाम अपनाने के बाद जब मैं एक प्रचारक के रूप में दुनियाभर में घूमा तो मेरी कई राजनीतिज्ञ, प्रोफेसर,दूसरे धर्मों के विद्वान और वैज्ञानिकों से मुलाकात हुई जिन्होंने इस्लाम धर्म का अध्ययन किया और फिर मुसलमान हो गए। इन लोगों में यहूदी,हिंदू,कैथोलक,प्रोटेस्टेंट,जहोवाज,विटनेसेस,ग्रीक और रसियन रूढि़वादी चर्च,मिश्र के कॉप्टिक ईसाई और नास्तिक लोग शामिल हैं।

जो शख्स सच की तलाश में है उसे इन नौ बातों पर गौर करना चाहिए-

अपने दिल,दिमाग और आत्मा को वास्तविक भलाई के लिए पवित्र करो। साफ रखो।

हर तरह के पूर्वाग्रह और भेदभाव को अपने दिल और दिमाग से निकाल दो।

जो भाषा आप अच्छी तरह से जानते हैं उस भाषा में अनुवादक किया गया कुरआन पढ़ो।

 थोड़ा रुको,ठहरो।

5   गौर फिक्र-चिंतन करो।

  सोचो और ईश्वर से प्रार्थना करो।

7   जिस सर्वशक्तिमान ने आपको बनाया है, उससे दिल से प्रार्थना करो कि वह आपको सत्य तक पहुंचाने में आपका मार्गदर्शन करे। आपको सच्ची राह दिखाए।

8  कुछ महीनों तक इस अभ्यास को जारी रखें और नियमानुसार इसे रोजाना करें।

  जब आपको लगे कि आपकी आत्मा एक नए रूप में करवट ले रही है। आपको लगे मानो आप एक नए रूप में जन्म ले रहे हैं तो ऐसे में ऐसे लोगों से बचें जिनकी सोच में जहर भरा हो जो आपको गुमराह कर सकते हैं।

   अब आपका मामला आपके और इस ब्रह्माण्ड के सर्वशक्तिमान मालिक के बीच है। अगर आप वाकई में सच्चे ईश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं तो वह इस बात से अंजान नहीं है क्योंकि वह तो दिलों तक की बात जानने वाला है। और वह उसी हिसाब से आपका मामला तय करेगा जो आपके दिल में है।

   ईश्वर से दुआ है कि वह आपको सच्ची राह दिखाने में आपका मार्गदर्शन करे। वह इस जगत की सच्चाई और जिंदगी का मकसद जानने के लिए आपके दिल और दिमाग को खोले। आमीन



                                                                                                  आपका दोस्त

                                                                                                        यूसुफ एस्टीज

                              यूसुफ एस्टीज की ऑफिसियल वेबसाइट-http://www.islamtomorrow.com/

रविवार, 4 अप्रैल 2010

एक अमेरिकी पादरी जिसने इस्लाम कबूल किया

       जेसॉन क्रुज,पूर्व ईसाई पादरी

अल्लाह का शुक्र है कि मुझे अल्लाह ने 2006 में इस्लाम रूपी बेशकीमती ईनाम से नवाजा। जब भी कोई मुझसे यह पूछता है कि मैं कैसे इस सच्चे धर्म की तरफ आया तो मैं झिझक जाता हूं। क्योंकि यह मेरी काबलियत नहीं बल्कि यह अल्लाह ही की हिदायत और रहमत है कि उसने मुझे सच्ची राह दिखाई। बिना अल्लाह की मर्जी और रहमत के कोई इस सच्चे मार्ग की तरफ नहीं आ सकता।

मैं न्यूयॉर्क के एक कैथोलिक परिवार में पैदा हुआ। मेरे माता और पिता रोमन कैथोलिक थे। हम इतवार को चर्च जाते थे। पहले मैंने ईसाई धर्म की शिक्षा ली,ईसा मसीह के स्मरणार्थ पहले भोज में शामिल हुआ और फिर मैंने रोमन कैथोलिक चर्च की सदस्यता कबूल कर ली। जब मैं जवान हुआ तो मुझे परमेश्वर की ओर से मार्गदर्शन के संकेत का अहसास होने लगा। इसका अर्थ मैंने यह लगाया कि यह मेरे लिए रोमन कैथोलिक पादरी बनने का मैसेज है। मैंने यह बात अपनी मां को बताई तो वह बहुत खुश हुई और वह मुझे हमारे इलाके के पादरी के पास ले गई।

इसे दुर्भाग्य मानें या सोभाग्य कि यह ईसाई पादरी अपने पेशे से खुश नहीं था और इसने मुझे पादरी बनने के विचार से ही दूर रहने की सलाह दी। इससे मैं विचलित हुआ। इस बीच परमेश्वर के शुरूआती मैसेज के अहसास को भूला देने,अपनी मूर्खता और किशोर अवस्था के चलते मैंने एक अलग ही रास्ता चुन लिया। बदकिस्मती से जब मैं सात साल का था तो मेरा परिवार बिखर गया। मेरे माता-पिता के बीच तलाक हो गया और मैं अपने पिता से दूर हो गया।

पन्द्रहवें साल में पहुंचने पर मैं पार्टियों और नाइट क्लबों में जाने में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगा। पहले मैंने वकील बनने का ख्वाब संजोया और फिर राजनेता बनने के सपने देखने लगा ताकि अच्छी लाइफ स्टाइल जी सकूं । हाई स्कूल पास करने के बाद मैं कॉलेज पहुंचा लेकिन मैं वहां पढ़ नहीं पाया और वहां से ऐरीजोना(जहां मैं अब तक लगातार रहा) आया और यहां डिग्री पूरी होने तक रहा। एरीजोना में एक दिन मेरी तबियत ज्यादा खराब हो गई। दरअसल मैं वहां घर से भी ज्यादा बुरे लोगों की संगत में फंस गया था। शिक्षा कम होने की वजह से मुझे छोटे-मोटे काम करने पड़े। मैं नशे,बदचलनी और नाइट क्लब में जाने की आदत का शिकार हो गया। इसी दौरान मैं पहली बार एक मुस्लिम शख्स से मिला। वह एक नेक इंसान था और विदेशी छात्र के रूप में शिक्षा हासिल कर रहा था। वह मेरे दोस्तों के साथ पार्टी वगैरह में आता था। मैंने उससे इस्लाम पर तो चर्चा नहीं की लेकिन उससे उसके कल्चर को लेकर सवाल किए जिसका जवाब उसने खुलकर दिया। मेरी जिंदगी का यह बुरा दौर कुछ सालों तक चला। मैं इस जिंदगी के बारे में ज्यादा नहीं बताना चाहता। मुझे बहुत से आघात लगे। मेरे जानकार लोग मारे गए। मुझे चाकुओं से गोदा गया और भी कई जख्म मुझे मिले। यह कोई ड्रग्स के खतरों की कहानी नहीं है। मैं अपनी इस बुरी जिंदगी का आपके सामने जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि मैं आपको यह बात जोर देकर बताना चाहता हूं कि अगर ईश्वर चाहे तो बुरे हालात में भी आपको राह दिखाकर नारकीय जिंदगी से बाहर निकाल सकता है। आपको सही राह पर ला सकता है।

मैंने सुपर पावर के साथ फिर से जुड़ाव महसूस किया और इसी दौरान नशीली चीजों का सेवन करना छोड़ दिया। ईश्वरीय कृपा के चलते ही मैं इन बुराइयों से बच पाया। दरअसल मैं परमेश्वर से जुड़ाव खो चुका था जो कभी पहले मेरा उससे रहा था। मैं फिर से सच्चे ईश्वर की तलाश में जुट गया। बदकिस्मती से मैं पहली बार में सच्चाई को नहीं पा सका और मैंने हिन्दू धर्म अपना लिया। हिन्दू धर्म में मुझे इस बात ने प्रभावित किया था कि आखिर हमें कष्ट क्यों झेलने पड़ते हैं। मैंने पूरी तरह हिन्दू धर्म अपना लिया,यहां तक मैंने अपना नाम भी बदलकर हिन्दू नाम रख लिया। इस बदलाव से मैं नशीली चीजों के सेवन से दूर रहा और मेरी जिंदगी सकारात्मक दिशा की तरफ चलने लगी। लेकिन मैं फिर से ईश्वर की तरफ से एक चुभन महसूस करने लगा। मुझे यहां भी सुकून नहीं मिला। सच की तलाश को लेकर मेरे में बेचैनी अभी भी बनी थी। इसी के चलते मैंने हिन्दू धर्म छोड़ दिया और मैं फिर से ईसाई धर्म में आ गया। मुझे महसूस हुआ कि परमेश्वर मेरी सेवाएं एक पादरी के रूप में चाहता है। इसलिए मैंने पादरी के रूप में सेवाएं देने के लिए रोमन कैथोलिक चर्च में सम्पर्क किया। मुझे न्यू मेक्सिको में मोनेस्टरी में एक पोस्ट के साथ शिक्षा देने का प्रस्ताव रखा गया। उस वक्त मेरी मां,भाई और बहिन भी एरीजोना आ गए थे और यहां मेरी कई लोगों से अच्छी दोस्ती थी। मैं न्यू मैक्सिको जा नहीं पाया और एरीजोना के ही एक कैथोलिक चर्च से जुड़कर विभिन्न सेमीनार के जरिए मैंने घर रहते हुए ही ईसाइयत का अध्ययन किया। बाद में मैं एरीजोना में ही स्वतंत्र रोमन कैथोलिक चर्च में नियुक्त कर दिया गया। मैंने चर्च से जुड़ी कई सेमीनार अटेंड की और फिर 2005 में मुझे पादरी के रूप में नियुक्त कर दिया गया। मुझे विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच जाकर ईसाइयत का मैसेज देने की जिम्मेदारी दी गई। मेरा काम शहरी क्षेत्र में जाकर विभिन्न धर्मों के लोगों की आस्था,रीति-रिवाजों को समझना और उनको ईसाइयत का मैसेज देना था। मैं अधिकतर ईसाई रीति-रिवाजों का पहले ही अध्ययन कर चुका था और इनसे वाकिफ था। मैंने यहूदी और पूर्वी धर्मों का भी अध्ययन कर लिया था।

जहां में काम करता था वहां नजदीक की गली में ही एक मस्जिद थी। मैंने सोचा कि मेरे लिए अच्छा मौका है कि मैं इस्लाम के बारे में भी सीखूं ताकि विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच संवाद के अपने काम को और मजबूत बना सकूं। मैं टेम्पे मस्जिद गया और वहां मुझे अच्छे लोग मिले। मैंने इस्लाम का अध्ययन करना शुरू कर दिया। जो कुछ मैंने पढ़ा उसने मेरे दिल को बेहद प्रभावित किया। मैं फिर मस्जिद गया और वहां पर मैं एक काबिल टीचर अहमद अल अलकयूम से मिला। ब्रदर अहमद अल अलकयूम अमेरिकन मुस्लिम सोसायटी के रीजनल डायरेक्टर थे। वे मस्जिद में सभी धर्मों के लोगों के लिए एक ऑपन क्लास लेते थे जिसमें वे इस्लाम का परिचय कराते थे। मैं भी उनकी क्लास में शामिल होने लगा। क्लास में शामिल होने के दौरान ही मुझे यकीन होने लगा कि इस्लाम ही सच्चा धर्म है। और कुछ दिनों बाद ही मैंने इस्लाम का कलमा पढ़कर मैं मुसलमान बन गया।

ब्रदर अहमद अल अलकयूम और शेख अहमद शकीरात दोनों बहुत बड़ी हस्ती हैं और इन्हीं की वजह से मेरा इस्लाम में आना आसान हुआ। मैंने चर्च से इस्तीफा दे दिया और अल्लाह का शुक्र है कि मैं तभी से मुसलमान हूं। इस्लाम कबूल करने के साथ ही मेरी जिंदगी में अच्छे बदलाव आए। पादरी का पद छोडऩे और इस्लाम अपनाने पर मेरे परिवारवालों को बेहद आश्चर्य हुआ। वे कुछ समझ नहीं पाए बल्कि वे तो इस्लाम से भयभीत थे। बाद में उन्हें महसूस हुआ कि कुरआन और सुन्नत के प्रति जबरदस्त भरोसे से मेरा जीवन ज्यादा खुशहाल हुआ है और मेरा घर वालों के साथ बेहतर ताल्लुकात हुए हैं तो फिर उन्हें लगा कि इस्लाम तो अच्छा धर्म है। ब्रदर अहमद जानते थे कि इस्लाम अपनाने के बाद का एक साल मुश्किलों भरा होता है,उन्होंने इस दबाव को झेलने के तरीके सुझााए। मैं कई नवमुस्लिम से भी मिला। मैं अब एक मुस्लिम के रूप में बेहतर तरीके से काम को अंजाम देने वाला बन गया। मैं एक प्रोग्राम का मेनेजर बना। इस प्रोग्राम का मकसद प्रभावित लोगों को अल्कोहल,एड्स और हेपेटाइटिस से बचाना था।

मैं मुस्लिम अमेरिकन सोसायटी का ही स्वंयसेवी नहीं बना बल्कि एरीजोना के मुस्लिम यूथ सेन्टर और अन्य मुस्लिम समाजसेवी संस्थाओं से भी जुड़ गया। मुझो हाल ही टेम्पे मस्जिद के बोर्ड में भी शामिल किया गया है जहां मैंने इस्लाम कबूल किया था। अब मैं सच्चे मुस्लिम दोस्त ही रखता हूं। अब मैं मौज-शौक से जुड़ी पार्टियों में हिस्सा नहीं लेता। अगर अल्लाह ने चाहा तो मैं इस्लाम की खिदमत के लिए मेरे पसंदीदा इस्लामी विद्वानों से इस्लाम का ज्यादा से ज्यादा इल्म हासिल करूंगा। आज मैं जो कुछ भी हूं अल्लाह के रहमो करम से हूं और जो कुछ मेरे में कमियां-खामियां रहीं वे मेरी वजह से रही।

सोमवार, 22 फरवरी 2010

इंग्लैण्ड का ईसाई पादरी बन गया मुसलमान


ब्रिटेन का एक पूर्व कैथोलिक ईसाई पादरी कुरआन से इतना प्रभावित हुआ कि इस्लाम कबूल कर लिया।


ईमानवालों के साथ दुश्मनी करने में यहूदियों और बहुदेववादियों को तुम सब लोगों से बढ़कर सख्त पाओग। और ईमानवालों के साथ दोस्ती के मामले में सब लोगों में उनको नजदीक पाओगे जो कहते हैं कि हम नसारा (ईसाई) हैं। यह इस वजह से है कि उनमें बहुत से धर्मज्ञाता और संसार त्यागी संत पाए जाते हैं और इस वजह से कि वे घमण्ड नहीं करते।

जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें आंसुओं से छलकने लगती हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है। वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले।

                                                                                                        (सूरा:अल माइदा ८२-८३)

कुरआन की ये वे आयतें है जिन्हें इंग्लैण्ड में अपने स्टूडेण्ट्स को पढ़ाते वक्त इदरीस तौफीक बहुत प्रभावित हुए और उन्हें इस्लाम की तरफ लाने में ये आयतें अहम साबित हुईं।

काहिरा के ब्रिटिश परिषद में दिए अपने एक लेक्चर में तौफीक ने साफ कहा कि उसे अपनी पिछली जिंदगी और वेटिकन में पादरी के रूप में गुजारे पांच साल को लेकर किसी तरह का अफसोस नहीं है। मै एक पादरी के रूप में लोगों की मदद कर खुशी महसूस करता था लेकिन फिर भी दिल में सुकून नहीं था। मुझो अहसास होता था कि मेरे साथ सब कुछ ठीकठाक नहीं है। अल्लाह की मर्जी से मेरे साथ कुछ ऐसे संयोग हुए जिन्होंने मुझो इस्लाम की तरफ बढ़ाया। ब्रिटिश परिषद के खचाखच भरे हॉल में तौफीक ने यह बात कही।
  तौफीक के लिए दूसरा अच्छा संयोग यह हुआ कि उन्होंने वेटिकन को छोड़कर इजिप्ट का सफर करने का मन बनाया।

मैं इजिप्ट को लेकर अकसर सोचता था-एक ऐसा देश जिसकी पहचान पिरामिड,ऊंट,रेगिस्तान और खजूर के पेड़ों के रूप में है। मैं चार्टर उड़ान से हरगाडा पहुंचा। मैं यह देखकर हैरान रह गया कि यह तो यूरोपियन देशों के दिलचस्प समुद्री तटों की तरह ही खूबसूरत था। मैं पहली बस से ही काहिरा पहुंचा जहां मैंने एक सप्ताह गुजारा। यह सप्ताहभर का समय मेरी जिंदगी का अहम और दिलचस्प समय रहा। यहीं पर पहली बार मेरा इस्लाम और मुसलमानों से परिचय हुआ। मैंने देखा कि इजिप्टियन कितने अच्छे और व्यवहारकुशल होते हैं,साथ ही साहसी भी।
ब्रिटेन के अन्य लोगों की तरह पहले मुसलमानों को लेकर मेरा भी यही नजरिया था कि मुसलमान आत्मघाती हमलावर,आतंकवादी और लड़ाकू होते हैं। दरअसल ब्रिटिश मीडिया मुसलमानों की ऐसी ही इमेज पेश करता है। इस वजह से मेरी सोच बनी हुई थी कि इस्लाम तो उपद्रवी मजहब है। काहिरा में मुझो अहसास हुआ कि इस्लाम तो बहुत ही खूबसूरत धर्म है। इसको जिंदगी में अपनाने वाले मुस्लिम बहुत ही सीधे और सरल होते हैं। मस्जिद से नमाज की अजान सुनते ही वे अपना काम-धंधा छोड़कर अल्लाह की इबादत के लिए दौड़ पड़ते हैं। वे अल्लाह क ी इच्छा और इसकी रहमत पर जबरदस्त भरोसा रखते हैं। वे पंाच वक्त नमाज अदा करते हैं,रोजे रखते हैं,जरूरतमंद लोगों की मदद करते हैं और हज के लिए मक्का जाने की ख्वाहिश रखते हैं। वे यह सब इस उम्मीद में करते हैं कि अल्लाह उन्हें मौत के बाद दूसरी जिंदगी में जन्नत में दाखिल करेगा।


'काहिरा से लौटने के बाद मैं धार्मिक शिक्षा देने के अपने पुराने काम में फिर से जुट गया। ब्रिटेन में धार्मिक विषयों क ा अध्ययन अनिवार्य विषय के रूप में है। मैं ईसाइयत,इस्लाम,यहूदी,बोद्ध और अन्य धर्मों के बारे में स्टूडेण्ट्स को पढ़ाता था। इस वजह से मुझो इन धर्मों के बारे में अध्ययन करना पड़ता था कि मैं इन्हें इन धर्मों के बारे में बता सकूं । मेरी क्लास में कुछ अरब के मुस्लिम छात्र भी थे। यूं समझिाए की इस्लाम के बारे में पढ़ाने के लिए खुद अध्ययन करते वक्त मैंने इस्लाम के बारे में काफी कुछ जाना।'

'अरब के वे मुस्लिम छात्र बहुत ही नम्र,शालीन और व्यवहारकुशल थे। मेरी उनसे दोस्ती हो गई। उन्होंने मुझासे मेरे क्लासरूम में रमजान के महीने के दौरान नमाज पढऩे की इजाजत मांगी। दरअसल मेरे क्लासरूम में कारपेट बिछा होता था। वे नमाज अदा करते और मैं उनको पीछे बैठकर देखता रहता। उनसे प्रेरित होकर मैंने भी रोजे रखे हालांकि अभी मैं मुसलमान नहीं हुआ था।

'एक बार कुरआन का अध्ययन करते वक्त मेरे सामने यह आयत आई-

जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें आंसुओं से छलकने लगती हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है। वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले।

यह आयत पढऩे के बाद मैं यह देखकर हैरान हो गया कि मेरी आंखों से आंसू निकल रहे हैं। मैंने मुश्किल से स्टूडेण्ट्स के सामने अपने आंसू छिपाए।'

और जिंदगी बदल गई

अमेरिका पर ११ सितम्बर २००१ को आतंकी हमला होने के बाद तौफीक की जिंदगी में एक बहुत बड़ा बदलाव आया।
'उन दिनों मैं भी बाहर नहीं निकला और मैंने देखा कि लोग काफी भयभीत थे। मैं भी काफी डरा हुआ था और आशंका थी कि इस तरह के आतंकी हमले ब्रिटेन में भी हो सकते हैं। उस वक्त पश्चिम के लोग इस्लाम से घबराने लगे और उन्होंने आतंकवाद के लिए इस्लाम को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया।'

'हालांकि मेरा तो मुसलमानों के साथ अलग तरह का अनुभव था और मैं इसके लिए इस्लाम को कतई जिम्मेदार नहीं मानता था। मुझो हैरत हुई-इस्लाम इसके लिए जिम्मेदार कैसे हुआ? कुछ सिरफिरे मुस्लिमों द्वारा किए गए इस कुकृत्य के लिए आखिर इस्लाम को दोषी कैसे माना जा सकता है? जब ऐसी ही किसी घटना को कोई ईसाई अंजाम देते हैं तब तो इसके लिए ईसाइयत को जिम्मेदार नहीं माना जाता?

एक दिन मैं इस्लाम के बारे में और भी जानने के लिए लंदन की सबसे बड़ी मस्जिद लन्दन सैन्ट्रल मस्जिद पहुंचा। वहां इस्लाम कबूल कर चुके पूर्व पॉप स्टार यूसुफ इस्लाम एक सर्किल में बैठकर लोगों से इस्लाम के बारे में चर्चा कर रहे थे। वहां पहुंचने के थोड़ी देर बाद मैंने उनसे पूछा- आखिर आपने इस्लाम क्यों कबूल किया?
उन्होंने जवाब दिया-एक मुस्लिम एक ईश्वर में भरोसा करता है। पांच वक्त नमाज अदा करता है। रमजान के रोजे रखता है। मैंने बीच में ही उनको रोकते हुए कहा-मैं भी इन सब में भरोसा रखता हूं और रमजान के दौरान रोजे रखता हूं।,उन्होंने कहा-फिर तुम किस बात का इन्तजार कर रहे हो? कौनसी बात तुम्हें मुसलमान होने से रोके हुए है? मैंने कहा-नहीं, मेरा धर्म-परिवर्तन का कोई इरादा नहीं है।
इसी पल नमाज के लिए अजान हुई और सभी वुजू बनाकर नमाज अदा करने के लिए लाइन में जाकर खड़े हो गए। मैं पीछे की तरफ बैठ गया। मैं मन ही मन चिल्लाया। मन ही मन सोचा आखिर मैं ऐसी बेवकूफी क्यों कर रहा हूं? जब वे नमाज पढ़ चुके तो मैं यूसुफ इस्लाम के पास गया और इस्लाम कबूल करने के लिए कलमा पढ़ाने के लिए उनसे कहा। यूसुफ इस्लाम ने पहले मुझो अंग्रेजी में अरबी कलमे के मायने बताए और फिर मैंने भी कलमा पढ़ लिया- 'अल्लाह के सिवाय कोई इबादत के लायक नहीं और मुहम्मद सल्ल. अल्लाह के पैगम्बर हैं।'

 यह कहते हुए तौफीक की आंखों में आंसू निकल पड़े।
इस तरह तौफीक की जिंदगी ने एक नई दिशा ली। इजिप्ट में रहते हुए तौफीक ने इस्लाम के उसूलों पर एक किताब गार्डन ऑफ डिलाइट लिखी। अपनी इस किताब के बारे में तौफीक ने कहा-हर कोई यह कहता है कि इस्लाम का आतंकवाद से कोई ताल्लुक नहीं है और इस्लाम नफरत पैदा करने वाला मजहब नहीं है लेकिन वे लोगों को नहीं बताते कि इस्लाम कितना खूबसूरत मजहब है और इसमें इंसानियत से जुड़े कितने अच्छे उसूल हैं। इस वजह से मैंने इस्लाम के आधारभूत उसूलों पर किताब लिखना तय किया। मैं लोगों को बताता हूंं कि इस्लाम तो इंसानियत को बढ़ावा देने वाला मजहब है जिसमें सबके साथ बेहतर सलूक करने पर जोर दिया गया है। पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. फरमाते हैं-अपने भाई को देखकर मुस्कराना भी नेकी है।

तौफीक ने बताया कि वे पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. पर एक किताब लिख रहे हैं जो उन पर पहले से लिखी गई किताबों से अलग हटकर होगी। तौफीक का मानना है कि अपनी जिंदगी में इस्लाम के उसूलों को अपनाकर ही दुनिया के सामने इस्लाम को अच्छे अंदाज में रखा जा सकता है। यही अच्छा तरीका है दुनिया के सामने इस्लाम को सही तरीके से पेश करने का।

यह आर्टिकल इजिप्टियन गजट में २ जुलाई २००७ को अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था।

 

 

शनिवार, 5 दिसम्बर 2009

क्रिकेटर ब्रायन लारा मुसलमान हो गया?







पिछले कुछ माह से इंटरनेट पर यह मुद्दा जोर पकड़े हुए है। सवालों पर सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या वास्तव में वेस्टइंडीज के महान क्रि केटर ब्रायन लारा मुसलमान हो गए हैं।

खबर यह है कि पाकिस्तानी क्रिकेटर सईद अनवर और पाकिस्तान के पूर्व पॉप स्टार जूनेद जमशेद के हाथों ब्रायन लारा ने इस्लाम कबूल कर लिया है।

हालांकि इस खबर की पूरी तरह पुष्टि नहीं हुई है लेकिन इन दिनों ब्रायन लारा क्रिकेट को लेकर नहीं बल्कि इस्लाम अपनाने को लेकर चर्चा का विषय बने हुए हैं।

यहां कुछ लिंक है उन वेबसाइट्स के जहां ब्रायन लारा के इस्लाम कबूलने संबंधी सवाल जवाब है।
http://answers.yahoo.com/question/index?qid=20090505050652AA4VBFy
http://wiki.answers.com/Q/Did_Brian_Lara_embrace_Islam_How_true_it_is
http://www.ummah.net/forum/showthread.php?t=212836

बृहस्पतिवार, 29 अक्तूबर 2009

अमरीकी महिला पत्रकार जो मुसलमान हो गयी

मेरी कोशिशों से तीन सौ व्यक्तियों ने मादक-द्रव्यों से तौबा की है और इक्कीस मर्दों और औरतों ने इस्लाम ग्रहण किया है। मैं एक अपाहिज औरत हूं। मगर मैं अपने आपको अपाहिज नहीं समझती, क्योंकि मेरा ईमान है कि जो व्यक्ति मुसलमान हो जाए, वह कभी अपाहिज नहीं हो सकता, क्योंकि खुदा उसका सहारा बन जाता है।सुश्री आमिना अश्वेत अमेरिकी महिला हैं, जो अपनी सामाजिक सेवाओं के कारण विश्व प्रसिद्ध हैं। १९८० ई० में इनके कार्यों पर एक पुस्तक प्रकाशित हुई। उसके अनुसार ३५० व्यक्तियों ने उनकी प्रेरणा से नशा-सेवन छोड़ा था और २१ औरत-मर्दों ने इस्लाम कबूल कर लिया था।
उल्लेखनीय बात यह है कि शिकागो न्यूज़ से संबंध रखने वाली विलक्षण प्रतिभा की धनी ये पत्रकार महिला शारीरिक रूप से अपंग हैं। वे शिकागो के हबशियों की झोपड़ पट्टी में पैदा हुई, जहां गन्दगियों, अपराधों, नशाख़ोरियों, निर्धनता और दरिद्रता का गढ़ था। उनका पैदाइशी नाम सिंथिया था और उनके पिता भी हबशियों की तरह आवारागर्द, नशाख़ोर और अपराधी प्रवृति के थे। उनकी मां ही श्वेत लोगों के घरों में मज़दूरी करके घर का खर्च चलाती थी। बाप की लापरवाही और क्रूरता के कारण वे बाल्यावस्था में ही पोलियो का शिकार हो गयीं। पांच साल की अवस्था में उनकी मां एक सस्ती-सी पहियों वाली कुर्सी खऱीद लायी और उन्हें एक स्कूल में छोड़ आयीं। सिंथिया ने जबसे बोलना शुरू किया था, वे बार-बार कहा करती थीं, मैं स्कूल जाऊंगी, मैं स्कूल जांऊगी। सिंथिया बड़ी समझदार और तीव्र बुद्धिवाली बच्ची थीं। वे अपनी कुर्सी को घसीटती हुई स्कूल चली जातीं। घर आ जातीं और पुस्तकें पढ़ती रहतीं। उनके शिक्षकगण उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। वे बड़ी संतोषी और धैर्यवान थीं। वे किसी हीन भावना से ग्रस्त नहीं हुईं। दूसरे बच्चों को भागते-दौड़ते देखकर वे अपनी विवशता और विकलांगता पर न कभी आंसू बहातीं, न परेशान होतीं और सिर झुकाये बड़ी निष्ठा और एकाग्रता से अध्ययन करती रहतीं। उन्होंने अपने स्कूल मे अपनी प्रतिभा की धाक बिठा दी थी। उन्हें हर वर्ष ईनाम मिला करता था। समय व्यतीत होता गया और सिंथिया १७ साल की हो गयीं। उन्होंने स्कूल की शिक्षा पूरी कर ली थी और अब यूनीवर्सिटी में दाख़िला लेना था। चूंकि उनकी श्रेष्ठ शैक्षिक योग्यता और प्रतिभा से सभी प्रभावित थे, इसलिए उन्हें छात्रवृत्ति मिल गयी और पांच साल तक वे यूनीवर्सिटी में शिक्षा ग्रहण करती रहीं तथा प्रतिष्ठा के साथ उसे पूर्ण किया। फिर एक स्थानीय समाचार-पत्र शिकागो न्यूज़ में उन्हें नौकरी भी मिल गयी। यही वह ज़माना था, जब सिंथिया अमेरिका के एक प्रसिद्ध अश्वेत नेता मेलकॉम एक्स के चरित्र से परिचित हुर्इं। वह कुख्यात और जाना-पहचाना अपराधकर्मी और नशीले-पदार्थों का हबशी विक्रेता था। वह अनगिनत गंभीर अपराधों में लिप्त था। और जीवन का बड़ा हिस्सा जेलों में व्यतीत कर चुका था। $खुदा का करना यह हुआ कि मेलकॉम मुसलमान हो गया और इससे न केवल उसकी अपनी जिन्दगी में ज़बरदस्त इन्िकलाब आ गया, वह एक नेक इन्सान बन गया, बल्कि उसके प्रचार और प्रेरणा से हजारों अश्वेत लोगों की जि़न्दगियां भी बदल गयीं। उन्होंने सैकड़ों ऐसे स्वयंसेवक तैयार किये जो विशेषत: अश्वेतों को सन्मार्ग पर लाने और उनको नशे से छुटकारा दिलाने के लिए दिन-रात प्रयत्नशील रहते थे। यह एक नया आन्दोलन था, यह एक नया इन्कलाब था, जो धीरे-धीरे अमेरिका के अश्वेतों में आ रहा था, जो उन्हें सम्मानपूर्वक जि़न्दा रहना सिखा रहा था। सिंथिया मेलकॉम एक्स के दोनों पहलुओं से अवगत थीं, इसलिए उसके दिलो-दिमाग ने इस्लाम धर्म से भी गहरा प्रभाव ग्रहण किया था। चूंकि वे अध्ययनशील प्रवत्ति की थीं इसलिए उन्होंने इस्लाम के बारे में बहुत कुछ पढ़ डाला और उन्हें अपनी परिकल्पनाओं और मानव प्रवत्ति के सर्वथा अनुकूल पाया तो उसे स्वीकार कर लिया। एक दिन जबकि पहले की तरह उनका पिता शराब के नशे में धुत्त उनकी मां की पिटाई करने वाला था, उन्होंने अपने बाप को समझाना शुरू कर दिया और मां को धीरज बंधाने लगी और बातचीत की तेजी में बता दिया कि वे इस्लाम स्वीकार कर चुकी हैं।
इस वंृत्तात को खुद सिंथिया, बल्कि आमिना की ज़बानी सुनिए:
मेरे माता-पिता के लिए मुसलमान शब्द अपरिचित न था। मैं नहीं जानती कि इस्लाम और इस्लाम के अनुयायियों के बारे में अमेरिकियों का रवैया बिना रंग-नस्ल क्यों शत्रुतापूर्ण और विरोधपूर्ण हैं। मेरी ज़बान से यह सुनने के बाद कि मैं मुसलमान हो चुकी हूं, मेरे मां-बाप को अत्यन्त आश्चर्य हुआ। ख़ासतौर पर मेरी मां को बहुत दुख हुआ। उनकी यह प्रतिक्रिया तब बहुत परेशान करने वाली थी। मैं उन्हें एक उत्पीडि़त औरत समझती थी। मेरा ख्य़ाल था कि मेरे मुसलमान होने पर वह ज्य़ादा शोर न मचाएगी, किन्तु हुआ इसके विपरीत। मेरे पिता के चेहरे पर घृणा, तिरस्कार, उपहास, लापरवाही की झलक दिखाई दे रही थी और मेरी मां लगातार बोलती जा रही थी। आज जब वह दृश्य याद आता है, तो मैं बेइख़्ितयार मुस्करा देती हूं, परन्तु उस समय मेरी प्रतिक्रिया भिन्न थी। मैं यह महसूस करने लगी थी कि मैनें इस्लाम स्वीकार करने का ऐलान कुछ जल्दी कर दिया। इसका कारण यह न था कि मेरे ईमान में कोई कमी थी, बल्कि यह कि मैने यह फैसला किया था कि जब तक मैं मुसलमानों के तौर-तरीकों को परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से अपना नहीं लेती, तब तक इस्लाम स्वीकार करने का ऐलान नहीं करूंगी। मैं उस क्षण बहुत भावुक हो गई थी। अपने मुसलमान होने का जि़क्र बड़े जोश और जज्बे से कर दिया। मेरे पिता बड़बड़ाते हुए बाहर चल गये। मेरी मां मुझे समझाने लगीं। मंैने कहा--मम्मी जो होना था हो चुका। मैं जो $कदम आगे बढ़ा चुकी हूं वह पीछे नहीं हटा सकती। मेरी मां ने और अधिक सख्ती से समझाना-ब़ुझाना शुरू किया। मंैने उनसे कहा कि वह अपना समय अकारण बर्बाद कर रही हैं। मैं मुसलमान हो चुकी हूं और अब कुछ नहीं हो सकता। मेरी मां ने सोचा शायद मैं जि़द कर रही या भावुक हो गयी हूं। उन्होंने अपना लम्बा भाषण अधूरा छोड़ा और मुझे अकेली छोड़कर चली गयी। मैं मुसलमान क्यों हुई? यह बात मुझसे कई लोगों ने पूछी है और मैं कई बार जवाब दे चुकी हूं। इसके बावजूद मैं समझती हूं कि मुझे इस सवाल का जवाब बड़े सुकून और इत्मीनान से देना चाहिए।--- मेरे घरेलू हालात अमेरिका में हबशियों की समग्र परिस्थिति से अधिक मेरी विवशता और अपंगता ने मुझे इस्लाम की ओर प्रेरित किया। इसका विवरण भी सुन लें।
एक अखबार में काम करने के कारण मैं प्रतिदिन मेलकॉम एक्स और मुसलमान होने वाले अश्वेतों के सुधारवादी आन्दोलन के विषय में पढ़ती थी। चूंकि पोलियो के कारण मैं विवश और अपंग हो चुकी थी और सिवाय अध्ययन के और मेरा कोई कार्य नहीं था। इसलिए मुझमें सोचने-समझने की आदत बहुत बढ़ गयी थी। जब मैं पढ़ती कि मेलकॉम एक्स और उनके स्वयंसेवक अपने साथियों से नशा-सेवन की लत छुड़ाने में सफल हो रहे हैं, तो मुझे बड़ी हैरत होती। मैं समझती कि यह मात्र एक समाचार है, जिसमें सच्चाई नहीं है। लेकिन फिर भी मैं सोचती कि यह समाचार किस हद तक झूठा हो सकता है? मेरे पास मेरे अपने इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। मगर उस ज़माने में मैंने यह फैसला कर लिया कि मुझे इस्लाम के बारे मेें कुछ पढऩा चाहिए। मैंने कुछ पुस्तकें प्राप्त की और पढऩे लगी। इस्लाम के बारे में उन पुस्तकों ने मुझे अत्यन्त प्रभावित किया। जब मैंने यह पुस्तकें पढ़ लीं, तो मेरे दिल में कुरआन पढऩे का ख्य़ाल पैदा हुआ और मैंने अंग्रेजी में अनुदित कुरआन की एक प्रति प्राप्त कर ली। पवित्र कुरआन के इस अनुवाद ने मुझे एक अनुपम आत्मिक आनन्द प्रदान किया, जिसे मैं बयान नहीं कर सकती। आज मैं समझती हूं कि अगर कोई भी व्यक्ति दिलचस्पी, एकाग्रता और लगन से पवित्र कुरआन का अध्ययन करे तो वह इस पवित्र पुस्तक की सत्यता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। पवित्र कुरआन के अध्ययन ने मुझे कई दिन बेचैन रखा, मेरे दिल में एक अजीब तरह का भावनात्मक उतार-चढ़ाव पैदा हो गया था। जी चाहता कि अब मेलकॉम एक्स से मिलूं, मगर वे इस शहर से बहूत दूर थे। मैंने समाचार-पत्र के द्वारा यह पता लगाया कि यहां हमारे शहर में कौन ऐसा व्यक्ति है जो मुसलमानों का मार्गदर्शन करता है। उसका पता मुझे जल्द ही मिल गया। मैंने उस व्यक्ति, मुहम्मद यूसुफ को फोन किया और उससे मुलाकात के लिए समय मांगा। दूसरी ओर से मुझे बड़ी हमदर्द और नर्म आवाज़ सुनायी दी। मुहम्मद यूसुफ ने मुझसे कहा कि मैं जिस समय चाहूं उससे मिल सकती हूं। मैंने उन्हें बताया कि मैं कल दोपहर बाद उनसे मिलूंगी। समय निश्चित हो जाने के बाद मैंने संतोष की सांस ली। जब मैं अगले दिन मुहम्मद यूसुफ से मिलने गयी, तो वह मुझे देखकर कुछ परेशान हो गये। मैंने उनकी परेशानी के कारण को भांप लिया। वे किसी स्वस्थ और हष्ट-पुष्ट लड़की से मिलने की आशा रखते थे। जब उन्हें व्हील चेयर में बैठी चलने-फिरने में विवश मुझ जैसी लड़की दिखायी दी, तो वे कुछ परेशान से हो गये, लेकिन मेरी खुशदिली ने उनकी परेशानी को जल्दी खत्म कर दिया। मुहम्मद यूसुफ मेरी तरह ही अश्वेत थे। कभी उनका नाम जॉन ब्लेगडन था। अब वे मुहम्मद यूसुफ जैसे खूबसूरत नाम के मालिक थे। वे इस शहर के मुसलमानों के इमाम थे। वही मस्जि़द में नमाज़ पढ़ाते और वही कुरआन की शिक्षाओं पर प्रवचन करते थे। वे हमदर्दी भरे लहजे में मुझसे मेरे बारे में बातचीत करते रहे। बातों-बातों में बड़े गैर महसूस अन्दाज़ में उन्होंने मुझसे मेरे परिवार के बारे में सारी जानकारियां प्राप्त कर लीं। मैंने उनसे पूछा कि वे मुसलमान क्यों हुए थे? मुहम्मद यूसुफ मुस्करा दिए। फिर उन्होंने धीमे से बड़े मीठे लहजे में जवाब दिया- मैं इसलिए मुसलमान हुआ कि खुदा तआला कि यह मरजी थी कि वह मुझे सीधा रास्ता दिखाए। उनका वह जवाब मैं आज तक नहीं भूली हूं और जिन्दगी भर न भूल सकूंगी, क्योंकि मैं भी यही समझती हूं कि अल्लाह तआला जिस इन्सान को सीधे रास्ते पर लाना चाहता है, उसके दिल में इस्लाम के लिए मुहब्बत पैदा कर देता हैं। मुहम्मद यूसुफ ने मुझे बताया कि वे भी अश्वेतों के गरीब और पिछड़े इलाके में पैदा हुए थे। उन्होंने बचपन गरीबी और कंगाली में गुज़ारा। बड़े हुए तो एक ऐसे होटल में नौकर हो गये, जहां उन्हें बर्तन मांजने के लिए रखा गया था। मगर उनसे जरूरी काम और भी लिया जाता था। उन्हें कुछ पैकेट दे दिये जाते कि उन्हें अमुक जगह पहुंचा दें। इस काम के बदले उन्हें इनाम में एक-आधा डॉलर मिल जाता था। एक दिन उनके जी में आया कि एक पैकेट को खोलकर देखना चाहिए। जब उन्होंने खोलकर देखा तो उसमें उन्हें हशीश मिली। उन्होंने यह हशीश महंगे दामों में बेच दी और होटल वापस न गये। मगर होटल के प्रबंधकों ने उन्हें खोज निकाला, पैकेट मांगा और ज़ब पैकेट न मिला तो उनकी खूब पिटायी की। वे कई दिनों तक बिस्तर से न उठ सके। इस घटना के बाद वह गुनाहों की दुनिया में पहुंच गये। तीस वर्ष की उम्र तक उन्होंने ऐसा बुरा काम किया।...... हीरोइन और दूसरे नशीले पदार्थो का गुप्त धंधा करते-करते, $खुद भी इन नशीले पदार्थों के सेवन के आदी हो गये। उन्हें कई बार सज़ा हो चुकी थी। मगर वे सजा के भय से मुक्त हो चुके थे। एक बार जब वे जेल में थे तो कुछ लोग उनसे मिलने आये। ये स्वयंसेवक मुसलमान थे, जो कैदियों में इस्लाम का प्रचार कर रहे थे। उनके प्रचार से मुहम्मद यूसुफ अत्यन्त प्रभावित हुए और उनका जी चाहने लगा कि वह ससम्मान और निश्चिन्त जीवन व्यतीत करें। जब वे जेल से रिहा हुए तो बहुत बदल चुके थे। मगर उन्हें जि़न्दा रहने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही था। वे कुछ भी नहीं जानते थे। इसलिए उन्होंने यही सोचा कि अब फिर उन्हें आपराधिक जीवन व्यतीत करके ही पेट पालना पड़ेगा। वही स्वयंसेवक जिन्होंने जेल में उनके विचारों को बदलने की कोशिश की थी, उनसे मिले। उन्होंने उनके लिए रोज़गार का बन्दोबस्त किया। कुछ नकद रकम दी, ताकि जब तक उन्हें वेतन नहीं मिलता, वह इस रकम से अपना समय बिताएं। वे उन्हें अपने साथ रखते। इस तरह मुहम्मद यूसुफ जो कभी जॉन ब्लेगडन थे, मुसलमान हो गये। इस्लाम के साथ उनके लगाव का यह हाल था कि एक साल में उन्होंने कुरआन मजीद अरबी में पढ़ लिया। इस राह में उन्हें बहुत सी-दि़क्कतें और परेशानियां पेश आयीं। मगर वे किसी परेशानी से न घबराये।
कुरआन मजीद की शिक्षा के बाद वे इस्लामी तौर-तरीकों और जीवन-शैली को अपनाने में कामयाब हो गये। चार साल बाद उन्हें उस इलाके में मुसलमानों का इमाम बना दिया गया। इमाम बनने के बाद उन्होंने अपनी कोशिशों से ज़मीन के लिए चन्दा जमा किया और वहां एक छोटी-सी मस्जि़द बनवा दी। उस मस्जि़द के निर्माण में खुद उन्होंने और दूसरे मुसलमानों ने हिस्सा लिया था। वे ख़ुद मज़दूरी करते और उसकी मज़दूरी न लेते थे। मैं मुहम्मद यूसुफ की जि़न्दगी और उनकी बातों से अत्यन्त प्रभावित हुई और उनसे कहा कि मैं मुसलमान होना चाहती हूं। मुहम्मद यूसुफ साहब ने पहली बार मुझे भरपूर नज़रों से देखा और बोले, खुदा मुबारक करे, मगर मुसलमान होना बहुत मुश्किल हैं। मैं हर मुश्किल पर क़ाबू पाऊंगी। अलहम्दुलिल्लाह, उन्होंने कहा, क्या तुम्हें कलिमा और नमाज़ आती है? मैंने न में सिर हिलाया, तो उन्होंने मुझे एक छोटी-सी किताब दी। उसमें रोमन लिपि में कलिमा और नमाज़ लिखी हुई थी। कहने लगे, इसे याद कर लो और अगर हो सके तो तीसरे पहर को मेरे पास थोड़ी देर के लिए आ जाया करो। मैंने कुछ दिनों में न केवल कलिमा और नमाज़ याद कर ली बल्कि उनके अर्थ भी समझ लिये। उस दौरान मैं मुहम्मद यूसुफ से भी मिलती रही और उनसे इस्लाम धर्म के बारे में जानकारियां हासिल करती रही। जुमा का दिन था। मस्जि़द में मैंने सभी मुसलमानों के सामने कलिमा पढ़ा और मुसलमान हो गयी। मेरा नाम आमिना रख दिया गया। मुसलमान होने के बाद मैंने पहला काम यह किया कि खाने के साथ थोड़ी-बहुत शराब पीने की जो आदत थी उसे छोड़ दिया। मैं सिगरेट भी पी लिया करती थी। यह भी छोड़ दी। और मुसलमान औरतों जैसा लिबास सिलने के लिए दे दिया। मैं समझती थी कि जब मैं मुसलमान औरतों की तरह लम्बे चोग़े मेें अपना शरीर छिपाऊंगी और सिर को भी ढांपूंगी तो व्हील चेयर में बैठी हुई हास्यास्पद दिखायी दूंगी। मैंने हर ताना और मज़ाक का सामना करने का फैसला कर लिया। जब मैं पहली बार मुसलमान औरतों का लिबास पहनकर घर से निकलने लगी तो मेरी मां ने मुझे हैरत से देखा और बोली, सिंथिया, क्या पहन रखा है तुमने उसके चेहरे पर तंज़ था। मेरे पिता ने भी, जो रात भर शराब पीने के बाद अब कुर्सी पर बैठे ऊंघ रहे थे, अपनी लाल-लाल आंखें खोलकर मुझे देखा और कहक़हा लगाया। मैंने कहा,मम्मी याद रखिए, मेरा नाम आमिना है, सिंथिया नहीं। आ-मिना-क्या नाम हुआ यह भला, मां ने कहा , लड़की तेरा दिमाग तो नहीं चल गया। मैंने अपनी मां को समझाने की कोशिश की कि मैं उन्हें बता चुकी हूं और अब मुसलमान की तरह विधिवत जिन्दगी की शुरुआत कर चुकी हूं। तुम्हारी जगह जहन्नम में है...... इससे पहले कि वह कुछ और कहतीं मैंने उसकी बात काटकर कहा, मम्मी आपको मेरे मामले में दखल देने की ज़रूरत नहीं। अगर कोई बात करनी है तो जब में दफ्तर से आऊंगी तो कर लेना। इस समय मुझे देर हो रही है। मैं व्हील चेयर को धकेलती हुई बाहर निकल गयी। हबशियों की उस गन्दी बस्ती में मुझे जिसने उस लिबास में देखा, वह पहले तो हैरान हुआ, फिर मज़ाक उड़ाने लगा। मगर मैंने किसीकी एक न सुनी और अपनी राह चलती रही। जब मैं अपने अखबार के दफ्तर पहुंची तो वहां भी अत्यन्त तीखी प्रतिक्रिया हुई। बहुत-से लोग मेरे चारों ओर जमा हो गये। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं मुसलमान हो गयी हूं और मुसलमान औरतें ऐसा ही लिबास पहनती हैं, तो कुछ लोग ख़ामोश हो गये और कुछ लोग बड़बड़ाते हुए चले गये। संयोग से उस दिन वेतन का दिन था। वेतन मिला तो मैंने उसका एक चौथाई हिस्सा अपने इलाके की मस्जि़द के में जमा करा दिया।
जब मैं घर लौटी तो मेरी मां मेरा इन्तज़ार कर रही थी। मेरे पिता भी घर पर मौजूद थे। मैं वेतन का आधा हिस्सा अपनी मां को दे दिया करती थी। उस रकम से मेरे पिता अपने नशे के लिए कुछ पैसे ऐंठ लिया करते थे। मैंने जब अपने वेतन की कुछ रकम अपनी मां को दी तो उसने हैरत से मुझे देखा और पूछा, तुमने इस बार दस डॉलर कम दिए हैं। हा,अब हर महीने आपको इतनी रकम मिलेगी। मैंने अपने वेतन का एक चौथाई मस्जि़द को देने का फैसला कर लिया है। मेरी यह बात सुनते ही वे मुझे, मुसलमानों और मस्जि़द को कोसने लगी। मैंने कोई जवाब देना उचित नहीं समझा और अपने कमरे में चली गयी। बहुत देर तक अपनी मां को बकते-झकते सुनती रही। बीच-बीच में मेरे पिता की आवाज़ भी सुनायी देती थी। अब सिंथिया हमारे हाथ से निकल गयी। मुसलमानों ने इसका दिमाग खराब कर दिया हैं। हमने तो कभी गिरजे को चन्दा नहीं दिया। यह वेतन का एक चौथाई मस्जि़द को देने लगी हैं। मेरे मां-बाप के नज़दीक मुसलमान लुटेरों से कम न थे, जो उनकी बेटी की कमाई लूटकर ले गये थे। धीरे-धीरे मैंने अपनी जि़न्दगी इस्लाम के नियमों और तौर-तरीकों के मुताबिक ढाल ली थी। वे लोग जो पहले मुझ पर उंगलियां उठाते थे, मुझसे लापरवाह हो गये। और फिर क्रिसमस का त्यौहार आ गया। हम चाहे कितने ही खराब और बदहाल क्यों न हों, क्रिसमस को ठाट-बाट से मनाने का इन्तिज़ाम ज़रूर करते हैं। क्रिसमस के दिन शराब पानी की तरह बहायी जाती है। जब मैंने मेहमानों के साथ शराब के प्याले को छूने से ही इन्कार कर दिया तो हमारे घर में $िकयामत बरपा हो गयी। पिता तो सुबह से नशे में धुत थे। मां भी दो-एक बार मेहमानों के साथ पी चुकी थी। नशे की हालत में वे मुझ पर बरसने लगे। मेहमान भी नशे में थे। वे भी, जो उनके मुंह में आया, बकने लगे।इन सबकी हालत दयनीय थी। मैंने सोचा कि मुझे इस कमरे से चले जाना चाहिए। मगर जब में अपनी व्हील चेयर को धकेल कर जा रही थी,तो एक मेहमान लडका और मेरे पिता मेरे पीछे लपके और व्हील चेयर के सामने खडे हो गये। मैंने कहा,रास्ता छोड़ दें,मुझे जाने दें। यह पी लो। फिर चली जाना, लड़के ने मेरे रास्ते से हटे बिना शराब का प्याला मेरे आगे किया। मैं लानत धिक्कार भेजती हंू इस पर। मेरे मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा लगा, जो मेरे पिता ने मारा था। मेरा सिर चकरा गया। आंखों में आंसू आ गये। मगर मेरे पिता और उस लड़के में तो जैसे शैतान की आत्मा घुस गयी थी। वे मुझे पीटने लगे। उन्होंने मुझे रूई की तरह धुन दिया। मैं चुपचाप यह अत्याचार सहती रही। वे गालियां बक रहे थे। नशे में उनके मुंह से झाग बह रहा था। जब वे थककर बैठ गये तो मैं किसी न किसी तरह अपने कमरे में पहुंच गयी। इस रात मैंने फैसला किया कि मुझे क्या करना है। मेरी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि मुझे अपनी मस्जि़द के इमाम मुहम्मद यूसुफ को अपनी सारी विपदा सुनानी चाहिए। और फिर यह घर छोड़ देना चाहिए। लेकिन ज्यों-ज्यों मेरा $गुस्सा और जोश ठंडा होता गया, मेरी सोच बदलती गयी। मैंने सोचा कि मुझे अपनी परेशानियां लेकर मुहम्मद युसूफ के पास नहीं जाना चाहिए। उनका हल जरूर तलाश करना चाहिए और अपने माता-पिता के साथ ही रहना चाहिए। उनका मुझ पर अधिकार है और मेरा भी यह कर्तव्य बनता है कि मैं उनकी जि़न्दगी बदलने की कोशिश करूं। अत: उस रोज मैंने एक महत्वपूर्ण फैसला किया और अगले दिन मैंने अपने इस फैसले से मस्जि़द के इमाम मुहम्मद यूसुफ को सूचित कर दिया। मैंने अखबार की नौकरी छोड़ दी और स्वयंसेविका बन गयी। मुझे साधारण-सा गुज़ारा भी मिलने लगा। जब मेरे मां-बाप को मेरे इस फैसले का ज्ञान हुआ, तो वे बहुत सटपटाए। वे यह सोच भी नहीं सकते थे कि मैं अच्छी-भली नौकरी छोड़ दूंगी। मैंने उनसे कहा कि वे चिन्ता न करें। उनको उनका हिस्सा मिलता रहेगा। मैं अखबारों के लिए लिखूंगी और जो पारिश्रमिक मुझे वहां से मिलेगा, वह में उनको दे दिया करूगीं। मेरे इस व्यावहारिक जीवन का आंरभ उस समय हुआ जब मैं मुसलमान स्वयंसेविका बन गयी। मुहम्मद युसूफ ने मुझे बहुत-से निर्देश दिये और जिस काम के लिए मुझे चुना गया, उस राह के ख़तरों से मुझे अवगत किया। मुझे खुद भी अन्दाज़ा था कि यह रास्ता कांटों से भरा है। मगर इस्लाम ने मुझे साहस दिया। इसके कारण मैं किसी खतरे पर ध्यान नहीं दे रही थी। मैं जेलों में जाने लगी। वहां मैं कैदियों से मिलती।उनके सामने इस्लाम की महिमा बयान करती। उनको उनकी जि़न्दगी के घिनौने पहलू दिखाकर उनको बेहतर जि़न्दगी गुज़ारने की सलाह देती। कुछ कैदी समय काटने के लिए मेरी बातों को ध्यान से सुनते। कुछ मेरा मज़ाक उड़ाते। उनमें ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने मेरी शारीरिक अपंगता पर भी कहकहे लगाये। मगर में तनिक भी भयभीत न हुई, न मेरी हिम्मत ने जवाब दिया। इन कैदियों में से एक हबशी कैदी अरबिन्तो भी था। उसने मेरी बातों का अच्छा प्रभाव ग्रहण किया और एक दिन कहने लगा, तुम बड़ी साहसी लड़की हो। अगर तुम वास्तव में चाहती हो कि बुराई का अन्त हो जाए तो बरनार्डो को खत्म कर दो। बरनार्डो कौन है? मैंने पूछा। बरनार्डो इस शहर के एक बड़े माफिया गिरोह का प्रमुख है। यही व्यक्ति है जो इस शहर में मादक द्रव्यों का एकाधिकारी है। अगर वह न हो तो इस शहर में लोगों को मादक-द्रव्य न मिले और लोग इसके आदी न हों। वह बड़ा खतरनाक आदमी है। आज मैं जिस हालत मैं पहुंचा हूं, उसका जिम्मेदार भी बरनार्डो है। मैं बरनार्डो से कैसे मिल सकती हूं। उसने मेरे कान में मुझे बरनार्डो का पता बता दिया। जब में जाने लगी, तो अरबिन्तो का लहजा बिल्कुल बदल गया था। वह अफसोस जताते हुए बोला, मुझसे गलती हुई कि मैंने तुमसे बरनार्डो का जि़क्र किया। तुम इन सारी बातों को भूल जाओ। तुम अन्दाज़ा नहीं कर सकती हो कि बरनार्डो कितना खतरनाक आदमी है। मगर मैं उससे मिलने का फैसला कर चुकी हूं, मैंने साहस के साथ कहा। तुम उससे मिलकर क्या करोगी? उसने पूछा। उसको सीधा रास्ता दिखाने की कोशिश करूंगी। वह हंसने लगा। उसके कहकहे दूर तक मेरा पीछा करते रहे। सुबह का समय था जब मैं वक्त तय किए बिना बरनार्डो के आलीशान घर के अन्दर दािखल हुई। उस घर को देखकर कोई व्यक्ति अनुमान नहीं कर सकता कि उस घर में रहने वाला व्यक्ति कोई बहुत बड़ा अपराधी है। तुम यहां क्या कर रही हो? एक नौकर ने मुझे रोककर पूछा। वह मेरे लिबास और मेरी व्हील चेयर को ध्यान से देख रहा था। मुझे मिस्टर बरनार्डो से मिलना है, मैंने कहा। तुम्हें? उसने कहकहे लगाकर कहा, मिस्टर बरनार्डो से मिलना इतना आसान नहीं। आखिर क्यों? मैंने कहा। वह भी इन्सान है और इन्सान इन्सान से मिला-जुला करते हैं। हम दोनों में तू-तू, मैं-मैं होने लगी। उसी समय एक अधेड़ उम्र का मज़बूत शरीर वाला आदमी एक कमरे से बाहर निकला और गुस्से से बोला, यह क्या हो रहा है और शोर क्यों मचा रखा है? नौकर ने उस आदमी के आगे सिर झुकाकर कहा, यह लड़की आपसे मिलने की जि़द कर रही थी। उसने पूछा-मुझसे क्या काम है? मैं आपसे एकान्त में बात करना चाहती हूं, मैंने कहा। बरनार्डो ने कुछ विस्मय से मेरी और देखा। फिर नौकर को वहां से जाने का इशारा किया। जब नौकर वहां से चला गया तो बरनार्डो ने बड़े अभिमान से कहा, मैं इस तरह किसी से मुलाकात नहीं करता हूं। तुम विक लांग हो, इसलिए रुक गया हूं। कहो, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं? मैंने उसकी और देखा और उसकी आखों में आंखे डालकर कहा, मिस्टर बरनार्डो क्या सचमुच आप इस विकलांग लड़की के किसी काम आना चाहते हैं? उसने जवाब देने से पहले कुछ सोचा फिर मुस्कराकर कहा, हां, कहो मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं? मैंने फिर उसकी आंखों में आंखें डाल दीं। मैंने महसूस किया कि मिस्टर बरनार्डो कुछ बेचैनी महसूस कर रहा है। वह मेरी नज़रों से नजरे़ं चुरा था। मैंने कहा-मिस्टर बरनार्डो अल्लाह ने आपको सब कुछ दिया है। अब आपको हिदायत की जरूरत है, सच्ची हिदायत की। लड़की मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो, मेरा वक्त बहुत कीमती है। दो मिनट में अपनी बात खत्म करो। मैंने जब बात शुरू की तो बरनार्डो का चेहरा ग़्ाुस्से से लाल हो गया। उसने गुस्से को दबाकर कहा, तुम पागल हो। निकल जाओ यहां से। तुम्हें किसने बताया है कि मैं यह काम करता हूं। मैं तुम्हें और तुमको बताने वाले को जि़न्दा न छा़ेडूगा। मैंने बड़े इत्मीनान से कहा, आपके इस गुस्से और जोश से ही जाहिर हो जाता है कि मुझे आपके बारे में जो सूचना मिली है वह ठीक है। तुम बकती हो। चली जाओ यहां से। मुझे तुम्हारी विकलांगता का ख्याल आ रहा है, नहीं तो.....। मैं जानती हूं मिस्टर बरनार्डो आप बहुत ताकतवर हैं। सारा शहर आपके चंगुल में फंसा हुआ है। ''आखिर तुम चाहती क्या हो? बरनार्डो ने गरजकर कहा। ''मैं चाहती हूं कि आप खुदा के बन्दों के फायदे के लिए अपना यह धंधा छोड़कर कोई और काम करें और अगर आपसे संभव नहीं तो फिर मुझ विकलांग लड़की पर दया करें। मुझे प्रतिदिन पांच मिनट मुलाकात का वक्त दे दिया करें।ÓÓ वह हैरत से मेरा मुंह ताकने लगा। फिर उसने कहकहा लगाया और बोला, ''तुम धुन की पक्की हो।...तुम कल फिर आ सकती हो इसी वक़्त।ÓÓ मैं वहां से निकली तो अत्यन्त संतुष्ट थी। बरनार्डो इटालवी मूल का था। दिल का खुला। उसको जिन्दगी में शायद ही मुझ जैसा कोई इन्सान मिला हो। वह मेरे व्यक्तित्व में रुचि लेने लगा। एक दिन के बाद दूसरा दिन...वह मुझे हर रोज बुलाता। मुझसे बातें करता। पांच मिनट की बातचीत की परिधि फैलकर घंटों तक पहुंच गयी। मैं उसके सामने इन्सानों का जिक्र करती। मादक द्रव्यों की विनाशकारिता बयान करती। इस्लाम की सत्यता का उल्लेख करती। धीरे-धीरे उसके विचारों में कुछ लचक पैदा होने लगी। ''आमिना! एक दिन उसने मुझसे कहा, ''मैं नही जानता कि तुम कौन हो? मुसलमान क्या होते हैं? मगर मैं एक बात जान गया हूं कि तुम मानव मनोविज्ञान को खूब समझती हो। ''इस्लाम इन्सानों का धर्म है, पूर्ण धर्म।Ó मैंने जवाब दिया, ''इसलिए इस्लाम मुसलमानों को मानव-मनोविज्ञान पर गहरी नजर रखने की हिदायत करता है। मैंने महसूस किया कि अब जब मैं उससे मिलने जाती हूं वह कुछ बेचैनी महसूस करने लगता है। उसने एक दिन मुझसे कहा, ''आमिना! वास्तव में इन्सान की जिन्दगी नश्वर है और इन्सान को दुनिया में अच्छे काम करने चाहिए। दूसरों का भला सोचना चाहिए। ''अलहम्दुलिल्लाह, मैंने जवाब दिया, ''खुदा का लाख-लाख शुक्र है कि यह बात आपके मन में बैठ गयी।
कुछ दिनों के बाद बरनार्डो ने अपना धंधा छोड़ दिया। वह सीधे रास्ते पर आ गया। उसने बिना हिचकिचाहट स्वीकार कर लिया कि वह माफिया गिरोह का सदस्य है। उसने माफिया के छिपे भेदों को खोलकर रख दिया। आपको याद होगा कि राष्ट्रपति फोर्ड के कार्यकाल में बरनार्डो के इस काम से अमेरिका में कितना तहलका मचा था! बरनार्डो ने पत्रकारों से कहा था, ''एक अपाहिज और चलने-फिरने से विवश लड़की ने मुझे यह उडऩशक्ति प्रदान की है कि मैंने बुराइयों की जंजीरों को तोड़ दिया है और स्वतंत्र वातावरण में उडऩे का साहस अपने अन्दर महसूस कर रहा हूं।ÓÓ
उस दिन मैं बहुत रोयी थी, जब मुझे खबर मिली कि बरनार्डो को जेल में गोली मार दी गयी है। उसको माफिया के आदमियों ने मार डाला था। उसका जिन्दा रहना उनके लिए खतरनाक साबित हो सकता था। वह एक ऐसा इन्सान था,जो सच्चाई की राह पर चल निकला था। वह जिन्दा रहता तो बड़ा सुधारक साबित हो सकता था। बरनार्डो के प्रायश्चित करने के कारण मुझे प्रेस ने बड़ी प्रसिद्धि दी थी। मेरे भाषण प्रकाशित होने लगे। पत्र-पत्रिकाओं में मेरे इंटरव्यू प्रकाशित हुए। टी.वी. और रेडियो पर मुझे बुलाया गया और मेरी सेवाओं की बड़ी प्रशंसा की गयी। विश्व हेवीवेट चैम्पियन मुहम्मद अली मुझसे मिलने आये। उन्होंने मेरी बड़ी प्रशंसा की। राष्ट्रपति फोर्ड ने मुझे ह्राइट हाउस में बुलाया और मेरी सराहना की। इस शोहरत और इज्जत के बावजूद मुझमें घमंड पैदा नहीं हुआ, क्योंकि घमंड अल्लाह को पसन्द नहीं है। इस्लाम ने मेरे जीवन में जो परिवर्तन पैदा किया,मैं सारी दुनिया में फैला देना चाहती हूं और अगर यह मेरे वश में नहीं तो मेरे दिल में यह इच्छा जरूर है कि इस्लाम की बरकतों से अमेरिका के अश्वेत लोग अवश्य लाभान्वित हों। मेरे पिता हर नशा छोड़ चुके हैं। मेरी मां मेरी इज्जत करती हैं, यद्यपि उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा। तथापि उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आ चुका है। पिछले कुछ वर्षों में मेरी कोशिशों से तीन सौ व्यक्तियों ने मादक-द्रव्यों से तौबा की है और इक्कीस मर्दों और औरतों ने इस्लाम ग्रहण किया है। मैं एक अपाहिज औरत हूं। मगर मैं अपने आपको अपाहिज नहीं समझती, क्योंकि मेरा ईमान है कि जो व्यक्ति मुसलमान हो जाए, वह कभी अपाहिज नहीं हो सकता, क्योंकि खुदा उसका सहारा बन जाता है। मेरी जिन्दगी इस्लाम को समर्पित हो चुकी है। मैं इस्लाम ही के लिए काम करूंगी और इस्लाम की रूह (आत्मा) इन्सानों में फूंक देना चाहती हूं जब भी कोई इन्सान बुराई का रास्ता छोड़ देता है, मैं तो समझती हूं कि इस्लाम की जीत हुई है।-तो यह है मेरी कहानी-सिंथिया से आमिना बनने की।